Best Historical and Knowledgeable Content here... Know More.

  • +91 8005792734

    Contact Us

  • amita2903.aa@gmail.com

    Support Email

  • Jhunjhunu, Rajasthan

    Address

(36)
दशरथ का टूटता हृदय और कैकेयी का कठोर अहंकार

अयोध्या का राजमहल उस समय शोक का समुद्र बन चुका था। जिन प्रांगणों में कभी वीणाओं की मधुर ध्वनि गूँजती थी, वहाँ अब केवल करुण आहें सुनाई दे रही थीं। महाराज दशरथ का हृदय मानो भीतर-ही-भीतर फट रहा था। एक ओर वे सत्यप्रतिज्ञ राजा थे, दूसरी ओर एक असहाय पिता, जिसकी आँखों के सामने उसका प्राणों से प्रिय पुत्र वन की ओर भेजा जा रहा था।

दशरथ का व्याकुल हृदय

महाराज दशरथ आँसुओं से भीगे नेत्रों के साथ गहरी साँस लेते हुए सारथि सुमन्त्र से बोले। उनका स्वर काँप रहा था। ऐसा लग रहा था मानो प्रत्येक शब्द उनके हृदय को चीरकर बाहर आ रहा हो।

उन्होंने कहा—
“सुमन्त्र! शीघ्र आदेश दो कि रत्नों से सुसज्जित विशाल चतुरंगिणी सेना श्रीराम के पीछे-पीछे चले। मेरे राम अकेले वन कैसे जाएँगे? वे राजकुमार हैं, समस्त प्रजा के प्राण हैं। वन की कठिनाइयाँ उनके योग्य नहीं।”

दशरथ के मन में यह भाव था कि यदि राम वन जाएँ भी, तो उन्हें किसी प्रकार का दुःख न हो। वे चाहते थे कि राजवैभव भी राम के साथ चला जाए।

उन्होंने आगे कहा—
“सुन्दर वाणी बोलने वाली स्त्रियाँ, सम्पन्न वैश्य, व्यापार में कुशल लोग — सब राम के साथ जाएँ। जहाँ राम रहेंगे, वहीं अयोध्या बस जानी चाहिए।”

यह केवल एक आदेश नहीं था; यह उस पिता की तड़प थी जो अपने पुत्र के जीवन से हर कष्ट को दूर रखना चाहता था।

फिर वे बोले—
“जो लोग राम के आश्रित हैं, जो मल्ल उनके पराक्रम से प्रसन्न रहते हैं, उन सबको धन देकर उनके साथ भेज दो।”

दशरथ जानते थे कि राम केवल राजकुमार नहीं थे; वे जन-जन के प्रिय थे। उनके साथ चलना लोगों के लिये सम्मान और प्रेम दोनों था।

उन्होंने आगे वन की कल्पना करते हुए कहा—
“मुख्य अस्त्र-शस्त्र, नगरवासी, छकड़े, वन का ज्ञान रखने वाले शिकारी — सब राम के साथ जाएँ।”

उनकी कल्पना में राम वन में अकेले नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती अयोध्या के साथ जा रहे थे।

दशरथ का मन बार-बार यह सोचकर टूट रहा था कि राम निर्जन वन में कैसे रहेंगे। इसलिए वे कहने लगे—
“राम मार्ग में मृगों और हाथियों को देखेंगे, मधु पियेंगे, नदियों का दर्शन करेंगे — शायद इस प्रकार वे राज्य का दुःख भूल जाएँ।”

यह शब्द सुनकर सभा में बैठे लोगों का हृदय रो पड़ा। दशरथ स्वयं को समझाने का प्रयास कर रहे थे, मानो अपने ही हृदय को धोखा दे रहे हों।

फिर उन्होंने अत्यन्त करुण स्वर में कहा—
“मेरा खजाना और अन्नभण्डार भी राम के साथ जाए। वे वन में यज्ञ करेंगे, ऋषियों को दक्षिणा देंगे और सुख से रहेंगे।”

दशरथ चाहते थे कि राम जहाँ रहें, वहाँ धर्म, वैभव और सम्मान बना रहे।

अन्त में उन्होंने भारी मन से कहा—
“भरत अयोध्या का पालन करेंगे। पर राम को हर सुख देकर विदा किया जाए।”

यह कहते-कहते उनकी आँखों से आँसू निरन्तर बह रहे थे।

 

कैकेयी का भय और कठोरता

जब कैकेयी ने यह सब सुना, तो उसके मन में भय उत्पन्न हुआ। उसे लगा कि यदि सम्पूर्ण वैभव राम के साथ चला गया, तो भरत के लिये राज्य में क्या बचेगा?

उसका मुँह सूख गया, स्वर रुँध गया; फिर भी उसने कठोर शब्दों में कहा—

“जिस सुरा का सार निकल चुका हो, उसे कोई नहीं पीता। उसी प्रकार यदि सारा धन और वैभव राम के साथ चला गया, तो भरत इस सूने राज्य को स्वीकार नहीं करेंगे।”

सभा स्तब्ध रह गयी। एक माँ के मुख से ऐसे शब्द! वहाँ उपस्थित लोग सोच भी नहीं पा रहे थे कि कैकेयी इतनी कठोर कैसे हो सकती है।

 

दशरथ का फूटता क्रोध

अब तक शोक में डूबे दशरथ के भीतर अचानक क्रोध की ज्वाला भड़क उठी।

उन्होंने कहा—
“अनार्ये! अहित करने वाली स्त्री! मैं पहले ही राम-वियोग का असहनीय भार ढो रहा हूँ, और तू अपने कटु वचनों से मुझे और पीड़ा दे रही है?”

उनका स्वर काँप रहा था। वे आगे बोले—
“यदि तू चाहती थी कि राम अकेले वन जाएँ, तो पहले ही क्यों नहीं कह दिया? अब क्यों उनके साथ सेना और सामग्री भेजने से रोक रही है?”

दशरथ का हृदय टूट चुका था। वे समझ चुके थे कि कैकेयी का उद्देश्य केवल वनवास नहीं, बल्कि राम को हर प्रकार से कष्ट देना था।

 

कैकेयी का निर्दयी उत्तर

दशरथ के क्रोध से कैकेयी तनिक भी नहीं पिघली। उलटे वह और कठोर हो गयी।

उसने कहा—
“आपके वंश में राजा सगर ने भी अपने ज्येष्ठ पुत्र असमञ्ज को निकाल दिया था। उसी प्रकार राम को भी निकल जाना चाहिए।”

ये शब्द सुनते ही सभा में मानो बिजली गिर पड़ी। सभी लोग लज्जा से सिर झुकाकर बैठ गये।

दशरथ केवल इतना ही कह सके—
“धिक्कार है!”

पर कैकेयी को अपने शब्दों की कठोरता का तनिक भी बोध नहीं हुआ।

 

मन्त्री सिद्धार्थ का धर्मपूर्ण उत्तर

सभा में उपस्थित वृद्ध मन्त्री सिद्धार्थ अत्यन्त धर्मात्मा और बुद्धिमान थे। वे अब तक मौन थे, पर कैकेयी की बात सुनकर उनसे रहा नहीं गया।

उन्होंने शांत किन्तु दृढ़ स्वर में कहा—

“देवि! असमञ्ज दुष्ट था। वह खेलते हुए बच्चों को पकड़कर सरयू में फेंक देता था और उनकी पीड़ा देखकर आनन्दित होता था।”

सभा भय और घृणा से भर उठी।

सिद्धार्थ आगे बोले—
“नगरवासी क्रोधित होकर राजा सगर के पास गये और बोले— या तो असमञ्ज को रखिये या हमें।”

जब राजा सगर ने कारण पूछा, तब प्रजा ने कहा—
“यह हमारे बच्चों को पकड़कर नदी में फेंक देता है। उनकी घबराहट देखकर इसे आनन्द मिलता है।”

यह सुनकर राजा सगर ने धर्म और प्रजा के हित के लिये अपने पुत्र का त्याग कर दिया।

सिद्धार्थ ने कहा—
“असमञ्ज पापी था, इसलिये त्यागा गया। पर राम ने कौन-सा अपराध किया है?”

अब उनका स्वर भावुक हो उठा—

“हमने तो राम में कोई दोष नहीं देखा। जैसे शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा में कलंक ढूँढना कठिन है, वैसे ही राम में दोष ढूँढना असम्भव है।”

फिर उन्होंने चुनौती देते हुए कहा—

“यदि तुम्हें राम में कोई दोष दिखता है, तो बताओ।”

कैकेयी मौन रह गयी।

सिद्धार्थ आगे बोले—
“जो पुरुष सदैव धर्ममार्ग पर चलता हो, उसका त्याग करना धर्म के विरुद्ध है। ऐसा अधर्म तो इन्द्र के तेज को भी जला देगा।”

अन्त में उन्होंने कहा—
“देवि! राम के राज्याभिषेक में विघ्न डालकर तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। कम-से-कम लोकनिन्दा से तो बचो।”

सभा में बैठे सभी लोग सिद्धार्थ की वाणी सुनकर भीतर से काँप उठे। यह केवल उपदेश नहीं था; यह धर्म की पुकार थी।

 

दशरथ का अंतिम टूटना

सिद्धार्थ की बातें सुनकर दशरथ का हृदय और अधिक शोक से भर गया।

उन्होंने थके हुए, टूटे हुए स्वर में कैकेयी से कहा—

“पापिनि! क्या तुझे यह सब उचित लगता है? तुझे न अपने हित का ज्ञान है, न मेरे।”

अब उनके शब्दों में पीड़ा, क्रोध और निराशा सब एक साथ बह रहे थे।

वे बोले—
“तू दुःख के मार्ग पर चल रही है। तेरी सारी चेष्टा सज्जनों के मार्ग के विपरीत है।”

फिर उन्होंने वह बात कही जिसने सभा को स्तब्ध कर दिया—

“अब मैं भी यह राज्य, धन और सुख छोड़कर राम के पीछे चला जाऊँगा। ये सब लोग भी उन्हीं के साथ जाएँगे। तू अकेली भरत के साथ राज्य भोगना।”

यह केवल क्रोध नहीं था। यह उस पिता की अंतिम पुकार थी जिसने समझ लिया था कि राम के बिना उसके लिये अयोध्या, सिंहासन और जीवन — सब शून्य हैं।

उस क्षण अयोध्या का वैभव फीका पड़ चुका था।
राजा टूट चुका था।
सभा रो रही थी।
धर्म घायल था।
और राम — अभी भी शांत, आज्ञाकारी और पिता के वचन की रक्षा के लिये वन जाने को तैयार थे।