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जनकपुरी में श्रीराम का प्रथम आगमन
महर्षि गौतम के आश्रम में अहल्या के उद्धार के बाद वातावरण अत्यन्त शांत और पवित्र हो गया था। उस पावन क्षण के बाद महर्षि विश्वामित्र आगे-आगे चल पड़े और उनके पीछे-पीछे श्रीराम और लक्ष्मण श्रद्धा तथा विनम्रता से चलते हुए मिथिला की ओर बढ़ने लगे। उनके मन में उत्सुकता भी थी और शांति भी। तीनों ईशान कोण की दिशा में चलते हुए अंततः राजा जनक के विशाल यज्ञमण्डप तक पहुँच गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि चारों ओर एक अद्भुत और दिव्य वातावरण फैला हुआ है।
जब श्रीराम ने उस यज्ञमण्डप को देखा तो उनके हृदय में आनंद और आश्चर्य दोनों उमड़ पड़े। उन्होंने लक्ष्मण के साथ महर्षि विश्वामित्र से अत्यन्त आदरपूर्वक कहा—
“महाभाग! महात्मा जनक का यह यज्ञ समारोह कितना अद्भुत और भव्य है। यहाँ तो अनेक देशों से आये हुए सहस्रों ब्राह्मण एकत्रित हुए हैं। उनके वेदपाठ की गूँज से पूरा वातावरण पवित्र और आलोकित हो रहा है।”
राम ने आगे देखा कि ऋषियों के निवास स्थानों के पास सैकड़ों बैलगाड़ियाँ खड़ी थीं। वे यज्ञ के लिए आवश्यक सामग्री से भरी हुई थीं। पूरा क्षेत्र एक विशाल आध्यात्मिक उत्सव का रूप ले चुका था। उस दिव्य दृश्य को देखकर राम ने पुनः विनम्रता से कहा—
“ब्रह्मन्! कृपा करके हमारे लिए भी कोई उपयुक्त स्थान निश्चित कर दीजिए, जहाँ हम लोग ठहर सकें।”
श्रीराम की यह विनम्र बात सुनकर महर्षि विश्वामित्र मुस्कराए। उन्होंने थोड़ी दूर एक शांत और एकान्त स्थान चुना, जहाँ जल की भी अच्छी व्यवस्था थी। वहीं उन्होंने अपना आश्रय स्थापित किया ताकि वे और दोनों राजकुमार विश्राम कर सकें।
उधर जब धर्मपरायण और उच्च आचरण वाले महाराज जनक को यह समाचार मिला कि महान् तपस्वी महर्षि विश्वामित्र उनके यज्ञ में पधारे हैं, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। उन्होंने तुरंत अपने पुरोहित शतानन्द को आगे किया और स्वयं भी विनम्र भाव से उनका स्वागत करने के लिए चल पड़े। उनके हाथों में अर्घ्य था, जिससे वे मुनि का विधिपूर्वक सम्मान करना चाहते थे।
राजा के साथ अनेक ऋत्विज् और यज्ञ के विद्वान आचार्य भी शीघ्रता से चल पड़े। जैसे ही वे महर्षि के समीप पहुँचे, राजा जनक ने अत्यन्त विनम्रता और श्रद्धा के साथ आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। धर्मशास्त्र के नियमों के अनुसार उन्होंने उन्हें अर्घ्य अर्पित किया और आदरपूर्वक उनका सम्मान किया।
महर्षि विश्वामित्र ने भी राजा की उस श्रद्धा को सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने स्नेहपूर्वक राजा का कुशल-क्षेम पूछा और यह भी जानना चाहा कि उनका यज्ञ सुचारु रूप से चल रहा है या नहीं।
राजा के साथ आये हुए अन्य मुनि, उपाध्याय और पुरोहितों से भी विश्वामित्र ने बड़े प्रेम और सम्मान के साथ कुशल पूछी। वे सभी महर्षियों से बड़े हर्ष के साथ मिले, मानो वर्षों बाद किसी प्रिय परिवार से भेंट हो रही हो।
फिर राजा जनक ने हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्रता से कहा—
“भगवन्! कृपा करके आप इन सभी मुनीश्वरों के साथ आसन ग्रहण कीजिये।”
राजा की विनती सुनकर महर्षि विश्वामित्र आसन पर विराजमान हो गये। उनके बैठते ही वहाँ उपस्थित सभी मुनि, पुरोहित, ऋत्विज् और मंत्री भी अपने-अपने स्थानों पर आदरपूर्वक बैठ गये। पूरा सभामण्डप गंभीर और दिव्य वातावरण से भर गया।
कुछ क्षण बाद राजा जनक ने विश्वामित्र की ओर श्रद्धापूर्वक देखते हुए कहा—
“भगवन्! आज मेरे यज्ञ का आयोजन वास्तव में सफल हो गया। ऐसा लगता है कि देवताओं ने ही आज मेरे यज्ञ को पूर्णता प्रदान कर दी है।”
वे आगे भावविभोर होकर बोले—
“आपके पवित्र चरणों के दर्शन से मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है मानो मैंने अपने यज्ञ का सारा फल पा लिया हो। ब्रह्मन्! आप मुनियों में श्रेष्ठ हैं। इतने महर्षियों के साथ आपके मेरे यज्ञमण्डप में आने से मैं वास्तव में धन्य हो गया हूँ। यह मेरे ऊपर आपका महान अनुग्रह है।”
फिर राजा जनक ने विनम्रता से आगे कहा—
“ब्रह्मर्षे! मनीषी ऋत्विजों का कहना है कि मेरी यज्ञदीक्षा के अब केवल बारह दिन शेष हैं। इसलिए, हे कुशिकनन्दन! बारह दिनों के बाद जब देवता यहाँ यज्ञ में भाग लेने आयेंगे, तब आप भी उनके दर्शन अवश्य कीजियेगा।”
इसके बाद राजा जनक ने पुनः हाथ जोड़कर विश्वामित्र से एक प्रश्न पूछा। उनके मन में जिज्ञासा स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
उन्होंने अत्यन्त आदरपूर्वक कहा—
“महामुने! आपका कल्याण हो। आपके साथ जो ये दो राजकुमार खड़े हैं, ये अत्यन्त तेजस्वी और अद्भुत प्रतीत होते हैं। इनके हाथों में सुन्दर आयुध हैं, इनकी चाल हाथी के समान गंभीर है और इनका तेज सिंह तथा वृषभ के समान दिखाई देता है।”
राजा जनक की दृष्टि बार-बार उन दोनों युवकों पर टिक जाती थी। वे आगे बोले—
“इनके नेत्र प्रफुल्ल कमल की पंखुड़ियों की तरह शोभायमान हैं। ये तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं। इनका मनोहर रूप तो ऐसा है कि मानो स्वर्ग के अश्विनीकुमार भी इनके सामने लज्जित हो जाएँ। ये दोनों अभी-अभी यौवन में प्रवेश किये हुए प्रतीत होते हैं।”
जनक की जिज्ञासा और बढ़ गई। उन्होंने आगे कहा—
“ये दोनों ऐसे लगते हैं जैसे देवलोक से स्वयं उतरकर पृथ्वी पर आये दो देवता हों। जैसे आकाश में सूर्य और चन्द्रमा अपनी उपस्थिति से शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही ये दोनों राजकुमार इस देश को सुशोभित कर रहे हैं।”
वे ध्यानपूर्वक उन्हें देखते हुए बोले—
“इन दोनों में अद्भुत समानता है। इनके शरीर की ऊँचाई, संकेत और चेष्टाएँ लगभग एक जैसी हैं। इनके केशों के पास काकपक्ष भी अत्यन्त सुंदर दिखाई देते हैं। इसलिए, हे महामुने! मैं इन दोनों वीरों का यथार्थ परिचय और उनका पूरा वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ।”
राजा जनक का यह प्रश्न सुनकर महातेजस्वी और आत्मबल से सम्पन्न महर्षि विश्वामित्र मुस्कराये। उन्होंने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“राजन्! ये दोनों महान् पराक्रमी महाराज दशरथ के पुत्र हैं।”
इसके बाद विश्वामित्र ने विस्तार से राम और लक्ष्मण की कथा सुनानी प्रारम्भ की। उन्होंने बताया कि किस प्रकार ये दोनों उनके साथ सिद्धाश्रम में रहे, कैसे उन्होंने राक्षसों का नाश किया, और किस प्रकार निर्भय होकर वे लंबी यात्रा करते हुए मिथिला तक पहुँचे।
उन्होंने विशालापुरी के दर्शन, अहल्या के उद्धार और महर्षि गौतम के साथ उनके मिलन की पूरी कथा भी सुनाई। अंत में विश्वामित्र ने यह भी कहा—
“राजन्! ये दोनों वीर यहाँ आपके पास सुरक्षित रखे हुए उस महान् दिव्य धनुष को देखने और उसके विषय में जानने की इच्छा से आये हैं।”
इतना कहकर महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र शांत हो गये। यज्ञमण्डप में उपस्थित सभी लोग उस अद्भुत कथा को सुनकर स्तब्ध रह गये और उनकी दृष्टि अब श्रद्धा से श्रीराम और लक्ष्मण की ओर टिक गयी।