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दिव्य अस्त्रों का आलोक और वन की नई भोर
परम पवित्र श्रीराम ने जब उन अद्भुत दिव्य अस्त्रों को श्रद्धा से ग्रहण किया, तो उनका मुख आनंद और तेज से खिल उठा। उनके नेत्रों में विनय था, हृदय में कृतज्ञता, और वाणी में गुरु के प्रति असीम आदर। चलते-चलते उन्होंने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र से विनम्र स्वर में कहा कि आपकी कृपा से इन अस्त्रों को प्राप्त कर मैं देवताओं के लिए भी दुर्जेय हो गया हूँ। परन्तु, हे भगवन्, मैं इनकी संहार-विधि भी जानना चाहता हूँ, ताकि आवश्यकता पड़ने पर धर्म की रक्षा के लिए इनका समुचित उपयोग कर सकूँ।
राम की गंभीरता और उत्तरदायित्व-बोध को देखकर महातपस्वी विश्वामित्र अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें अस्त्रों की संहार-विधि का ज्ञान दिया। फिर उन्होंने कहा—“रघुकुलनन्दन राम! तुम अस्त्रविद्या के योग्य पात्र हो। इसलिए मैं तुम्हें और भी अनेक दिव्य अस्त्र प्रदान करता हूँ।” इसके साथ ही उन्होंने सत्यवान, सत्यकीर्ति, धृष्ट, रभस, प्रतिहारतर, प्राङ्मुख, अवाङ्मुख, लक्ष्य, अलक्ष्य, दृढ़नाभ, सुनाभ, दशाक्ष, शतवक्र, दशशीर्ष, शतोदर, पद्मनाभ, महानाभ, दुन्दुनाभ, स्वनाभ, ज्योतिष, शकुन, नैरास्य, विमल, दैत्यनाशक यौगंधर, विनिद्र, शुचिबाहु, महाबाहु, निष्कलि, विरुच, सार्चिमाली, धृतिमाली, वृत्तिमान, रुचिर, पित्र्य, सौमनस, विधूत, मकर, परवीर, रति, धन, धान्य, कामरूप, कामरुचि, मोह, आवरण, जृम्भक, सर्पनाथ, पन्थान और वरुण—इन सभी तेजस्वी अस्त्रों का स्मरण कराया। ये सभी प्रजापति कृशाश्व के पुत्र थे, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले और अगाध तेज से युक्त।
श्रीराम ने प्रसन्न मन से “बहुत अच्छा” कहकर उन सभी अस्त्रों को स्वीकार किया। जैसे ही उन्होंने उन्हें ग्रहण किया, वातावरण एक अद्भुत दिव्यता से भर उठा। वे अस्त्र मूर्तिमान रूप में प्रकट हुए—उनके शरीर दिव्य ज्योति से प्रकाशित थे। कुछ अंगारों के समान प्रज्वलित, कुछ धुएँ की तरह गहरे और रहस्यमय, तो कुछ सूर्य और चन्द्रमा की भाँति शांत और प्रकाशमान। वे सब हाथ जोड़कर श्रीराम के समक्ष खड़े हो गए।
मधुर वाणी में उन्होंने कहा, “पुरुषसिंह! हम आपके दास हैं। आज्ञा दीजिए, हम आपकी क्या सेवा करें?” उनकी वाणी में समर्पण था, निष्ठा थी और धर्म की रक्षा का उत्साह था।
रघुकुलनन्दन राम ने स्नेहपूर्वक उत्तर दिया, “इस समय तुम सब अपने-अपने स्थान को जाओ। जब भी आवश्यकता हो, मेरे मन में स्थित होकर मेरी सहायता करना।” यह कहकर उन्होंने उन सबको आश्वस्त किया। वे सभी अस्त्र श्रीराम की परिक्रमा करके, उनकी आज्ञा को अपने अस्तित्व में धारण कर, जैसे आए थे वैसे ही अदृश्य हो गए। वन का वातावरण फिर से शांत हो गया, परंतु अब वह शांति एक नए विश्वास से भरी थी—धर्म की रक्षा के लिए शक्ति सजग थी।
इस प्रकार दिव्य अस्त्रों का ज्ञान और सामर्थ्य प्राप्त कर श्रीराम आगे बढ़े। उनके मन में अब केवल पराक्रम ही नहीं, बल्कि एक गंभीर उत्तरदायित्व भी था। चलते-चलते उन्होंने सामने एक पर्वत के निकट सघन वृक्षों से आच्छादित प्रदेश देखा। वह स्थान मेघों की घटा के समान घना और रहस्यमय प्रतीत हो रहा था। वृक्षों के बीच मृगों के झुंड विचर रहे थे, और विविध पक्षियों की मधुर ध्वनियाँ उस स्थान को और भी रमणीय बना रही थीं।
श्रीराम के हृदय में जिज्ञासा जाग उठी। उन्होंने पुनः विश्वामित्र से पूछा, “भगवन्! यह सुन्दर और शान्त स्थान किसका आश्रम है? यहाँ की सुखमयी स्थिति देखकर प्रतीत होता है कि हम उस रोमांचकारी और दुर्गम ताटकावन से बाहर निकल आए हैं। कृपा करके मुझे सब कुछ बताइए। जहाँ आपकी यज्ञक्रिया हो रही है, जहाँ वे दुराचारी राक्षस विघ्न डालने आते हैं, और जहाँ मुझे यज्ञ की रक्षा तथा अधर्म का नाश करना है—वह आपका आश्रम कौन-सा है? मैं सब सुनना चाहता हूँ।”
राम के स्वर में उत्सुकता थी, पर उससे भी अधिक था धर्म के प्रति उनका अटूट संकल्प। वन की शांत हवा जैसे उनके साहस की साक्षी बन गई थी। गुरु के साथ आगे बढ़ते हुए, वे केवल एक राजकुमार नहीं थे—वे धर्म की ज्योति थे, जो अंधकार को चीरने के लिए उदित हो रही थी।