Best Historical and Knowledgeable Content here... Know More.

  • +91 8005792734

    Contact Us

  • amita2903.aa@gmail.com

    Support Email

  • Jhunjhunu, Rajasthan

    Address

(73)

जनकपुरी में दिव्य विवाह – चारों राजकुमारों का मंगलमय पाणिग्रहण

 

मिथिला की पावन भूमि पर उस दिन उल्लास का अनुपम वातावरण था। राजा दशरथ ने अपने पुत्रों के विवाह के निमित्त भव्य गोदान किया था। हजारों गौओं की पंक्तियाँ, ब्राह्मणों के मधुर आशीर्वाद और शंखध्वनि से वातावरण गुंजायमान हो रहा था। तभी उसी समय भरत के सगे मामा, केकयदेश के पराक्रमी राजकुमार युधाजित वहाँ पहुँचे। उनके चेहरे पर उत्साह और स्नेह का तेज झलक रहा था। वे सीधे महाराज दशरथ के पास पहुँचे, विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया और आदर सहित कुशल-क्षेम पूछने लगे।

 

उन्होंने बड़े स्नेह से कहा कि केकयदेश के महाराज ने आपके स्वास्थ्य और मंगल का समाचार पूछा है। वहाँ सब लोग स्वस्थ और प्रसन्न हैं। फिर उन्होंने अपने आने का उद्देश्य बताया—केकयनरेश अपने प्रिय नाती भरत को देखने के लिए अत्यंत उत्सुक हैं। उसी प्रेम से प्रेरित होकर वे भरत को लेने अयोध्या आए थे। परंतु जब अयोध्या पहुँचे तो ज्ञात हुआ कि महाराज दशरथ अपने चारों पुत्रों के साथ विवाह हेतु मिथिला आए हैं। यह सुनते ही उनका हृदय भरत को देखने की लालसा से भर उठा और वे तुरंत मिथिला चले आए। उनकी वाणी में बहन के पुत्र के प्रति ममता स्पष्ट झलक रही थी।

 

महाराज दशरथ ने अपने प्रिय अतिथि को सामने देखा तो अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने युधाजित का आदरपूर्वक स्वागत किया, उन्हें सम्मानित आसन दिया और उनकी आवभगत की। रात प्रेमपूर्ण वार्तालाप में बीत गई। प्रातःकाल राजा दशरथ अपने पुत्रों सहित उठे, नित्यकर्म से निवृत्त हुए और ऋषियों को आगे करके जनक की यज्ञशाला की ओर चले।

 

विवाह के लिए शुभ विजय मुहूर्त आया। चारों राजकुमार दूल्हों के अनुरूप अलंकृत थे। उनके वस्त्र चमक रहे थे, आभूषणों से उनका तेज और भी प्रखर हो गया था। श्रीराम अपने भाइयों के साथ, वसिष्ठ और अन्य महर्षियों को आगे करके विवाह-मण्डप की ओर बढ़े। वातावरण में मंगलाचार हो रहे थे। वेदी सुगंधित पुष्पों से सजी थी और हर ओर उत्सव का उल्लास था।

 

वसिष्ठ मुनि आगे बढ़े और राजा जनक के पास जाकर विनम्र स्वर में बोले—महाराज दशरथ अपने पुत्रों का मंगलाचार सम्पन्न कर यहाँ पधारे हैं और भीतर आने के लिए आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि दाता और ग्रहण करने वाले के मिलन से ही दान-धर्म पूर्ण होता है। अतः आप विवाह की शुभ क्रियाएँ आरम्भ कर उन्हें आमंत्रित करें।

 

राजा जनक ने यह सुनकर विनम्र मुस्कान के साथ उत्तर दिया। उन्होंने कहा—मुनिश्रेष्ठ! महाराज दशरथ मेरे यहाँ किसकी अनुमति की प्रतीक्षा कर रहे हैं? यह घर उनका ही है। जैसे यह मेरा राज्य है, वैसे ही उनका भी है। मेरी कन्याएँ विवाह के लिए सुसज्जित होकर वेदी के समीप बैठी हैं और अग्निशिखाओं की भाँति चमक रही हैं। मैं तो स्वयं आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। कृपया बिना विलम्ब के सभी कार्य सम्पन्न कीजिए।

 

वसिष्ठजी ने जनक का यह संदेश दशरथ को सुनाया। यह सुनते ही राजा दशरथ अपने पुत्रों और ऋषियों के साथ मण्डप में प्रवेश कर गए। तब राजा जनक ने विनम्र भाव से वसिष्ठजी से अनुरोध किया कि वे स्वयं इस लोकमंगलकारी विवाह की सम्पूर्ण विधि सम्पन्न कराएँ।

 

वसिष्ठजी ने विश्वामित्र और शतानंद को साथ लेकर वेदी की रचना प्रारम्भ की। सुगंधित पुष्पों से वेदी सजाई गई। सुवर्ण-पालिकाएँ, अंकुरित कलश, धूपपात्र, शंख, अर्घ्यपात्र, लावा, अक्षत—सभी सामग्री विधिपूर्वक सजा दी गई। कुश बिछाए गए, मंत्रोच्चारण हुआ और अग्नि प्रज्वलित की गई। हवन की दिव्य सुगंध से वातावरण पवित्र हो गया।

 

तब राजा जनक ने आभूषणों से विभूषित सीता को लाकर श्रीराम के सामने बैठाया। उनका मुख कमल के समान खिल रहा था। जनक का हृदय भावुक हो उठा। उन्होंने कहा—रघुनन्दन! यह मेरी पुत्री सीता तुम्हारी सहधर्मिणी है। इसे स्वीकार करो। यह पतिव्रता है, सौभाग्यवती है और छाया की भाँति तुम्हारा अनुसरण करेगी। यह कहते हुए उन्होंने संकल्प का पवित्र जल श्रीराम के हाथ में छोड़ा और कन्यादान कर दिया।

 

देवताओं ने साधुवाद दिया, आकाश से पुष्पवर्षा होने लगी, दुन्दुभियाँ बज उठीं। जनक आनंद से भर उठे। फिर उन्होंने लक्ष्मण को बुलाकर उर्मिला का हाथ उनके हाथ में दिया। उसके बाद भरत को माण्डवी और शत्रुघ्न को श्रुतकीर्ति का पाणिग्रहण कराया। जनक की वाणी में प्रेम और संतोष झलक रहा था।

 

चारों राजकुमारों ने अपनी-अपनी पत्नियों का हाथ थाम लिया। वसिष्ठजी की सम्मति से उन्होंने अग्नि, वेदी, दशरथ और ऋषियों की परिक्रमा की। वेद-मंत्र गूंज रहे थे। आकाश से फूल बरस रहे थे। अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं, गंधर्व गीत गा रहे थे। शहनाई की मधुर ध्वनि चारों ओर फैल गई। अग्नि की तीन परिक्रमा के साथ विवाह की विधि पूर्ण हुई।

 

चारों राजकुमार अपनी पत्नियों सहित जनवासे की ओर चले। उनके पीछे-पीछे राजा दशरथ, ऋषि-मुनि और बंधु-बांधव चल रहे थे। सबके हृदय में आनंद की लहर थी। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं स्वर्ग पृथ्वी पर उतर आया हो। यह केवल विवाह नहीं, दो महान् वंशों का दिव्य और युगों तक स्मरणीय मिलन था। ✨