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(२४)

ताटकावन का रहस्य और राम का संकल्प

 

 

निर्मल प्रभात का समय था। आकाश हल्की सुनहरी आभा से भर उठा था और शीतल समीर गंगातट को स्पर्श कर रही थी। नित्यकर्म से निवृत्त होकर महर्षि विश्वामित्र आगे-आगे चल रहे थे और उनके पीछे शत्रुओं का दमन करने वाले वीर श्रीराम तथा उनके अनुज लक्ष्मण गंभीर भाव से कदम बढ़ा रहे थे। तीनों गंगाजी के पावन तट पर पहुँचे। आश्रमवासी मुनियों ने आदरपूर्वक एक सुन्दर नाव मँगवाई और महर्षि से निवेदन किया कि वे राजकुमारों सहित शीघ्र नदी पार करें।

 

नाव धीरे-धीरे जल को चीरती हुई आगे बढ़ने लगी। गंगा की विशाल धाराएँ मानो आकाश का प्रतिबिम्ब समेटे बह रही थीं। तभी मध्यधारा में पहुँचते ही राम ने एक विचित्र, प्रचण्ड गर्जना-सी ध्वनि सुनी। जल आपस में टकरा रहा था और उस टकराहट में एक अद्भुत गूँज थी—गंभीर, रहस्यमयी और थोड़ी भयावह भी।

 

राम के मन में जिज्ञासा जाग उठी। उन्होंने विनम्र स्वर में विश्वामित्र से पूछा, “गुरुदेव, यह जल की भयानक ध्वनि कैसी है?”

 

महर्षि ने स्नेहभरी दृष्टि से राम की ओर देखा। उन्होंने बताया कि कैलास पर्वत पर ब्रह्मा के संकल्प से उत्पन्न मानस सरोवर से एक पवित्र नदी निकली—सरयू। वही सरयू यहाँ गंगा में आकर मिलती है। दो पावन धाराओं का यह संगम ही ऐसी तुमुल ध्वनि उत्पन्न करता है। यह केवल जल का मिलन नहीं, दो पवित्र शक्तियों का आलिंगन है।

 

राम और लक्ष्मण ने श्रद्धा से संगम को प्रणाम किया। उनके हृदय में प्रकृति के प्रति गहन आदर उमड़ आया। दक्षिण तट पर उतरकर वे शीघ्रता से आगे बढ़ने लगे। परंतु जैसे-जैसे वे आगे चले, वातावरण बदलने लगा। कोमल प्रभात का उजास अब सघन वृक्षों की छाया में विलीन हो गया। सामने एक घना, भयानक वन फैला था—निस्तब्ध, पर भीतर से अनगिनत रहस्यों से भरा हुआ।

 

वन में झिल्लियों की तीखी ध्वनि गूँज रही थी। हिंसक पशुओं की गर्जना, अजीब-सी बोली बोलते पक्षियों की कर्कश पुकार, और चारों ओर फैली अंधकारमयी छाया—सब मिलकर भय का वातावरण रच रहे थे। सिंह, व्याघ्र, हाथी और जंगली सूअर विचरण कर रहे थे। ऊँचे-ऊँचे वृक्ष—धव, अर्जुन, बेल, तेंदू और बेर—आकाश को ढँकते प्रतीत होते थे।

 

राम ने विस्मय और चिंता से पूछा, “गुरुदेव, यह वन इतना भयावह क्यों है? इसका इतिहास क्या है?”

 

विश्वामित्र का मुख गंभीर हो उठा। उन्होंने बताया कि यह स्थान कभी मलद और करूष नामक दो समृद्ध जनपदों का क्षेत्र था। यहाँ सुख, समृद्धि और शांति का वास था। परंतु कालचक्र ने करवट ली।

 

बहुत पहले जब देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया, तब उस असुर के संहार के बाद उन पर ब्रह्महत्या का दोष लगा। उनका शरीर मल से लिप्त हो गया, उनके भीतर तीव्र क्षुधा उत्पन्न हुई और वे अशांत हो उठे। उनका तेज क्षीण पड़ गया।”

 

देवताओं और महान ऋषियों ने इन्द्र की यह दशा देखी। वे उन्हें इस पवित्र भूमि पर लाए और गंगाजल से भरे कलशों द्वारा उनका अभिषेक किया। जैसे ही पवित्र जल उनके शरीर पर प्रवाहित हुआ, उनका मल धुल गया, क्षुधा शांत हुई और ब्रह्महत्या का दोष उनसे दूर हो गया। वे पुनः निर्मल, तेजस्वी और प्रसन्न हो उठे।

 

इन्द्र के शरीर से जो मल और क्षुधा दूर हुई, वही इस भूमि में समाहित हो गई। उसी कारण यह क्षेत्र ‘मलद’ और ‘करूष’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब इन्द्र ने प्रसन्न होकर इस भूमि को वरदान दिया—“यह स्थान समृद्ध होगा, धन-धान्य से परिपूर्ण होगा और यहाँ के लोग सुखी रहेंगे।”

 

दीर्घकाल तक यह प्रदेश सचमुच स्वर्ग के समान था। खेत लहलहाते थे, पशु निर्भय विचरते थे, और मनुष्यों के घरों में उत्सव मनाए जाते थे।

 

परंतु समय ने फिर करवट ली।

 

एक दिन यहाँ एक यक्षिणी आई—ताटका। वह साधारण स्त्री नहीं थी। वह इच्छानुसार रूप बदल सकती थी। उसके शरीर में एक हजार हाथियों का बल था। उसका क्रोध प्रचण्ड था और उसका हृदय निर्दय। वह सुन्द नामक दैत्य की पत्नी थी और उसका पुत्र था मारीच—जो अतिभयानक और इन्द्र के समान पराक्रमी था।

 

ताटका का शरीर विशाल था, उसकी भुजाएँ लंबी और गोल थीं, मुख विकराल और स्वर गर्जनापूर्ण। उसकी उपस्थिति मात्र से वन काँप उठता था।

 

उसने इस समृद्ध भूमि पर आतंक फैलाना आरम्भ कर दिया। वह मार्गों को घेर लेती, यात्रियों को मार डालती, ऋषियों के यज्ञ नष्ट कर देती और ग्रामों को उजाड़ देती। लोग अपने घर छोड़कर भाग गए। हँसी और गीत की जगह अब केवल भय की छाया रह गई।

 

महर्षि विश्वामित्र ने राम की ओर करुण दृष्टि से देखा—

 

“राम, यह वही भूमि है जो कभी इन्द्र के वरदान से समृद्ध हुई थी। पर आज ताटका के अत्याचार से उजड़ चुकी है। वह डेढ़ योजन तक के क्षेत्र को अपने आतंक से ढँके रहती है। कोई भी इस मार्ग से सुरक्षित नहीं गुजर सकता। यह वन इसलिए भयानक है—क्योंकि इसमें केवल वृक्षों का अंधकार नहीं, बल्कि निर्दोषों के आँसुओं की छाया भी है।”

 

वन की निस्तब्धता मानो इस पीड़ा की साक्षी थी।

 

“वत्स,” विश्वामित्र ने आगे कहा, “अब समय आ गया है कि यह भूमि फिर से शांति पाए। मेरी आज्ञा से तुम इस दुराचारिणी का अंत करो और इस देश को पुनः निष्कण्टक बनाओ। यह स्थान रमणीय है, पर भय ने इसकी सुंदरता को ढक लिया है।”

 

राम गंभीर हो गए। उनके कोमल नेत्रों में करुणा थी, पर भीतर धर्म का तेज भी प्रज्वलित हो उठा। यह केवल एक राक्षसी का वध नहीं था—यह अन्याय के विरुद्ध धर्म का दायित्व था।

 

लक्ष्मण ने अपने धनुष को दृढ़ता से थाम लिया। दोनों भाइयों के हृदय में अब एक ही संकल्प था—इस उजड़ी हुई भूमि को फिर से जीवन देना।

 

वन की हवा भारी थी, पर उस क्षण उसमें एक नई आशा का स्पंदन भी था।

 

धर्म और अधर्म का संघर्ष प्रारम्भ होने वाला था।

 

 

 

प्रश्नपत्र (Quiz)

पाठ के आधार पर बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

 

1. प्रभात के समय गंगातट का वातावरण कैसा था?

A. अंधकारमय और भयावह

B. सुनहरी आभा और शीतल समीर से युक्त

C. तूफानी और वर्षामय

D. अत्यंत शुष्क और गर्म

 

2. नाव मध्यधारा में पहुँचने पर राम ने कैसी ध्वनि सुनी?

A. पक्षियों का मधुर गीत

B. वीणा की ध्वनि

C. जल की प्रचण्ड गर्जना

D. बादलों की गड़गड़ाहट

 

3. सरयू नदी का उद्गम कहाँ से हुआ बताया गया है?

A. हिमालय से

B. यमुना से

C. मानस सरोवर से

D. नर्मदा से

 

4. सरयू और गंगा के संगम की ध्वनि किस कारण उत्पन्न होती थी?

A. जलप्रपात के कारण

B. दो पवित्र धाराओं के मिलन से

C. नाव की गति से

D. तूफान के कारण

 

5. दक्षिण तट पर उतरने के बाद उन्होंने किस स्थान की ओर प्रस्थान किया?

A. राजमहल

B. ग्राम

C. पर्वत

D. घने वन

 

6. इन्द्र को ब्रह्महत्या का दोष किसके वध के कारण लगा?

A. रावण

B. सुन्द

C. वृत्रासुर

D. मारीच

 

7. इन्द्र का अभिषेक किस जल से किया गया?

A. यमुना जल

B. सरयू जल

C. समुद्र जल

D. गंगाजल

 

8. ताटका किसकी पत्नी थी?

A. रावण

B. सुन्द

C. खर

D. विभीषण

 

9. ताटका के पुत्र का नाम क्या था?

A. खर

B. दूषण

C. मारीच

D. त्रिशिरा

 

10. ताटका में कितने हाथियों का बल बताया गया है?

A. सौ

B. पाँच सौ

C. एक हजार

D. दस हजार