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धन्वन्तरि अवतार

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अमृत के साथ उतरे भगवान् — धन्वन्तरि अवतार और रोगमुक्त संसार की दिव्य कथा

जब-जब संसार पर कोई बड़ा संकट आता है, तब-तब भगवान् अपने भक्तों और समस्त प्राणियों की रक्षा के लिए किसी न किसी रूप में अवतरित होते हैं। कभी वे धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाते हैं, तो कभी करुणा और ज्ञान का अमृत लेकर आते हैं। भगवान् धन्वन्तरि का अवतार ऐसा ही अद्भुत और कल्याणकारी अवतार है, जिसने मानवता को रोगों के अंधकार से निकालकर स्वास्थ्य और जीवन का प्रकाश प्रदान किया।

बहुत प्राचीन काल में देवताओं और दैत्यों ने अमरत्व प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मन्थन किया। मन्दराचल पर्वत मथानी बना, वासुकि नाग ने रस्सी का कार्य किया और स्वयं भगवान् ने इस महान कार्य को सफल बनाने के लिए अनेक रूप धारण किए। समुद्र-मन्थन से एक-एक करके अनेक दिव्य रत्न और अद्भुत वस्तुएँ प्रकट हुईं। समस्त देवता और ऋषि उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब अमृत प्रकट होगा।

तभी क्षीरसागर की गहराइयों से एक अत्यन्त दिव्य और मनोहर पुरुष प्रकट हुए। उनका वर्ण वर्षा के मेघों के समान श्याम था, नेत्रों में अपार करुणा झलक रही थी और उनके हाथों में अमृत से भरा स्वर्णिम कलश सुशोभित था। यह कोई साधारण पुरुष नहीं, स्वयं भगवान् विष्णु के अंशावतार भगवान् धन्वन्तरि थे।

उनके दर्शन मात्र से देवताओं के हृदय में आशा का संचार हो गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वास्थ्य, जीवन और अमरत्व स्वयं चलकर उनके सामने आ गया हो। परन्तु अमृत को देखकर दैत्यों के मन में लोभ जाग उठा और वे अमृत-कलश को छीनकर ले गए। देवता निराश हो गए, किन्तु भगवान् की कृपा से अंततः अमृत पुनः देवताओं को प्राप्त हुआ और उन्हें यज्ञों का वह भाग भी मिला, जिसे दैत्य उनसे छीन चुके थे।

किन्तु भगवान् धन्वन्तरि का कार्य केवल अमृत प्रदान करना ही नहीं था। वे संसार को एक ऐसा अमृत देना चाहते थे, जो केवल देवताओं के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के लिए कल्याणकारी हो। यही कारण था कि उन्होंने संसार को आयुर्वेद का दिव्य ज्ञान प्रदान किया। उन्होंने मनुष्यों को बताया कि शरीर को स्वस्थ कैसे रखा जाए, रोगों का उपचार कैसे किया जाए और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर दीर्घ एवं सुखी जीवन कैसे जिया जाए।

इस प्रकार भगवान् धन्वन्तरि केवल देवताओं के वैद्य नहीं बने, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के प्रथम और महान वैद्य कहलाए। उनकी कृपा से असंख्य रोगों से पीड़ित लोगों को राहत मिली और स्वास्थ्य के विज्ञान का प्रारम्भ हुआ।

अमृत-वितरण के बाद देवराज इन्द्र ने भगवान् धन्वन्तरि से विनम्र निवेदन किया—“हे प्रभु! आप देवताओं के वैद्य बनकर अमरावती में निवास करें और हमारा मार्गदर्शन करें।” भगवान् ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और देववैद्य के रूप में अमरावती में रहने लगे।

समय बीतता गया। पृथ्वी पर जनसंख्या बढ़ी, जीवन की परिस्थितियाँ बदलीं और अनेक प्रकार की व्याधियाँ फैलने लगीं। लोग रोगों से पीड़ित होकर दुःखी रहने लगे। चारों ओर करुण पुकार सुनाई देने लगी। मानवता को फिर से एक ऐसे रक्षक की आवश्यकता थी, जो उन्हें रोगों के बन्धन से मुक्त कर सके।

देवराज इन्द्र ने जब पृथ्वी की यह दयनीय स्थिति देखी, तो उन्होंने पुनः भगवान् से प्रार्थना की। भक्तों और प्राणियों के दुःख को देखकर भगवान् का करुणामय हृदय द्रवित हो उठा। तब उन्होंने काशी के राजा दिवोदास के रूप में पृथ्वी पर अवतार धारण किया।

राजा दिवोदास के रूप में भगवान् धन्वन्तरि ने आयुर्वेद को व्यवस्थित रूप से स्थापित किया। उन्होंने रोगों के कारण, उनके उपचार और स्वस्थ जीवन के सिद्धान्तों का प्रचार किया। उनके कारण असंख्य लोगों को नया जीवन मिला और समाज में स्वास्थ्य तथा सुख का विस्तार हुआ।

कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के पावन दिन भगवान् धन्वन्तरि का यह अवतरण हुआ था। इसी कारण यह तिथि आज भी धनतेरस के रूप में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। यह केवल धन प्राप्ति का पर्व नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, आयु और आरोग्य के देवता भगवान् धन्वन्तरि के स्मरण का भी पावन अवसर है।

भगवान् धन्वन्तरि का यह अवतार हमें सिखाता है कि जीवन का सबसे बड़ा धन स्वास्थ्य है। धन, वैभव और ऐश्वर्य तभी सुख देते हैं, जब शरीर स्वस्थ हो। इसलिए भगवान् ने आयुर्वेद के माध्यम से संसार को यह संदेश दिया कि स्वास्थ्य की रक्षा ही सच्चा जीवन-धर्म है।

आज भी जब कोई रोगी स्वास्थ्य की कामना करता है, जब कोई वैद्य सेवा-भाव से रोगियों का उपचार करता है, और जब कोई व्यक्ति स्वस्थ जीवन की ओर कदम बढ़ाता है, तब कहीं न कहीं भगवान् धन्वन्तरि की दिव्य कृपा और उनकी दी हुई अमूल्य आयुर्वेद विद्या कार्य कर रही होती है। उनकी करुणा आज भी समस्त प्राणियों को आरोग्य, आयु और जीवन का अमृत प्रदान कर रही है।