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(12)
“धर्मराज पृथु — प्रजा के रक्षक और धरती के पालनहार”
यह कथा केवल एक राजा के शासन की नहीं है—यह अधर्म के अंधकार से धर्म के प्रकाश तक, क्रूरता से करुणा तक, और विनाश से पुनः सृजन तक की दिव्य यात्रा है।
महाराज अंग, जो स्वयं एक धर्मात्मा और उदार हृदय के राजा थे, उनकी पत्नी सुनीथा से एक पुत्र उत्पन्न हुआ—वेन। परंतु सुनीथा मृत्यु की कन्या थीं, और उसी प्रभाव के कारण वेन के स्वभाव में भी कठोरता, क्रूरता और निर्दयता आ गई।
वेन का हृदय धर्म से रिक्त था। जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसकी दुष्टता बढ़ती गई। उसके अत्याचारों से पूरा राज्य पीड़ित हो उठा। यह देखकर महाराज अंग का हृदय टूट गया—और एक दिन वे सब कुछ छोड़कर चुपचाप वन को चले गए।
राजा के बिना राज्य में अराजकता फैलने लगी। प्रजा भयभीत थी, व्यवस्था टूट रही थी। तब ऋषियों ने, कोई अन्य उपाय न देखकर, वेन को ही राजा बना दिया—यद्यपि वे जानते थे कि वह योग्य नहीं है।
परिणाम वही हुआ जिसका भय था…
राजसत्ता पाते ही वेन और भी उन्मत्त हो गया। उसने धर्म को नष्ट करना शुरू कर दिया, साधु-संतों का अपमान किया, और स्वयं को ही सर्वोच्च घोषित करने लगा। जब ऋषियों ने उसे समझाने का प्रयास किया, तो उसने उनके वचनों की अवहेलना कर दी।
अब सहन की सीमा समाप्त हो चुकी थी…
ऋषियों का क्रोध ज्वाला बन उठा। उन्होंने केवल एक “हुँकार” से ही वेन का अंत कर दिया।
परंतु अब समस्या और बढ़ गई…
राजा के बिना राज्य में लुटेरों का आतंक फैल गया। प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। तब ऋषियों ने एक अद्भुत उपाय सोचा—उन्होंने वेन के शरीर का मंथन किया।
पहले उसकी जाँघों का मंथन किया गया। उसमें से एक काला, कुरूप, बौना पुरुष उत्पन्न हुआ। जब उसने पूछा—“मैं क्या करूँ?” तो ऋषियों ने कहा—“निषीद” (बैठ जाओ)। उसी से उसका नाम पड़ा निषाद।
फिर ऋषियों ने वेन की भुजाओं का मंथन किया…
और तभी एक दिव्य दृश्य प्रकट हुआ—
एक तेजस्वी पुरुष और एक दिव्य स्त्री का युगल प्रकट हुआ। उस पुरुष का नाम रखा गया पृथु, और स्त्री का नाम अर्चि।
ऋषियों ने जब उनके हाथों में चक्र और चरणों में कमल के चिन्ह देखे, तो उनका हृदय आनंद से भर गया—वे समझ गए कि यह कोई साधारण जन्म नहीं है, बल्कि स्वयं भगवान के अंश का अवतार है।
श्रीपृथु का राज्याभिषेक हुआ। वे अपनी पत्नी अर्चि के साथ ऐसे शोभायमान हो रहे थे, जैसे अग्नि के साथ उसकी ज्योति।
परंतु राज्य की स्थिति अभी भी दयनीय थी…
वेन के अत्याचारों से पृथ्वी ने अपने भीतर सभी औषधियाँ और अन्न छिपा लिए थे। भूमि सूखी थी, जीवन नष्ट हो रहा था, और प्रजा भूख से तड़प रही थी।
जब प्रजा ने आकर अपनी व्यथा सुनाई, तो पृथु का हृदय करुणा और क्रोध से भर उठा।
उन्होंने धनुष उठाया और पृथ्वी को लक्ष्य कर बाण चढ़ाया।
पृथ्वी भयभीत होकर गाय का रूप धारण कर भागी, परंतु कहीं भी शरण न पाकर अंततः पृथु के चरणों में आ गिरी।
उस क्षण क्रोध करुणा में बदल गया…
पृथु ने पृथ्वी को समझा, और उसके संकेत से उसका दोहन किया। तब पुनः अन्न, औषधियाँ और जीवन का रस धरती पर लौट आया। प्रजा सुखी हो गई, और पृथ्वी पुनः जीवनदायिनी बन गई।
समय बीता…
श्रीपृथु ने सौ अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लिया। निन्यानवे यज्ञ पूर्ण हो चुके थे। जब सौवें यज्ञ का समय आया, तब देवराज इन्द्र को भय हुआ कि उनका पद छिन जाएगा।
उन्होंने अनेक विघ्न डाले…
क्रोध में आकर पृथु इन्द्र का वध करने को तैयार हो गए। परंतु याजकों और ब्रह्माजी ने उन्हें समझाया—यज्ञ में क्रोध उचित नहीं है।
अंततः इन्द्र और पृथु के बीच सन्धि हो गई।
तभी एक दिव्य क्षण आया—
स्वयं भगवान विष्णु प्रकट हुए, इन्द्र को साथ लेकर। इन्द्र लज्जित थे, पर पृथु ने उन्हें हृदय से लगा लिया।
भगवान के दर्शन से पृथु भाव-विभोर हो उठे—आँखों में आँसू, शरीर में रोमांच, और हृदय में अपार प्रेम उमड़ पड़ा।
उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति की और कहा—
न कामये नाथ तदप्यहं क्वचिन्न यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासवः।
महत्तमान्तर्हृदयान्मुखच्युतो विधत्स्व कर्णायुतमेष मे वरः॥
उन्होंने कहा कि उन्हें मोक्ष भी नहीं चाहिए, यदि उसमें भगवान की कथा सुनने का सुख न हो। उन्होंने तो केवल यह वर माँगा कि वे भगवान की लीलाओं को सुनते ही रहें।
भगवान ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया और अंतर्धान हो गए।
दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य चलाने के बाद, पृथु ने अपने पुत्रों को राज्य सौंप दिया और अपनी पत्नी अर्चि के साथ वन को चले गए।
वहाँ उन्होंने तप किया, ध्यान किया, और अंततः भगवान के चरणों का स्मरण करते हुए ब्रह्म में लीन हो गए।
उनकी पत्नी अर्चि, जो पतिव्रता और महान साध्वी थीं, उन्होंने भी अपने पति का अनुसरण किया और सती हो गईं।
उस समय आकाश से पुष्प-वृष्टि होने लगी, देवताओं के वाद्य बजने लगे—मानो स्वयं देवता भी इस दिव्य मिलन को प्रणाम कर रहे हों।
✨ काव्य पंक्तियाँ
जब अधर्म का अंधकार धरा पर छा गया,
वेन के पापों से जग सारा घबरा गया।
तब ऋषियों की तप-ज्वाला से जन्मा प्रकाश,
पृथु बनकर उतरा धरती पर धर्म का उजास।
सूखी थी धरती, आँचल था उसका वीरान,
प्रजा के नेत्रों में बसता था केवल श्मशान।
पृथु ने करुणा से जब बाण उठाकर पुकारा,
गाय बनकर धरा ने स्वयं चरणों में सहारा।
दूध बना अन्न, औषधि बनी जीवन की श्वास,
पृथु के स्पर्श से हँस उठा फिर सारा आकाश।
यज्ञों की ज्वाला में जब भक्ति प्रखर हो उठी,
स्वयं हरि आए, प्रेम की धारा बह उठी।
ना माँगा स्वर्ग, न मोक्ष की कोई चाह रखी,
बस हरि-कथा सुनने की अनंत राह रखी।
ऐसे थे पृथु—राजा नहीं, धर्म का प्रमाण,
जिनसे धन्य हुई यह धरा, यह जीवन, यह जहान। 🌿