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जनक का संदेश और अयोध्या में उमड़ा विवाह-आनंद

 

 

मिथिला की शांत और पवित्र भूमि पर उस दिन एक विशेष हलचल थी। राजा जनक ने जब यह निश्चय कर लिया कि उनकी प्रिय पुत्री सीता का विवाह अब श्रीराम के साथ ही होगा, तब उन्होंने तुरंत अपने विश्वस्त दूतों को अयोध्या भेजने की आज्ञा दी। दूत आदरपूर्वक सिर झुकाकर चले, पर मार्ग लंबा था। उनके रथ और घोड़े भी कई दिनों की यात्रा से थक गये। रास्ते में उन्हें तीन रातें रुककर विश्राम करना पड़ा। हर रात वे इसी उत्सुकता में सोते कि कब अयोध्या पहुँचे और कब यह शुभ संदेश सुनाएँ। चौथे दिन जब दूर से अयोध्यापुरी की भव्यता दिखाई दी, तो उनके हृदय में प्रसन्नता और उत्साह का ज्वार उमड़ पड़ा।

 

राजाज्ञा के अनुसार दूतों को राजमहल में प्रवेश मिला। महल के भीतर प्रवेश करते ही उन्होंने वृद्ध किन्तु तेजस्वी, देवताओं के समान गौरव से युक्त महाराज दशरथ को देखा। उनका मुख तेज से दमक रहा था, आँखों में करुणा और शांति थी। दूतों के मन में आदर का भाव उमड़ पड़ा। वे दोनों हाथ जोड़कर विनम्रता से खड़े हो गये।

 

उन्होंने मधुर और आदरपूर्ण वाणी में कहा—“महाराज! मिथिला के अधिपति, विदेहराज जनक ने अग्निहोत्र की पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर आपको स्नेहपूर्ण प्रणाम भेजा है। उन्होंने आपके साथ-साथ आपके गुरुओं, पुरोहितों और समस्त परिवार की कुशलता बार-बार पूछी है।” दूतों की वाणी में इतनी विनम्रता और प्रेम था कि सुनते ही सभा में एक मधुर शांति छा गई।

 

इसके बाद उन्होंने कहा—“महाराज! कुशल-क्षेम पूछने के बाद विदेहराज ने महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा से आपको एक विशेष संदेश भेजा है। आपको स्मरण होगा कि मैंने अपनी पुत्री के विवाह के लिए पराक्रम को ही शर्त रखा था। इस घोषणा को सुनकर अनेक राजा यहाँ आये थे। वे गर्व से भरे थे, अपने बल का प्रदर्शन करने को आतुर थे; परंतु जब उन्होंने उस दिव्य धनुष को देखा और उसे उठाने का प्रयास किया, तो उनका गर्व टूट गया। कोई उसे हिला भी न सका। लज्जित होकर वे सब लौट गये।”

 

दूत आगे बोले—“परंतु उसी समय आपके पुत्र श्रीराम, जो विश्वामित्रजी के साथ यहाँ आये थे, उन्होंने सहज ही उस धनुष को उठाया। सभा में उपस्थित लोगों ने आश्चर्य से सांस रोक ली। जैसे ही उन्होंने उसे चढ़ाने का प्रयास किया, वह दिव्य धनुष बीच से टूट गया। उस टूटने की ध्वनि से पृथ्वी तक कांप उठी। सभी ने देखा कि यह कार्य केवल असाधारण पराक्रम वाले पुरुष ही कर सकते थे। तब राजा जनक ने समझ लिया कि यही वीर उनकी पुत्री के योग्य हैं।”

 

वे बोले—“इसलिए विदेहराज अपनी वीर्यशुल्का कन्या सीता को श्रीराम को अर्पित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि आप स्वयं इस विवाह की अनुमति दें। वे आपको आग्रहपूर्वक आमंत्रित करते हैं कि आप अपने गुरु और पुरोहितों के साथ शीघ्र मिथिला पधारें। वहाँ आकर आप अपने दोनों पुत्रों—राम और लक्ष्मण—का दर्शन करें और इस मंगल कार्य को पूर्ण करें। इस विवाह से आपको अपार आनंद प्राप्त होगा।”

 

दूतों ने अंत में कहा—“महाराज! यह संदेश विदेहराज ने प्रेमपूर्वक भेजा है, और इसे भेजने में महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा तथा शतानन्दजी की सम्मति भी है।”

 

यह सब सुनते ही महाराज दशरथ का हृदय आनंद से भर उठा। उनकी आँखों में प्रसन्नता चमकने लगी। उन्होंने तुरंत महर्षि वसिष्ठ, वामदेव और अपने मन्त्रियों की ओर देखकर कहा—“विश्वामित्र जैसे महापुरुष की रक्षा में मेरे पुत्र राम और लक्ष्मण विदेहदेश में हैं। वहाँ राजा जनक ने स्वयं उनके पराक्रम को देखा है। अब वे अपनी पुत्री सीता का विवाह राम के साथ करना चाहते हैं। यदि आप सबकी सम्मति हो, तो हमें तुरंत मिथिला के लिए प्रस्थान करना चाहिए। इसमें विलम्ब उचित नहीं।”

 

राजा की बात सुनकर सभा में बैठे सभी महर्षि और मंत्री एक साथ बोले—“यह अत्यंत शुभ है, अवश्य चलना चाहिए।” उनके स्वर में उत्साह था, जैसे सबके हृदय में एक साथ आनंद का दीप जल उठा हो।

 

महाराज दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने आदेश दिया कि प्रातःकाल ही यात्रा की तैयारी कर दी जाए। मंत्रियों ने भी बड़े उत्साह से सारी व्यवस्था करने का संकल्प लिया। उस रात अयोध्या में जैसे आनंद की लहर दौड़ गई। हर ओर चर्चा होने लगी कि राम का विवाह होने जा रहा है। मंत्रीगण, सेवक, और समस्त राजपरिवार—सबके हृदय में उत्सुकता थी। रात भर वे आनंद की कल्पनाओं में डूबे रहे, और अयोध्या नगरी में आने वाले शुभ विवाह की आहट सुनाई देने लगी।