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ज्ञानसूर्य कपिलदेव

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ज्ञानसूर्य कपिलदेव — मातृभक्ति, आत्मज्ञान और लोककल्याण की अमर गाथा

सृष्टि के प्रारम्भिक युगों में महान तपस्वी महर्षि कर्दम और उनकी परम पतिव्रता पत्नी माता देवहूति का आश्रम तप, योग और भक्ति का पावन केंद्र था। महर्षि कर्दम ने वर्षों तक कठोर तपस्या करके भगवान् की कृपा प्राप्त की थी। समय आने पर उनके घर नौ कन्याओं का जन्म हुआ, जिन्होंने आगे चलकर अनेक ऋषियों के कुलों को गौरवान्वित किया।

किन्तु भगवान् की एक और अद्भुत योजना शेष थी।

विन्दुसरोवर के पवित्र तट पर, नौ कन्याओं के बाद माता देवहूति के गर्भ से स्वयं भगवान् ने कपिलदेव के रूप में अवतार धारण किया। जब बालक ने जन्म लिया, तब उसके केश स्वर्ण के समान चमक रहे थे और उनका वर्ण कपिल (सुनहरा-भूरा) था। इसी कारण उनका नाम कपिल पड़ा।

आश्रम में जैसे दिव्य प्रकाश फैल गया। ऋषि-मुनि समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा का अवतार है।

समय बीतता गया। बालक कपिल ज्ञान, वैराग्य और करुणा की मूर्ति बनकर बड़े हुए। दूसरी ओर माता देवहूति संसार के सुख-दुःख को देखकर यह अनुभव करने लगीं कि भौतिक जीवन कभी भी स्थायी शांति नहीं दे सकता। उनके हृदय में आत्मज्ञान की तीव्र प्यास जाग उठी।

एक दिन वे अत्यन्त विनम्र भाव से अपने पुत्र के चरणों में बैठ गईं। उनकी आँखों में जिज्ञासा थी, हृदय में वैराग्य था और वाणी में करुण प्रार्थना—

“हे पुत्र! मैं अज्ञान के कारण जन्म-मृत्यु के बन्धन में भटक रही हूँ। मुझे ऐसा ज्ञान दीजिए जिससे मैं परम सत्य को जान सकूँ और इस संसार-सागर से पार हो सकूँ।”

माता की यह विनती सुनकर भगवान् कपिलदेव का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने अपनी माता को आत्मा, परमात्मा, भक्ति, वैराग्य और योग का गूढ़ ज्ञान समझाया। उन्होंने बताया कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, बल्कि अमर आत्मा है, और भगवान् की भक्ति ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।

कपिलदेव के दिव्य उपदेश सुनते-सुनते माता देवहूति का अज्ञान नष्ट हो गया। उनके हृदय में ज्ञान का सूर्य उदित हो गया। संसार के सभी मोह और बन्धन टूट गए। उन्होंने भगवान् के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार किया और शीघ्र ही मोक्षपद को प्राप्त कर लिया।

यह दृश्य अत्यन्त भावपूर्ण था—एक पुत्र अपनी माता को केवल सांसारिक सुख नहीं, बल्कि अनन्त मुक्ति का मार्ग प्रदान कर रहा था।

माता को परम कल्याण का मार्ग दिखाने के बाद भगवान् कपिलदेव ने उनकी अनुमति ली और बिन्दुसरोवर से प्रस्थान कर समुद्र तट की ओर चले गए। वहाँ वे गहन समाधि और लोककल्याण के कार्यों में स्थित हो गए।

इसी समय एक अन्य घटना घटी जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।

राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा इन्द्र द्वारा छिपा दिया गया था। उसे खोजते-खोजते राजा सगर के साठ हजार पुत्र उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ भगवान् कपिलदेव समाधि में लीन थे। उनके पास ही यज्ञ का घोड़ा खड़ा था।

अज्ञान और अहंकार से भरे सगर-पुत्रों ने बिना विचार किए कपिलदेव पर ही घोड़ा चुराने का आरोप लगा दिया। उन्होंने एक महान योगी और भगवान् के अवतार का अपमान किया। यह गंभीर भागवत-अपराध था।

जब उनकी उद्दण्डता अपनी सीमा पर पहुँच गई, तब भगवान् कपिलदेव ने अपनी दिव्य दृष्टि खोली। उनके तेज के सामने सगर-पुत्रों का पाप टिक न सका और वे तत्काल भस्म हो गए।

किन्तु भगवान् का उद्देश्य दण्ड देना नहीं, बल्कि संसार को शिक्षा देना था कि संतों और भगवान् के भक्तों का अपमान कितना घातक हो सकता है।

बाद में राजा सगर के वंशज भगीरथ ने कठोर तपस्या की। उनकी प्रार्थना से स्वर्ग में प्रवाहित होने वाली पवित्र गंगाजी पृथ्वी पर अवतरित हुईं। गंगा के पवित्र जल के स्पर्श से सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ।

उस दिन से गंगाजी केवल सगर-पुत्रों की ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की उद्धारक बन गईं। आज भी करोड़ों लोग गंगा-स्नान करके आध्यात्मिक शांति और पवित्रता का अनुभव करते हैं।

भगवान् कपिलदेव ने आगे चलकर अनेक ऋषियों को सांख्यशास्त्र और सांख्ययोग का उपदेश दिया। उन्होंने संसार और आत्मा के भेद को स्पष्ट किया तथा मुक्ति का वैज्ञानिक मार्ग बताया। इसी कारण उन्हें सांख्ययोग का महान आचार्य माना जाता है।

आज भी गंगासागर संगम में भगवान् कपिलदेव की स्मृति श्रद्धापूर्वक पूजित है। उनकी कथा हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान वही है जो मनुष्य को भगवान् से जोड़ दे, अहंकार को मिटा दे और आत्मा को उसके शाश्वत स्वरूप का बोध करा दे।

संदेश:
जो ज्ञान भगवान् की भक्ति से जुड़ा हो, वही जीवन को प्रकाश देता है। और जो संतों तथा भगवान् के प्रति विनम्र रहता है, वही सच्चे कल्याण का अधिकारी बनता है।