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जनक का गौरवपूर्ण वंश और स्नेह से भरा विवाह-संकल्प

 

महर्षि वसिष्ठ ने जब इक्ष्वाकुवंश की महान परम्परा का विस्तृत परिचय समाप्त किया, तब सभा में एक शांत गरिमा छा गई। राजा जनक विनम्र भाव से उठे। उनके चेहरे पर गंभीरता थी, पर साथ ही भीतर से उमड़ता हुआ अपनापन भी झलक रहा था। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर मुनियों की ओर देखा और मधुर वाणी में बोले कि जैसे आपने अपने कुल का परिचय देकर इस संबंध को पवित्र किया है, वैसे ही अब मेरा भी कर्तव्य है कि मैं अपने वंश का विस्तारपूर्वक वर्णन करूँ। कन्यादान जैसे महान कार्य से पहले कुल का परिचय देना धर्म की मर्यादा है, इसलिए कृपा करके मेरी बात सुनें।

 

राजा जनक की आँखों में गर्व की हल्की चमक थी, पर उसमें अहंकार नहीं, केवल परम्परा के प्रति श्रद्धा थी। उन्होंने कहना आरम्भ किया कि बहुत प्राचीन काल में निमि नाम के एक परम धर्मात्मा राजा हुए। वे धैर्य, पराक्रम और नीति में अद्वितीय थे। उनका तेज इतना था कि तीनों लोकों में उनका यश गूँजता था। वे केवल राजा ही नहीं, बल्कि धर्म के जीवित स्वरूप माने जाते थे।

 

निमि के पुत्र मिथि हुए। मिथि ने अपने पिता की परम्परा को आगे बढ़ाया और उनके घर जनक का जन्म हुआ। उसी प्रथम जनक के नाम से इस वंश की पहचान बन गई। उस दिन से इस वंश का प्रत्येक राजा “जनक” कहलाने लगा। जैसे-जैसे राजा जनक अपने पूर्वजों का वर्णन करते जाते, सभा में बैठे सभी लोग उस गौरवशाली परम्परा को मन ही मन नमन करते जाते।

 

जनक ने आगे बताया कि उस वंश में उदावसु हुए, उनसे नन्दिवर्धन का जन्म हुआ, जो धर्मनिष्ठ और नीति-पालक थे। नन्दिवर्धन के वीर पुत्र सुकेतु हुए, जिनकी वीरता की गाथाएँ दूर-दूर तक सुनाई देती थीं। सुकेतु से देवरात उत्पन्न हुए—महान बलवान और धर्मात्मा। देवरात से बृहद्रथ हुए, जिनका प्रताप ऐसा था कि शत्रु उनका नाम सुनकर ही भयभीत हो जाते थे।

 

बृहद्रथ के पुत्र महावीर हुए—अपने नाम के अनुरूप शौर्य से भरे हुए। उनसे सुधृति हुए, जो धैर्य और सत्य के पालन में अडिग थे। सुधृति से धृष्टकेतु हुए, जिनका जीवन धर्म का उदाहरण था। धृष्टकेतु से हर्यश्व, उनसे मरु, फिर प्रतीन्धक, और उनसे कीर्तिरथ का जन्म हुआ। प्रत्येक राजा ने धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस वंश की प्रतिष्ठा को और ऊँचा किया।

 

कीर्तिरथ से देवमीढ हुए, देवमीढ से विबुध और विबुध से महीध्रक। महीध्रक के पुत्र कीर्तिरात हुए—महाबली और पराक्रमी। उनसे महारोमा हुए, जिनका स्वभाव अत्यंत सौम्य था। महारोमा से स्वर्णरोमा, और स्वर्णरोमा से ह्रस्वरोमा उत्पन्न हुए। ह्रस्वरोमा धर्मज्ञ और महान आत्मा थे। उनके दो पुत्र हुए—ज्येष्ठ मैं स्वयं और कनिष्ठ मेरा प्रिय भाई कुशध्वज।

 

यह कहते हुए राजा जनक की आवाज़ में स्नेह घुल गया। उन्होंने अपने छोटे भाई की ओर देखा, जैसे उनके हृदय का प्रेम शब्दों में उतर आया हो। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने उन्हें राज्य सौंप दिया और छोटे भाई की सारी जिम्मेदारी भी उन्हें ही दे दी। फिर वे वन में चले गए। पिता के स्वर्गगमन के बाद जनक ने राज्य को धर्मपूर्वक संभाला, और छोटे भाई को पुत्रवत् स्नेह से देखा।

 

समय बीता। तभी सांकाश्य का पराक्रमी राजा सुधन्वा अपनी सेना लेकर मिथिला को चारों ओर से घेरकर खड़ा हो गया। उसने अहंकार से भरा संदेश भेजा—शिवजी का अद्भुत धनुष और कमलनयनी सीता को मुझे सौंप दो। यह मांग सुनते ही सभा में बैठे लोगों के मन में क्षोभ उठता है। पर उस समय राजा जनक शांत रहे। उन्होंने स्पष्ट उत्तर दिया—धर्म और मर्यादा से बढ़कर कुछ नहीं। यह मांग स्वीकार नहीं होगी।

 

फिर भयंकर युद्ध हुआ। रणभूमि में शंखनाद गूँज उठा। रथों की गर्जना, धनुषों की टंकार और वीरों की हुंकार से पृथ्वी कांप उठी। उस भीषण संग्राम में स्वयं जनक अग्रिम पंक्ति में लड़े। अंततः सुधन्वा उनके हाथों मारा गया। विजय के बाद जनक ने सांकाश्य का राज्य अपने प्रिय भाई कुशध्वज को सौंप दिया। यह केवल राजनीतिक निर्णय नहीं था—यह बड़े भाई का छोटे भाई के प्रति प्रेम और विश्वास था।

 

इतना कहकर जनक ने मुनियों की ओर देखा। उनके चेहरे पर अब कोमल प्रसन्नता थी। उन्होंने कहा कि यह मेरे छोटे भाई कुशध्वज हैं। आज मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ और आपको दो बहुएँ देने का संकल्प करता हूँ। उनकी वाणी में पिता का स्नेह उमड़ पड़ा। उन्होंने कहा—मैं अपनी पुत्री सीता को श्रीराम के लिए और ऊर्मिला को लक्ष्मण के लिए समर्पित करता हूँ। सीता, जो पराक्रम की शर्त पर प्राप्त होने वाली देवकन्या के समान सुन्दरी है, उसे मैं राम को देता हूँ। और अपनी दूसरी पुत्री ऊर्मिला को लक्ष्मण के लिए। इस निर्णय में कोई संशय नहीं—मैं हर्षपूर्वक यह संबंध स्थापित करता हूँ।

 

सभा में उस क्षण भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। जनक के शब्द केवल घोषणा नहीं थे—वे एक पिता का हृदय थे जो अपनी पुत्रियों को योग्य हाथों में सौंपते हुए प्रसन्न भी था और भावुक भी।

 

फिर जनक ने महाराज दशरथ की ओर मुड़कर विनम्रता से कहा कि अब आप राम और लक्ष्मण के मंगल के लिए गोदान करवाएँ, नान्दीमुख श्राद्ध सम्पन्न करें और विवाह की तैयारी आरम्भ करें। उन्होंने ज्योतिषीय समय भी बताया—आज मघा नक्षत्र है, तीसरे दिन उत्तरा फाल्गुनी में विवाह करना शुभ होगा। आज दान देकर दोनों राजकुमारों के अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त किया जाए, क्योंकि दान भविष्य में सुखद फल देता है।

 

सभा में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। एक ओर गौरवशाली वंश की परम्परा, दूसरी ओर पिता का स्नेह, और तीसरी ओर धर्मसम्मत विवाह की तैयारी—सब मिलकर उस क्षण को दिव्य बना रहे थे। मिथिला की हवा जैसे मंगलगीत गुनगुनाने लगी, और सभी के हृदय में यह अनुभव जाग उठा कि यह केवल विवाह नहीं, दो महान वंशों का पवित्र मिलन है।