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जनकसभा में शिवधनुष का रहस्य और सीता स्वयंवर का संकल्प

 

निर्मल प्रभात का मनोहर समय था। मिथिला की धरती पर उगते सूर्य की सुनहरी किरणें फैल रही थीं। राजमहल में शांति और पवित्रता का वातावरण था। धर्मात्मा राजा जनक अपने नित्य नियम और पूजा से निवृत्त होकर गंभीर भाव से सभा में विराजमान हुए। उनके हृदय में आज विशेष उत्सुकता थी, क्योंकि महान् तपस्वी महर्षि विश्वामित्र उनके अतिथि थे और उनके साथ अयोध्या के दो तेजस्वी राजकुमार—श्रीराम और लक्ष्मण—भी उपस्थित थे।

 

राजा जनक ने अत्यंत श्रद्धा से महर्षि विश्वामित्र का स्वागत किया। विधिपूर्वक पूजन किया, उत्तम आसन अर्पित किया और दोनों राजकुमारों को स्नेहभरी दृष्टि से निहारा। उन दोनों के तेज, विनय और दिव्य आभा को देखकर जनक का हृदय आनंद से भर उठा। विनम्र स्वर में उन्होंने कहा—“भगवन्! आपका यहाँ आगमन मेरे लिए परम सौभाग्य है। मैं आपका सेवक हूँ। कृपा कर आज्ञा दें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?”

 

महर्षि विश्वामित्र ने शांत स्वर में कहा—“महाराज! ये अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं। शौर्य और पराक्रम में अद्वितीय हैं। आपके यहाँ जो दिव्य धनुष सुरक्षित रखा है, उसे देखने की इनकी इच्छा है। आप कृपा करके वह धनुष इन्हें दिखा दें।”

 

यह सुनकर राजा जनक कुछ क्षण मौन रहे। उनके चेहरे पर गंभीरता छा गई। वे बोले—“मुनिवर! यह धनुष साधारण नहीं है। इसके पीछे अत्यंत प्राचीन और अद्भुत इतिहास छिपा है। कृपा कर सुनिये।”

 

सभा में सन्नाटा छा गया। जनक बोले—“मेरे पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र महाराज देवरात हुए थे। यही महान् राजा देवरात इस धनुष के प्रथम धरोहर-स्वामी बने। देवताओं ने यह दिव्य धनुष उनके पास सुरक्षित रखने के लिए दिया था। यह वही परम प्रकाशमान धनुष है, जो देवाधिदेव भगवान शंकर का है।”

 

जनक आगे कहने लगे—“पूर्वकाल में दक्ष के यज्ञ के विध्वंस के समय भगवान शंकर अत्यंत क्रोधित हो उठे थे। उन्होंने खेल-खेल में ही इस विशाल धनुष को उठा लिया। उनका स्वर प्रलय की तरह गूँज उठा—‘देवताओं! तुमने यज्ञ में मुझे भाग नहीं दिया। अब मैं इस धनुष से तुम्हारे मस्तक काट डालूँगा।’”

 

देवताओं के हृदय भय से काँप उठे। वे सभी हाथ जोड़कर महादेव की स्तुति करने लगे। अंततः भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनका क्रोध शांत हुआ। प्रसन्न होकर उन्होंने यह दिव्य धनुष देवताओं को दे दिया। बाद में वही धनुष मेरे पूर्वज महाराज देवरात को धरोहर के रूप में सौंप दिया गया। तब से यह हमारे वंश में सुरक्षित है।”

 

इतना कहकर राजा जनक का स्वर कोमल हो गया। वे बोले—“एक दिन मैं यज्ञ के लिए भूमि शोधन कर रहा था। हाथ में हल लेकर खेत जोत रहा था। हल के अग्रभाग से जब भूमि पर एक लंबी रेखा खिंची, उसी रेखा को ‘सीता’ कहा जाता है। उसी हल द्वारा खींची गई उस पवित्र रेखा से अचानक एक दिव्य बालिका प्रकट हुई। मैं आश्चर्य से स्तब्ध रह गया। वह अलौकिक तेज से प्रकाशित थी। क्योंकि वह हल से खींची गई ‘सीता’ रेखा से उत्पन्न हुई थी, इसलिए मैंने उसका नाम सीता रखा।”

 

जनक की आँखों में पिता का वात्सल्य छलक उठा—“मैंने उसे अपनी पुत्री के समान पाला। वह दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई—गुणों से परिपूर्ण, लज्जाशील, तेजस्विनी और अद्भुत रूपवती। जब वह युवावस्था को पहुँची, तब मैंने निश्चय किया कि उसका विवाह किसी साधारण पुरुष से नहीं होगा। जो वीर इस दिव्य शिवधनुष को उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ा देगा, उसी को मैं अपनी पुत्री का हाथ दूँगा। इस प्रकार मैंने उसे वीर्यशुल्का घोषित किया।”

 

उन्होंने आगे कहा—“सीता के रूप और गुणों की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। अनेक राजा मिथिला आए और उसे माँगने लगे। मैंने सबको स्पष्ट कह दिया—‘मेरी पुत्री वीर्यशुल्का है।’ तब वे सब पराक्रम जानने को उत्सुक हुए। मैंने उनके सामने यह शिवधनुष रख दिया। परंतु कोई उसे उठाना तो दूर, हिला भी न सका। तब मैंने उन्हें कन्या देने से इनकार कर दिया।”

 

जनक का स्वर गंभीर हो उठा—“मेरे इनकार से वे सभी राजा क्रोधित हो गए। उन्होंने मिथिला को चारों ओर से घेर लिया। पूरे एक वर्ष तक वे घेरा डाले रहे। नगर में कष्ट बढ़ने लगे। युद्ध के साधन क्षीण हो गए। प्रजा दुःखी हो उठी। मेरा हृदय व्याकुल हो गया।”

 

“तब मैंने तपस्या की। देवताओं को प्रसन्न करने का प्रयास किया। मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की। फिर हमारे सैनिकों ने उन घमंडी राजाओं को पराजित कर दिया। वे सब दिशाओं में भाग गए और मिथिला पुनः शांत हो गई।”

 

इतना कहकर राजा जनक ने गंभीर स्वर में कहा—“हे मुनिवर! यही वह दिव्य शिवधनुष है। यदि श्रीराम इस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा दें, तो मैं अपनी अयोनिजा पुत्री सीता का हाथ इनके हाथ में सौंप दूँगा।”

 

सभा में गहन मौन छा गया। सबकी दृष्टि श्रीराम पर टिक गई। जनक के हृदय में आशा और उत्सुकता की लहर उठी। क्या यह शांत, तेजस्वी राजकुमार उस असंभव को संभव करेगा? मिथिला की साँसें थम-सी गईं—मानो समय स्वयं प्रतीक्षा कर रहा हो उस क्षण की, जब शिवधनुष का गौरव और सीता का भाग्य एक साथ प्रकट होने वाला था।