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त्रिपथगा की दिव्य अवतरण कथा

 

रात्रि का शेष भाग अत्यंत शांत और गंभीर था। शोणभद्र के तट पर महर्षि विश्वामित्र अन्य ऋषियों सहित शयन कर रहे थे। आकाश में तारों की मद्धिम ज्योति फैल रही थी और नदी की धारा मंद स्वर में बहती हुई मानो रात्रि का गीत गा रही थी। धीरे-धीरे अंधकार छँटा, पूर्व दिशा में अरुणिमा फैलने लगी और पक्षियों का कलरव सुनाई देने लगा। प्रभात होते ही महर्षि विश्वामित्र ने स्नेहभरी वाणी में श्रीराम को संबोधित किया—रात्रि बीत चुकी है, अब उठो। उन्होंने आशीर्वचन देते हुए कहा कि दिन का आरंभ मंगलमय हो, और अब यात्रा की तैयारी करनी चाहिए।

 

गुरुवाणी सुनते ही श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता और तत्परता के साथ अपने नित्यकर्म पूर्ण किए। प्रातःकालीन शुचिता, संकल्प और संयम से युक्त होकर वे चलने के लिए प्रस्तुत हुए। शोणभद्र की विस्तृत और अथाह धारा को देखकर उनके मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने विनम्र स्वर में पूछा—यह पवित्र नदी अपने सुंदर तटों से सुशोभित है, परंतु इसकी गहराई और विस्तार देखकर लगता है कि इसे पार करना सरल नहीं होगा। हम किस मार्ग से इसे पार करेंगे?

 

विश्वामित्र ने शांत और आत्मविश्वासपूर्ण स्वर में उत्तर दिया कि जिस पथ से महर्षिगण इस नदी को पार करते आए हैं, उसी मार्ग का उन्होंने पूर्व से ही निश्चय कर रखा है। गुरु की वाणी में दृढ़ता थी और शिष्यों के हृदय में विश्वास।

 

तत्पश्चात् वे सब महर्षि विविध प्रकार के वनों की शोभा देखते हुए आगे बढ़े। कहीं पुष्पों की सुगंध बिखरी थी, कहीं वृक्षों की हरियाली ने वातावरण को शीतल बना रखा था। पक्षियों का मधुर कलरव और पवन का मृदु स्पर्श यात्रा को आनंदमय बना रहा था। लंबे मार्ग को पार करते-करते दोपहर का समय आया और वे सभी मुनियों द्वारा सेवित, सरिताओं में श्रेष्ठ गंगा के तट पर पहुँच गए।

 

गंगा का दर्शन करते ही सबके मन में अद्भुत प्रसन्नता भर उठी। हंस और सारस उसकी तरंगों पर विचर रहे थे। निर्मल जल सूर्यकिरणों में चाँदी-सा चमक रहा था। श्रीराम और लक्ष्मण सहित सभी ऋषि उस पुण्यसलिला के दर्शन से भावविभोर हो गए। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं पवित्रता साकार रूप में उनके सामने प्रवाहित हो रही हो।

 

सभी ने गंगा तट पर विश्राम हेतु डेरा डाला। विधिपूर्वक स्नान किया, देवताओं और पितरों का तर्पण किया। अग्निहोत्र संपन्न हुआ और फिर अमृत के समान मधुर हविष्य का सेवन किया गया। वातावरण में संतोष, शांति और पवित्रता की गहन अनुभूति थी। सभी महर्षि प्रसन्नचित्त होकर महात्मा विश्वामित्र को घेरकर बैठ गए। श्रीराम और लक्ष्मण भी आदरपूर्वक अपने स्थान पर विराजमान हुए।

 

उस पवित्र क्षण में श्रीराम के हृदय में जिज्ञासा जागी। उन्होंने विनम्र भाव से प्रश्न किया—हे भगवन्! यह गंगा तीनों लोकों में प्रवाहित होकर समुद्र तक कैसे पहुँची? यह त्रिपथगा कैसे बनी? उनका प्रश्न केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि श्रद्धा और ज्ञान की पिपासा से प्रेरित था।

 

महामुनि विश्वामित्र ने गंगा की उत्पत्ति की अद्भुत कथा आरंभ की। उन्होंने बताया कि हिमवान नामक पर्वत है—जो समस्त पर्वतों का राजा है, धातुओं का भंडार है, और जिसकी महिमा अनुपम है। उसकी दो कन्याएँ थीं, जिनकी सुंदरता और तेज की तुलना पृथ्वी पर कहीं नहीं थी।

 

हिमवान की पत्नी थीं मेना—मेरु पर्वत की मनोहर पुत्री। उन्हीं के गर्भ से दो दिव्य कन्याओं का जन्म हुआ। पहली कन्या थीं गंगा—निर्मल, तेजस्विनी और लोकपावनी। वे हिमवान की ज्येष्ठ पुत्री थीं। दूसरी कन्या थीं उमा—जो आगे चलकर कठोर तपस्या और अद्वितीय त्याग की प्रतिमूर्ति बनीं।

 

कुछ समय पश्चात् देवताओं ने देवकार्य की सिद्धि के लिए गंगा को हिमालय से माँगा। उन्हें ज्ञात था कि गंगा का अवतरण त्रिभुवन के कल्याण के लिए आवश्यक है। हिमवान ने भी लोकहित की भावना से अपनी स्वच्छंद विचरनेवाली पुत्री गंगा को धर्मपूर्वक देवताओं को समर्पित कर दिया। पिता के हृदय में स्नेह अवश्य था, परंतु लोकमंगल की भावना उससे भी महान थी।

 

देवता गंगा को लेकर अत्यंत संतोष और कृतार्थता का अनुभव करते हुए चले गए। वे जानते थे कि यह दिव्य धारा समस्त लोकों को पवित्र करेगी।

 

उधर दूसरी कन्या उमा ने कठोर तपस्या आरंभ की। उनका जीवन संयम और तप का पर्याय बन गया। उन्होंने तपोबल का अद्भुत संचय किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर हिमवान ने उन्हें अनुपम प्रभावशाली भगवान रुद्र के साथ विवाह-सूत्र में बाँध दिया। उमा आगे चलकर जगत् में पूज्या बनीं।

 

इस प्रकार गंगा और उमा—दोनों हिमालय की कन्याएँ—जगत् में वंदनीय हुईं। गंगा पवित्रता और प्रवाह की प्रतीक बनीं, तो उमा तप और शक्ति की।

 

विश्वामित्र ने आगे बताया कि गंगा पहले आकाशमार्ग में प्रवाहित हुईं, फिर देवलोक में रमणीय देवनदी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। वहाँ से वे पुनः पृथ्वी पर अवतीर्ण हुईं और पापों का नाश करती हुई रसातल तक पहुँचीं। इस प्रकार वे त्रिपथगा कहलायीं—तीनों लोकों में प्रवाहित होने वाली।

 

गंगा की इस दिव्य कथा को सुनते हुए श्रीराम और लक्ष्मण के हृदय में श्रद्धा और विस्मय का अद्भुत संगम उमड़ आया। गंगा की प्रत्येक तरंग मानो उनके सामने जीवंत होकर अपना इतिहास कह रही थी—त्याग, करुणा, तप और लोकमंगल की अमर गाथा।