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धर्मयात्रा का दिव्य प्रारम्भ: राम-लक्ष्मण और बला-अतिबला का वरदान

 

वसिष्ठजी के वचनों को सुनते ही अयोध्या का राजमहल भावनाओं से भर उठा। राजा दशरथ का मुख प्रसन्न था, पर हृदय में एक पिता की कोमल वेदना छिपी थी। उन्होंने राम और लक्ष्मण को अपने समीप बुलाया। माता कौसल्या ने राम को हृदय से लगाया, उनके मस्तक को चूमा और भर आई आँखों से आशीर्वाद दिया। स्वस्तिवाचन के मंगल स्वर गूँजे, दीप प्रज्वलित हुए और दोनों राजकुमारों का शुभ यात्रा-संस्कार सम्पन्न हुआ।

 

जब दशरथ ने राम का मस्तक सूँघकर उन्हें विश्वामित्र को सौंपा, तो मानो अपने प्राणों का अंश ही सौंप दिया। उसी क्षण शीतल, धूलरहित और सुखद वायु बहने लगी। आकाश से देवताओं ने पुष्पवर्षा की, दुन्दुभियाँ बज उठीं और शंख-नगाड़ों की ध्वनि से दिशाएँ गूँज उठीं। यह केवल दो राजकुमारों का प्रस्थान नहीं, धर्म की महायात्रा का आरम्भ था।

 

विश्वामित्र आगे-आगे चल रहे थे। उनके पीछे राम, और उनके पीछे लक्ष्मण। दोनों भाइयों की शोभा अनुपम थी। कंधों पर सुडौल धनुष ऐसे प्रतीत होते थे मानो इन्द्रधनुष धरती पर उतर आए हों। पीठ पर बँधे तरकस में सजे बाण सूर्यकिरणों की भाँति चमक रहे थे। कटि पर लटकती तलवारें उनके पराक्रम की मौन घोषणा कर रही थीं। अंगुलियों में गोहटी के चमड़े के दस्ताने, शरीर पर सुन्दर वस्त्र और अलंकार—पर इन सब से बढ़कर उनके मुख पर तेज, विनम्रता और करुणा का अद्भुत संगम झलक रहा था।

 

राम का स्वरूप शरदकालीन सूर्य के समान उज्ज्वल और शीतल था। उनकी बड़ी, कमल जैसी आँखों में दया और दृढ़ता साथ-साथ बसती थी। लक्ष्मण का व्यक्तित्व अग्निशिखा की तरह तेजस्वी और जाग्रत था—भाई के प्रति समर्पित, सदैव सतर्क। दोनों ऐसे लगते थे मानो देवताओं ने मानव रूप धारण कर लिया हो। वे चलते तो लगता, तीन फनों वाले दिव्य सर्पों की भाँति धनुष, तरकस और मस्तक की त्रयी एक साथ लहरा रही हो। उनकी चाल में वीरता थी, पर हृदय में पूर्ण विनय।

 

अयोध्या से दूर सरयू के दक्षिण तट पर पहुँचकर विश्वामित्र ने मधुर स्वर में राम को आचमन करने को कहा। फिर उन्होंने प्रेमपूर्वक ‘बला’ और ‘अतिबला’ नाम की दिव्य विद्याएँ प्रदान कीं। उन्होंने बताया कि ये विद्याएँ केवल शारीरिक बल नहीं, बल्कि आत्मिक और बौद्धिक सामर्थ्य का अमूल्य खजाना हैं। इनके प्रभाव से थकान, ज्वर, भूख-प्यास और मानसिक विकार पास नहीं फटकेंगे। सोते समय भी कोई राक्षस हानि नहीं पहुँचा सकेगा। युद्ध में बाहुबल की बराबरी कोई नहीं कर सकेगा।

 

पर इन विद्याओं का वैभव केवल शक्ति तक सीमित नहीं था। ये सौभाग्य, चातुर्य, गहन ज्ञान, तीक्ष्ण बुद्धि और सही निर्णय की क्षमता प्रदान करती थीं। किसी भी प्रश्न का युक्तिपूर्ण उत्तर देने की क्षमता, संकट में धैर्य और लोक-रक्षा का अटूट संकल्प—ये सब ‘बला’ और ‘अतिबला’ के ही वरदान थे। ये ब्रह्मा की तेजस्विनी पुत्रियाँ कही जाती थीं, समस्त ज्ञान की जननी। तपोबल से अर्जित इन विद्याओं को विश्वामित्र ने राम को इसलिए दिया क्योंकि वे ही इनके योग्य पात्र थे।

 

राम ने श्रद्धापूर्वक आचमन कर शुद्ध मन से उन विद्याओं को ग्रहण किया। उसी क्षण उनका तेज सहस्र किरणों से युक्त सूर्य के समान दमक उठा। वे अब केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं रहे; वे धर्म की रक्षा के लिए सशक्त, जाग्रत और दिव्य पुरुष बन चुके थे।

 

रात को तीनों सरयू तट पर ठहरे। राजमहल की सुखद शैय्या के स्थान पर तृण की साधारण शय्या थी, पर दोनों भाइयों के मन में कोई शिकायत न थी। गुरु का स्नेह, कर्तव्य का आह्वान और धर्म की राह पर पहला कदम—इन्हीं के सहारे वह साधारण रात भी उनके लिए अत्यन्त सुखमयी बन गई। उस शांत आकाश के नीचे भविष्य की महान रामकथा आकार ले रही थी।