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दिव्यास्त्रों का अलौकिक समर्पण

 

ताटका वन की वह रात्रि अद्भुत शांति से भरी थी। वृक्षों की छाया में मंद पवन बह रही थी, मानो प्रकृति स्वयं किसी महान घटना की साक्षी बनने को स्थिर हो गई हो। दानवी ताटका के वध के बाद वातावरण में भय का अंधकार छंट चुका था। उसी शांत प्रहर में महायशस्वी मुनि विश्वामित्र के मुखमंडल पर गहन संतोष की आभा झलक रही थी। वे मधुर हास्य के साथ अपने सम्मुख खड़े कोमल-वय, किंतु अदम्य पराक्रम से युक्त श्रीराम को निहार रहे थे।

 

उनकी वाणी में स्नेह था, आशीर्वाद था, और गर्व भी। उन्होंने कहा कि आज वे अत्यंत प्रसन्न हैं। ताटका का वध केवल एक राक्षसी का अंत नहीं, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना का प्रारंभ था। राम के भीतर जो धैर्य, करुणा और वीरता का संगम था, उसने मुनि के हृदय को तृप्त कर दिया था। इस संतोष के फलस्वरूप वे राम को वे सभी दिव्यास्त्र प्रदान करना चाहते थे, जिनकी कामना देवता भी करते हैं।

 

उन्होंने राम को आश्वस्त किया कि इन अस्त्रों के प्रभाव से वे किसी भी शत्रु—देव, दानव, गंधर्व या नाग—को रणभूमि में परास्त कर सकेंगे। यह केवल युद्ध की शक्ति नहीं थी; यह धर्म की रक्षा का दायित्व था, जो अब राम के कंधों पर सौंपा जा रहा था।

 

मुनि ने एक-एक करके उन दिव्यास्त्रों का स्मरण किया। उन्होंने दण्डचक्र, धर्मचक्र, कालचक्र और विष्णुचक्र जैसे महाशक्तिशाली अस्त्रों का उल्लेख किया, जो समय, न्याय और संहार के प्रतीक थे। ऐन्द्रचक्र की भयंकरता का वर्णन करते हुए उनकी वाणी में गंभीरता आ गई—यह इन्द्र की दिव्य शक्ति का प्रतीक था।

 

फिर उन्होंने इन्द्र का वज्रास्त्र, शिव का त्रिशूल और ब्रह्मा का ब्रह्मशिर अस्त्र देने की बात कही। इन नामों का उच्चारण करते समय उनके स्वर में श्रद्धा थी, मानो वे सृष्टि की मूल शक्तियों को पुकार रहे हों। साथ ही उन्होंने ऐषीकास्त्र और परम उत्तम ब्रह्मास्त्र का भी वरदान दिया—ऐसे अस्त्र, जिनका प्रयोग केवल अत्यंत धर्मनिष्ठ और संयमी योद्धा ही कर सकता है।

 

वे रुके नहीं। उन्होंने मोदकी और शिखरी नामक दिव्य गदाएँ अर्पित कीं, जो शौर्य और स्थिरता का प्रतीक थीं। धर्मपाश, कालपाश और वरुणपाश जैसे अस्त्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने समझाया कि ये शत्रु को बाँधनेवाले हैं—केवल देह से नहीं, उसके अधर्म से भी।

 

उन्होंने सूखी और गीली अशनि, पिनाक और नारायणास्त्र प्रदान किए। अग्नि का प्रिय आग्नेयास्त्र, जो शिखरास्त्र के नाम से प्रसिद्ध है, और वायु का प्रधान वायव्यास्त्र भी राम को समर्पित किया। इन अस्त्रों में अग्नि की ज्वाला और वायु की वेगवत्ता समाहित थी।

 

हयशिरा, क्रौञ्च और शक्तियाँ—इन सबका स्मरण करते हुए मुनि ने बताया कि ये युद्धभूमि में अद्वितीय प्रभाव उत्पन्न करते हैं। कंकाल, घोर मूसल, कपाल और किङ्किणी जैसे अस्त्र राक्षस-वध के लिए विशेष रूप से उपयोगी बताए गए।

 

उन्होंने नन्दन नामक विद्याधरों का महान अस्त्र और एक उत्तम खड्ग भी अर्पित किया। गन्धर्वों का प्रिय सम्मोहनास्त्र, प्रस्वापन, प्रशमन और सौम्य अस्त्र देकर उन्होंने यह स्पष्ट किया कि हर शक्ति केवल विनाश के लिए नहीं, शांति और नियंत्रण के लिए भी होती है।

 

वर्षण, शोषण, संतापन और विलापन जैसे अस्त्र प्रकृति के विविध रूपों का प्रतिनिधित्व करते थे। कामदेव का प्रिय मादनास्त्र, मानवास्त्र और मोहनास्त्र भी राम को सौंपे गए—ये मन और भावनाओं पर प्रभाव डालनेवाले थे।

 

तामस, सौमन, संवर्त, दुर्जय, मौसल, सत्य और मायामय अस्त्रों का उल्लेख करते हुए मुनि ने राम की ओर गंभीर दृष्टि से देखा, मानो कह रहे हों—“शक्ति के साथ विवेक भी आवश्यक है।” सूर्य का तेजःप्रभ अस्त्र, जो शत्रु के तेज को हर ले, और सोम का शिशिर अस्त्र, जो शांति और शीतलता प्रदान करे, भी उन्हें दिए गए। त्वष्टा का दारुण अस्त्र, भगदेव का भयंकर अस्त्र और मनु का शीतेषु भी इस दिव्य समर्पण का भाग बने।

 

अंत में उन्होंने कहा कि ये सभी अस्त्र इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, अपार बल से संपन्न और उदार हैं। वे केवल उसी के अधीन रहेंगे, जो धर्म में स्थित हो।

 

यह कहकर मुनि स्नानादि से शुद्ध होकर पूर्वाभिमुख बैठ गए। उनका स्वर अब मंत्रोच्चार में परिवर्तित हो चुका था। जैसे ही उन्होंने जप आरंभ किया, अद्भुत दृश्य प्रकट हुआ। वे सभी दिव्यास्त्र सजीव रूप धारण कर वहाँ उपस्थित हो गए। प्रकाश से आलोकित, वे हाथ जोड़कर राम के समक्ष खड़े हो गए। उनके स्वर में भक्ति थी—उन्होंने स्वयं को राम का किङ्कर बताया और सेवा के लिए प्रस्तुत हो गए।

 

यह दृश्य केवल अस्त्रों का आगमन नहीं था; यह धर्म का स्वयं राम के चरणों में समर्पण था।

 

राम का हृदय विनम्र आनंद से भर उठा। उन्होंने उन सभी दिव्य शक्तियों को स्पर्श किया और शांत स्वर में कहा कि वे सब उनके मन में निवास करें। यह केवल अधिकार नहीं था, यह आत्मसंयम की प्रतिज्ञा थी—कि शक्ति उनके भीतर रहेगी, परंतु नियंत्रण भी उनके ही हाथ में रहेगा।

 

तदनंतर राम ने आदरपूर्वक मुनि को प्रणाम किया। उनके नेत्रों में कृतज्ञता और संकल्प दोनों थे। वन की पथरीली राह अब उन्हें भयभीत नहीं करती थी। वे आगे बढ़ चले—केवल एक राजकुमार के रूप में नहीं, बल्कि धर्म के रक्षक और दिव्य शक्तियों के धारक के रूप में।

 

उस दिन ताटका वन में केवल अस्त्रों का आदान-प्रदान नहीं हुआ था; वहाँ एक बालक से मर्यादा पुरुषोत्तम बनने की प्रक्रिया का आरंभ हुआ था।