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(22)
धर्म का दीप और त्याग की ज्योति
अयोध्या का राजमहल उस समय गहरे दुःख और उथल-पुथल से भरा हुआ था। जहाँ एक ओर पूरे नगर में उत्सव की तैयारी थी, वहीं अचानक सब कुछ बदल गया। श्रीराम के राज्याभिषेक का शुभ अवसर अब वनवास के कठोर निर्णय में बदल चुका था।
सुमित्रानन्दन लक्ष्मण इस समाचार से भीतर तक हिल गए थे। उनका हृदय क्रोध और पीड़ा से जल रहा था। वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे कोई महान गजराज क्रोध में अपने चारों ओर सब कुछ तोड़ देने को तैयार हो। उनकी आँखें लाल हो उठी थीं, सांसें तेज हो रही थीं, और मन में एक ही विचार उमड़ रहा था—अन्याय का विरोध करना।
उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि उनके प्रिय भ्राता, मर्यादा और धर्म के प्रतिमूर्ति श्रीराम, बिना किसी दोष के वन भेजे जाएँ। उनके भीतर का योद्धा विद्रोह करने को तैयार था।
लेकिन उसी समय, शांत, संयमित और तेजस्वी श्रीराम उनके पास आए। उनके चेहरे पर न कोई क्रोध था, न कोई शिकायत—केवल गहरी स्थिरता और करुणा थी। उन्होंने धीरे से लक्ष्मण के कंधे पर हाथ रखा और मधुर स्वर में कहा—
“लक्ष्मण, अपने मन को संभालो। क्रोध और शोक दोनों को अपने भीतर स्थान मत दो। यह समय धैर्य का है, न कि आवेश का। अपने हृदय से अपमान की भावना को निकाल दो और प्रसन्नता के साथ इस अभिषेक की सामग्री को हटाने में लग जाओ।”
राम के इन शब्दों में आदेश कम, स्नेह अधिक था। वे आगे बोले—
“अब तक तुमने जिस उत्साह से मेरे राज्याभिषेक की तैयारी की, उसी उत्साह से अब उसे रोकने और मेरे वन जाने की तैयारी करो।”
लक्ष्मण के लिए यह सुनना और भी कठिन था, पर राम का स्वर इतना शांत और दृढ़ था कि वह उनके क्रोध को धीरे-धीरे शांत करने लगा।
राम ने आगे कहा—
“हमारी माता कैकेयी के मन में जो पीड़ा और शंका है, उसे पूरी तरह दूर करना हमारा कर्तव्य है। मैं एक क्षण के लिए भी यह नहीं सह सकता कि उनके मन में किसी प्रकार का दुःख या संदेह रहे।”
यह सुनकर लक्ष्मण का हृदय और व्यथित हो उठा—जिस स्त्री ने यह अन्याय किया, उसी के लिए राम इतनी करुणा क्यों दिखा रहे हैं?
राम ने जैसे उनके मन को पढ़ लिया—
“लक्ष्मण, मैंने कभी जान-बूझकर या अनजाने में अपने माता-पिता का कोई अपराध नहीं किया। और पिताजी… वे सदा सत्य के मार्ग पर चलने वाले हैं। यदि उनका दिया हुआ वचन पूरा न हो, तो उन्हें परलोक में भी कष्ट होगा। क्या मैं ऐसा होने दूँ?”
अब राम का स्वर और गंभीर हो गया—
“यदि यह अभिषेक रुकता नहीं, तो पिताजी के मन में यह पीड़ा बनी रहेगी कि उनका वचन असत्य हो गया। उनका यह संताप मुझे जीवन भर दुख देगा।”
राम के हर शब्द में कर्तव्य और धर्म की गहराई झलक रही थी।
“इसीलिए, मैं अपने अभिषेक को रोककर तुरंत वन जाना चाहता हूँ, ताकि कैकेयी निश्चिंत होकर भरत का राज्याभिषेक करा सकें।”
उन्होंने अपने भविष्य की कल्पना करते हुए कहा—
“जब मैं वल्कल वस्त्र पहनकर, जटाएँ बाँधकर वन की ओर चला जाऊँगा, तभी कैकेयी के मन को सच्चा संतोष मिलेगा।”
लक्ष्मण यह सब सुनकर स्तब्ध थे। राम ने आगे दैव (भाग्य) की बात समझाते हुए कहा—
“जिस विधाता ने कैकेयी के मन में यह विचार डाला है, उसे रोकना या उसके विरुद्ध जाना उचित नहीं है। यह सब दैव का विधान है।”
राम ने समझाया कि यह केवल कैकेयी का दोष नहीं है—
“यह परिवर्तन, यह विपरीत भाव—सब दैव के कारण है। यदि ऐसा न होता, तो वही कैकेयी, जो मुझे अपने पुत्र के समान मानती थीं, ऐसा कठोर निर्णय कैसे लेतीं?”
राम ने अत्यंत शांत स्वर में कहा—
“लक्ष्मण, तुम तो यह भलीभाँति जानते हो कि मेरे मन में कभी भी माताओं के प्रति कोई भेदभाव नहीं रहा। मैंने सदैव तीनों माताओं को समान आदर और प्रेम दिया है। और माता कैकेयी भी पहले मुझे और भरत में कोई अंतर नहीं समझती थीं। उनके स्नेह में कभी कोई कमी नहीं थी।”
राम के ये शब्द सुनकर यह स्पष्ट हो जाता है कि वे कैकेयी के प्रति कोई कटुता नहीं रखते। वे आगे बोले—
“पर अब जो कुछ हुआ है, वह सामान्य नहीं है। मुझे वन भेजने के लिए और मेरे अभिषेक को रोकने के लिए कैकेयी ने राजा के सामने जो कठोर और कड़वे वचन कहे… वे इतने भयंकर थे कि साधारण मनुष्य भी उन्हें बोलने का साहस नहीं कर सकता।”
यह कहते समय भी राम के स्वर में न क्रोध था, न निंदा—केवल आश्चर्य और विवेक था।
“लक्ष्मण, ऐसी स्थिति में मैं यही मानता हूँ कि यह सब दैव (भाग्य) का ही प्रभाव है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति, विशेषकर इतनी श्रेष्ठ स्वभाव वाली कैकेयी, अचानक इतनी कठोर कैसे हो सकती है?”
राम ने और गहराई से समझाया—
“यदि यह दैव का विधान न होता, तो एक गुणवान और उत्तम स्वभाव वाली रानी—जो हमेशा धर्म का पालन करती थी—वह एक साधारण स्त्री की तरह अपने पति से मेरे लिए ऐसी पीड़ादायक बात कैसे कहती?”
राम यहाँ यह नहीं कह रहे कि कैकेयी बुरी हो गई है, बल्कि वे यह बता रहे हैं कि परिस्थितियाँ कभी-कभी मनुष्य को ऐसा बना देती हैं, जो वह वास्तव में नहीं होता।
फिर वे दैव के रहस्य को समझाते हुए कहते हैं—
“लक्ष्मण, जो घटनाएँ हमने पहले कभी सोची भी नहीं होतीं और जो अचानक हमारे सामने आ खड़ी होती हैं—वही दैव का विधान होता है। और इस दैव के निर्णय को कोई नहीं बदल सकता—न मनुष्य, न देवता।”
राम ने यह भी कहा—
“तुम देखो, एक ही क्षण में सब कुछ बदल गया—मेरे हाथ में आया हुआ राज्य चला गया और कैकेयी का मन भी बदल गया। यह सब किसी सामान्य कारण से नहीं हो सकता, यह दैव की ही लीला है।”
अब राम जीवन के गहरे सत्य को उजागर करते हैं—
“जब हमें सुख या दुःख मिलता है, तभी हमें अपने कर्मों का फल समझ में आता है। परंतु उससे पहले हम नहीं जान पाते कि क्या होने वाला है। ऐसे अदृश्य और अनजाने दैव से कौन लड़ सकता है?”
राम ने जीवन के अनेक अनुभवों का उदाहरण देते हुए कहा—
“सुख और दुःख, भय और क्रोध, लाभ और हानि, जन्म और मृत्यु—इन सबके पीछे कई बार कोई स्पष्ट कारण दिखाई नहीं देता। तब समझ लेना चाहिए कि यह सब दैव का ही कार्य है।”
वे आगे कहते हैं—
“यहाँ तक कि महान तपस्वी ऋषि भी, जो वर्षों तक तपस्या करते हैं, वे भी कभी-कभी दैव के प्रभाव से अपने नियमों को तोड़ देते हैं और काम या क्रोध के वश में आ जाते हैं।”
इससे राम यह बताना चाहते हैं कि यदि इतने महान लोग भी दैव से प्रभावित हो सकते हैं, तो साधारण मनुष्य तो और भी अधिक असहाय है।
राम ने एक और गहरी बात कही—
“जो घटनाएँ बिना किसी चेतावनी के अचानक घट जाती हैं और हमारे प्रयासों से किए जा रहे कार्यों को रोक देती हैं, वे निश्चित रूप से दैव की ही योजना होती हैं।”
अब राम अपने मन की स्थिति स्पष्ट करते हैं—
“मैंने इन सभी बातों को समझकर अपने मन को स्थिर कर लिया है। इसलिए मेरे अभिषेक में विघ्न पड़ने पर भी मुझे कोई दुःख या संताप नहीं हो रहा।”
उनका यह धैर्य असाधारण था—जहाँ कोई भी व्यक्ति टूट सकता था, वहाँ राम अडिग खड़े थे।
फिर उन्होंने लक्ष्मण से कहा—
“तुम भी मेरे इन विचारों को अपनाओ और बिना दुःख के इस राज्याभिषेक के आयोजन को तुरंत बंद करवा दो।”
राम ने आगे एक अद्भुत बात कही—
“ये जो अभिषेक के लिए कलशों में जल रखा गया है, अब उसी जल से मैं अपने वनवासी जीवन के व्रत का संकल्प करूँगा।”
यह एक गहरा प्रतीक था—
जहाँ एक ओर राजा बनने का जल था, वहीं अब वही जल त्याग और तपस्या का आरंभ बन रहा था।
फिर राम ने सरलता से कहा—
“और यदि ऐसा भी न हो, तो मैं अपने हाथों से निकाला हुआ साधारण जल ही अपने व्रत के लिए पर्याप्त मानूँगा।”
यह उनके वैराग्य और सादगी का प्रमाण था।
अंत में राम ने लक्ष्मण को सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा दी—
“लक्ष्मण, इस परिवर्तन के कारण तुम कोई चिंता मत करो। मेरे लिए राज्य और वनवास दोनों समान हैं। बल्कि यदि गहराई से विचार करूँ, तो वनवास ही अधिक कल्याणकारी लगता है।”
और फिर उन्होंने स्पष्ट कर दिया—
“इसमें माता कैकेयी को दोषी मत समझो। वे दैव के अधीन थीं। और न ही पिताजी को दोष दो। इस पूरे घटनाक्रम का एकमात्र कारण दैव ही है।”
इन श्लोकों में श्रीराम का अद्भुत धैर्य, उनकी गहरी समझ और दैव के प्रति पूर्ण समर्पण दिखाई देता है।
जहाँ लक्ष्मण क्रोध और विद्रोह का प्रतीक हैं,
वहीं राम शांति, विवेक और धर्म के सर्वोच्च आदर्श हैं।
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि—
जीवन में जब सब कुछ हमारे विरुद्ध होता दिखाई दे, तब भी धैर्य, कर्तव्य और विश्वास को नहीं छोड़ना चाहिए।