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त्रिपथगा की प्रस्तावना : उमा, शिव और दिव्य रहस्य

 

जब तपोधन महर्षि विश्वामित्र की वाणी विराम को पहुँची, तब वन की निस्तब्धता में जैसे कथा का प्रभाव अब भी स्पंदित हो रहा था। श्रीराम और लक्ष्मण, दोनों ही उस अद्भुत धर्ममयी कथा से भावविभोर थे। उनके नेत्रों में श्रद्धा थी, मन में जिज्ञासा और हृदय में वह पवित्र आकांक्षा, जो केवल सत्य के अन्वेषी के भीतर जन्म लेती है। उन्होंने विनम्रतापूर्वक मुनिवर की वंदना की और अत्यंत आदर से कहा— “ब्रह्मन्! आपने धर्म का जो पावन प्रकाश हमारे अंतःकरण में भर दिया है, वह अविस्मरणीय है। अब हमारी एक और जिज्ञासा है। गिरिराज हिमवान् की ज्येष्ठ पुत्री गंगा—जो स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों से संबंध रखती हैं—उनकी दिव्य कथा हमें विस्तार से सुनाइये। वे तीन धाराओं में क्यों प्रवाहित होती हैं? ‘त्रिपथगा’ नाम से उनकी कीर्ति क्यों गूँजती है? और तीनों लोकों में वे अपनी पावन धाराओं से कौन-सा कल्याणकारी कार्य संपन्न करती हैं?”

 

राम के इन प्रश्नों में केवल जिज्ञासा नहीं थी, अपितु समस्त लोककल्याण का भाव छिपा था। विश्वामित्र ने जब राम के करुण, गंभीर और धर्मपूर्ण स्वर को सुना, तो उनके तपस्वी हृदय में भी एक मधुर स्पंदन उठा। मुनिमंडली के मध्य वे शांत भाव से बैठे और बोले— “रघुनंदन! गंगा की कथा को समझने से पहले तुम्हें एक और गूढ़ प्रसंग जानना होगा—जो उनकी उत्पत्ति की भूमिका है।”

 

उन्होंने कहना आरम्भ किया— प्राचीन काल में भगवान् शिव, जिन्हें नीलकण्ठ भी कहा जाता है, ने उमा के साथ विवाह किया। जब उमा नववधू के रूप में कैलास पर आईं, तब समस्त सृष्टि मानो आनंद से भर उठी। शिव, जो सदा विरक्त और समाधिस्थ रहते थे, उस समय प्रेम के मधुर भाव में निमग्न हो गए। वे उमा के साथ रति-क्रीड़ा में ऐसे लीन हुए कि काल भी जैसे थम-सा गया। सौ दिव्य वर्ष बीत गए—देवताओं के लिए जो समय क्षणवत होता है—परंतु उस मधुर मिलन का अंत नहीं हुआ।

 

किन्तु आश्चर्य यह था कि इतने दीर्घ समय के पश्चात भी उमा के गर्भ से कोई संतान उत्पन्न न हुई। देवताओं के मन में चिंता का बादल छा गया। वे सोचने लगे— “यदि रुद्र का अनंत तेज किसी रूप में प्रकट हो गया, तो कौन उसके प्रभाव को सह सकेगा? उसका प्रचंड प्रकाश कहीं तीनों लोकों को भस्म न कर दे!” इस भय और लोकहित की भावना से प्रेरित होकर ब्रह्मा सहित समस्त देवगण शिव के समीप पहुँचे। उन्होंने विनयपूर्वक प्रणाम किया और निवेदन किया— “देवदेव महादेव! आप सृष्टि के आधार हैं। यदि आपका तेज असीम रूप में प्रकट हुआ तो लोकों की रक्षा कैसे होगी? कृपा कर संयम धारण करें और तप के द्वारा अपने तेज को स्वयं में ही स्थित रखें।”

 

शिव ने शांत स्वर में उनकी प्रार्थना स्वीकार की। वे बोले— “यदि यही लोकहित में है, तो हम अपने तेज को अपने भीतर ही धारण करेंगे। किंतु यदि वह तेज क्षुब्ध होकर बाहर प्रकट हो जाए, तो उसे कौन सँभालेगा?” देवताओं ने उत्तर दिया— “भगवन्! पृथ्वी देवी उस दिव्य तेज को धारण करेंगी।”

 

जब समय आया, तब शिव का अद्भुत तेज पृथ्वी पर अवतरित हुआ। वह तेज इतना प्रबल था कि पर्वत, वन, नदियाँ—सब उसी से व्याप्त हो गए। पृथ्वी उस भार से कंपित हो उठी। तब देवताओं ने अग्निदेव से प्रार्थना की— “हे अग्नि! वायु के सहयोग से इस तेज को अपने भीतर धारण करो।” अग्नि ने उस दिव्य ऊर्जा को आत्मसात किया। उस तेज से श्वेत पर्वत प्रकट हुआ और उसके समीप दिव्य सरकंडों का वन उदित हुआ, जो अग्नि और सूर्य के समान ज्योतिमान था।

 

उसी पावन वन में अग्निजनित तेज से एक दिव्य बालक प्रकट हुआ— कार्तिकेय। उसका जन्म केवल एक संतान का जन्म नहीं था, वह देवशक्ति के संतुलन का प्रतीक था। देवताओं और ऋषियों ने हर्षोल्लास से शिव और उमा की स्तुति की।

 

किन्तु जब उमा ने यह देखा कि उनके मातृत्व की स्वाभाविक कामना में देवताओं ने विघ्न डाला, तो उनके नेत्र क्रोध से लाल हो उठे। उनके हृदय में वेदना थी—एक नारी के अधूरे मातृत्व की वेदना। उन्होंने रोषपूर्वक देवताओं को शाप दिया— “तुमने मेरे पुत्र की प्राप्ति में बाधा डाली है। अतः अब तुम भी अपनी पत्नियों से संतान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं रहोगे।” यह केवल क्रोध नहीं था, यह एक आहत स्त्री की करुण पुकार थी।

 

उमा ने पृथ्वी को भी शाप दिया— “भूमे! तू अनेक जनों की भार्या बनेगी, तेरा एक रूप नहीं रहेगा। और तू पुत्रजनित सुख से वंचित रहेगी।” पृथ्वी उस शाप से व्यथित हो उठी। सृष्टि का संतुलन डोल गया।

 

देवताओं को इस शाप से पीड़ित देख शिव ने मौन धारण किया। वे पश्चिम दिशा की ओर चले गए और फिर हिमालय के उत्तर भाग में, एक निर्जन शिखर पर उमा के साथ कठोर तप में लीन हो गए। वहाँ, हिम के मध्य, मौन और ध्यान के बीच, उन्होंने अपने तेज को संयमित किया—और सृष्टि को एक नई दिशा देने का संकल्प लिया।

 

विश्वामित्र ने राम की ओर देख कर कहा— “रघुनंदन! यह कथा गिरिराज हिमवान् की छोटी पुत्री उमा का विस्तृत प्रसंग है। अब तुम्हें गंगा के प्रादुर्भाव की दिव्य कथा सुनाऊँगा—जिससे तुम्हें ज्ञात होगा कि क्यों वे त्रिपथगा कहलाती हैं और कैसे तीनों लोकों का कल्याण करती हैं।”

 

वन की वायु गंभीर हो उठी। राम और लक्ष्मण की आँखों में अगली कथा के लिए उत्सुकता थी। गंगा की महिमा का द्वार अब खुलने वाला था।