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त्रिशंकु का सशरीर स्वर्ग और विश्वामित्र का अटल संकल्प 

 

वन का वातावरण गंभीर था। हवा में एक अजीब-सी तन्मयता थी। तभी महर्षि शतानन्द श्रीराम से बोले—

“रघुनन्दन! जब महर्षि विश्वामित्र ने यह जाना कि महोदय सहित वसिष्ठ के पुत्र उनके तपोबल से नष्ट हो चुके हैं, तब उनका तेज और भी प्रचंड हो उठा। ऋषियों की सभा में बैठे हुए उन्होंने अत्यंत दृढ़ स्वर में कहना आरम्भ किया…”

 

विश्वामित्र का संकल्प और त्रिशंकु की आशा

विश्वामित्र ने सभा में उपस्थित ऋषियों से कहा—

“मुनिवरो! ये इक्ष्वाकु वंश में जन्मे महान राजा त्रिशंकु हैं। ये धर्मात्मा हैं, दानी हैं, और अब मेरी शरण में आए हैं। इनकी एक अद्भुत इच्छा है—ये अपने इसी शरीर से स्वर्गलोक प्राप्त करना चाहते हैं। इसलिए आप सब मेरे साथ मिलकर ऐसा यज्ञ करें जिससे ये सशरीर स्वर्ग जा सकें।”

 

सभा में क्षणभर के लिए मौन छा गया। ऋषियों ने एक-दूसरे की ओर देखा। यह इच्छा असाधारण थी—किसी मनुष्य का शरीर सहित स्वर्ग जाना नियम के विरुद्ध माना जाता था। परन्तु वे जानते थे कि विश्वामित्र अत्यंत तेजस्वी और क्रोधी हैं।

 

उन्होंने आपस में धीरे-धीरे विचार किया—

“विश्वामित्र अग्नि के समान तेजस्वी हैं। यदि इनकी बात न मानी गई तो वे क्रोधित होकर शाप दे सकते हैं। उचित यही है कि इनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया जाए।”

 

अंततः सभी ने एकमत होकर निश्चय किया—

यज्ञ आरम्भ होगा। त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग जाएंगे।

 

यज्ञ का आरम्भ — आशा का निर्माण

तैयारियाँ शुरू हुईं। यज्ञशाला बनी। पवित्र वेदियाँ सजाईं गईं।

स्वयं महातेजस्वी विश्वामित्र याजक बने। अन्य ब्राह्मण ऋत्विज बने। मंत्रों की ध्वनि वातावरण में गूंजने लगी।

 

घंटों… दिनों… और फिर लंबे समय तक मंत्रोच्चारण चलता रहा।

अंत में विश्वामित्र ने देवताओं का आवाहन किया—

“हे देवगण! आकर अपने भाग ग्रहण करें।”

 

लेकिन आश्चर्य!

कोई देवता नहीं आया।

यज्ञशाला में एक भारी सन्नाटा छा गया।

 

क्रोध की ज्वाला — तप का प्रयोग

यह देखकर विश्वामित्र का चेहरा लाल हो उठा। उनकी आँखों में अग्नि-सी चमक उठी। उन्होंने स्रुवा उठाई और क्रोध में बोले—

 

“राजन् त्रिशंकु! अब मेरे तप का प्रभाव देखो।

मैं तुम्हें अपनी शक्ति से अभी इसी शरीर सहित स्वर्ग में भेजता हूँ।

यदि मेरी तपस्या में कुछ भी सत्य है—तो तुम अभी स्वर्ग जाओ।”

 

जैसे ही उन्होंने यह कहा—

सभा में बैठे सभी ऋषियों के सामने अद्भुत घटना घटी।

 

त्रिशंकु का शरीर धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा।

धरती उनसे दूर होने लगी।

आकाश खुलता गया।

वे सचमुच स्वर्ग की ओर जा रहे थे।

 

इन्द्र का विरोध

त्रिशंकु स्वर्गलोक पहुँचे। देवताओं ने उन्हें देखा।

इन्द्र ने क्रोध से कहा—

 

“मूर्ख त्रिशंकु! यहाँ तुम्हारा कोई स्थान नहीं।

तुम गुरु के शाप से चाण्डाल हो चुके हो।

स्वर्ग में तुम्हारा प्रवेश नहीं हो सकता।

नीचे गिर जाओ!”

 

इन्द्र के वचन बिजली की तरह गिरे।

तुरंत त्रिशंकु का शरीर नीचे गिरने लगा।

 

त्रिशंकु की करुण पुकार

आकाश से गिरते हुए त्रिशंकु भय से चिल्लाने लगे—

“विश्वामित्र! त्राहि! त्राहि! बचाइए!”

 

उनकी आवाज़ करुण थी…

डर से भरी…

निराशा से कांपती हुई।

 

विश्वामित्र ने यह पुकार सुनी।

उनका क्रोध और भड़क उठा।

 

उन्होंने आकाश की ओर देखकर कहा—

“राजन्! वहीं ठहर जाओ!”

 

और उसी क्षण—

त्रिशंकु गिरते-गिरते बीच आकाश में रुक गए।

वे उल्टे लटके रह गए—न ऊपर, न नीचे।

 

विश्वामित्र की अद्भुत सृष्टि

विश्वामित्र का क्रोध अब सृजन में बदल गया।

उन्होंने संकल्प किया—

“मैं नया स्वर्ग बनाऊँगा!”

 

उन्होंने दक्षिण दिशा में नए सप्तर्षियों की रचना की।

नए नक्षत्र बनाए।

आकाश में नई ज्योतिर्मालाएँ प्रकट हो गईं।

 

उनका तेज इतना प्रचंड था कि ऐसा लग रहा था मानो दूसरा ब्रह्मा सृष्टि कर रहा हो।

 

उन्होंने सोचा—

“मैं नया इन्द्र भी बना दूँगा।

या बिना इन्द्र के ही नया स्वर्ग रहेगा!”

 

देवताओं का भय और निवेदन

जब विश्वामित्र क्रोध में नए नक्षत्र, नई सृष्टि और नया इन्द्र बनाने लगे, तब यह देखकर सभी देवता, असुर और ऋषिगण अत्यंत घबरा गये।

उन्हें लगा कि यदि विश्वामित्र अपनी नई सृष्टि बना देंगे, तो जगत का नियम ही बदल जायेगा।

 

इसलिए वे सभी एक साथ वहाँ आये और विनम्र होकर बोले—

 

“महाभाग! राजा त्रिशंकु गुरु के शाप से चाण्डाल हो गये हैं।

उनका पुण्य नष्ट हो चुका है।

इस कारण वे सशरीर स्वर्ग जाने के अधिकारी नहीं हैं।”

 

देवताओं का आशय स्पष्ट था—

वे चाहते थे कि विश्वामित्र अपनी जिद छोड़ दें और त्रिशंकु को स्वर्ग में न भेजें।

 

विश्वामित्र का दृढ़ उत्तर

देवताओं की बात सुनकर विश्वामित्र ने शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा—

 

“देवगण! मैंने राजा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजने की प्रतिज्ञा की है।

मैं अपनी प्रतिज्ञा को असत्य नहीं कर सकता।”

 

उनके शब्दों में अटल संकल्प था।

वे अपनी बात से पीछे हटने वाले नहीं थे।

 

विश्वामित्र की शर्त 

विश्वामित्र आगे बोले—

 

“राजा त्रिशंकु को सदा स्वर्गलोक का सुख प्राप्त होता रहे।

मैंने जो नक्षत्र बनाए हैं, वे भी बने रहें।

जब तक संसार रहे, तब तक मेरी बनाई हुई यह सृष्टि बनी रहे।

देवताओं! आप सब इन बातों को स्वीकार करें।”

 

अर्थात् उन्होंने तीन बातें रखीं —

  1. त्रिशंकु को स्वर्ग का स्थान मिले
  2. उनके बनाए नक्षत्र बने रहें
  3. यह व्यवस्था स्थायी रहे

 

देवताओं की स्वीकृति 

देवताओं ने विचार करके कहा—

 

“महर्षि! ऐसा ही हो।

आपके बनाए नक्षत्र आकाश में वैश्वानरपथ के बाहर प्रकाशित होंगे।

उन ज्योतिर्मय नक्षत्रों के बीच त्रिशंकु सिर नीचे किये हुए स्थित रहेंगे।

उनकी स्थिति देवताओं के समान होगी।

ये नक्षत्र उनके साथ रहेंगे।”

 

इस प्रकार देवताओं ने विश्वामित्र की बात मान ली।

त्रिशंकु को आकाश में ही स्थान दे दिया गया।

 

विश्वामित्र की स्तुति और प्रसन्नता 

इसके बाद देवताओं ने ऋषियों के सामने विश्वामित्र की स्तुति की।

विश्वामित्र प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

इस प्रकार विवाद समाप्त हो गया।

 

यज्ञ की समाप्ति

फिर यज्ञ समाप्त हुआ।

देवता अपने-अपने लोक को लौट गये।

ऋषि भी अपने आश्रमों को चले गये।

और त्रिशंकु आकाश में उसी स्थिति में स्थिर रहे।