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धर्म की राह पर अडिग श्रीराम
अयोध्या के महल में उस दिन वातावरण अत्यन्त भारी था। जैसे सुख का सूर्य अचानक ढल गया हो। जब श्रीराम ने कैकेयी के कठोर और हृदय को विदीर्ण कर देने वाले वचन सुने, तब भी उनके मुख पर कोई विकार नहीं आया। भीतर कितना ही तूफान क्यों न उठ रहा हो, बाहर वे शांत सागर की तरह स्थिर थे। उन्होंने कैकेयी की ओर अत्यन्त विनम्रता और सहजता से देखा, मानो यह सब कोई असाधारण बात ही न हो।
मृदु स्वर में उन्होंने कहा कि यदि यही इच्छा है, तो वे सहर्ष वन को प्रस्थान करेंगे। उनके शब्दों में कोई शिकायत नहीं थी, कोई कटुता नहीं थी—केवल कर्तव्य का निश्चय और धर्म के प्रति अटूट समर्पण था। वे बोले कि वे जटा और वल्कल धारण कर वन में निवास करेंगे, क्योंकि पिता की प्रतिज्ञा उनके लिए सर्वोपरि है।
परंतु इस दृढ़ता के पीछे एक कोमल पीड़ा भी थी। उन्होंने कैकेयी से प्रश्न किया कि महाराज दशरथ आज उनसे वैसे स्नेहपूर्ण शब्दों में बात क्यों नहीं कर रहे। यह प्रश्न किसी विरोध का नहीं, बल्कि एक पुत्र के व्याकुल हृदय का था—जो अपने पिता की मौन पीड़ा को समझना चाहता था।
वे कैकेयी से अत्यन्त आदरपूर्वक कहते हैं कि उनके प्रश्न से उन्हें क्रोधित नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे स्वयं प्रसन्नता से वन जाने को तैयार हैं। उनके भीतर न कोई द्वेष था, न कोई असंतोष—सिर्फ यह इच्छा थी कि सब कुछ स्पष्ट और शांतिपूर्वक हो।
श्रीराम अपने पिता के प्रति अपने प्रेम और कर्तव्य को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि पिता उनके लिए गुरु, हितैषी और पूज्य हैं। उनके आदेश पर ऐसा कोई कार्य नहीं जिसे वे बिना संकोच के न कर सकें। यह वचन केवल शब्द नहीं थे, बल्कि उनके जीवन का आधार थे।
फिर भी उनके हृदय में एक गहरी टीस थी—कि स्वयं महाराज ने उनसे भरत के अभिषेक की बात क्यों नहीं कही। यह पीड़ा राज्य खोने की नहीं थी, बल्कि पिता के मौन और दूरी की थी।
वे बड़े सहज भाव से कहते हैं कि वे केवल कैकेयी के कहने पर ही राज्य, सीता, अपने प्राण और समस्त संपत्ति तक त्याग सकते हैं। यह त्याग उनके लिए कोई बलिदान नहीं, बल्कि प्रेम और धर्म का स्वाभाविक परिणाम था।
वे आगे कहते हैं कि यदि स्वयं पिता आज्ञा दें, और वह भी कैकेयी की प्रसन्नता के लिए, तो वे उस कार्य को करने में तनिक भी संकोच नहीं करेंगे। उनके लिए पिता की इच्छा ही सर्वोच्च थी।
राम कैकेयी से निवेदन करते हैं कि वे दशरथ को आश्वस्त करें, क्योंकि वे अत्यन्त लज्जित और दुःखी प्रतीत हो रहे हैं। वे पूछते हैं कि पृथ्वी की ओर देखते हुए वे धीरे-धीरे आँसू क्यों बहा रहे हैं। यह दृश्य एक पुत्र के हृदय को भीतर तक चीर रहा था।
वे यह भी कहते हैं कि शीघ्र ही दूतों को भेजकर भरत को बुलाया जाए, ताकि राज्य का कार्य व्यवस्थित हो सके। और बिना किसी विलम्ब के वे स्वयं वन को प्रस्थान करेंगे—चौदह वर्षों के लिए।
कैकेयी यह सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो जाती है। उसे विश्वास हो जाता है कि राम सचमुच वन चले जाएंगे। वह राम को शीघ्र प्रस्थान करने के लिए प्रेरित करती है, मानो उसके हृदय में कोई अधीरता हो।
वह कहती है कि राजा लज्जा के कारण स्वयं कुछ नहीं कह पा रहे, इसलिए राम को इस बात का दुःख नहीं करना चाहिए। साथ ही वह यह कठोर वचन भी कहती है कि जब तक राम वन नहीं जाते, तब तक दशरथ भोजन और स्नान नहीं करेंगे।
यह सुनते ही दशरथ का हृदय टूट जाता है। वे गहरी पीड़ा में डूबकर कराह उठते हैं और मूर्च्छित होकर पलंग पर गिर पड़ते हैं। यह दृश्य अत्यन्त करुण था—एक असहाय पिता, जो अपने ही वचनों के बंधन में जकड़ा हुआ था।
राम तुरंत उन्हें उठाकर बैठाते हैं। उनके हृदय में वेदना है, परंतु चेहरे पर वही शांति है। कैकेयी के वचनों से प्रेरित होकर वे शीघ्र वन जाने के लिए तत्पर हो जाते हैं—मानो कोई घोड़ा कोड़े की चोट से दौड़ पड़ता है।
वे पुनः स्पष्ट करते हैं कि वे धन या राज्य के लोभ से बंधे नहीं हैं। उन्होंने धर्म को अपना मार्ग बनाया है—ऋषियों की तरह निर्मल और निष्कलंक।
वे कहते हैं कि पिता का प्रिय कार्य वे अपने प्राण देकर भी पूरा करेंगे। उनके लिए पिता की आज्ञा ही सबसे बड़ा धर्म है—उससे बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं।
यद्यपि दशरथ ने स्वयं कुछ नहीं कहा, फिर भी वे कैकेयी के वचनों को ही आदेश मानकर चौदह वर्षों के लिए वन जाने को तैयार हैं। यह उनकी आज्ञाकारिता की पराकाष्ठा थी।
वे कैकेयी से यह भी कहते हैं कि उसका उन पर पूर्ण अधिकार है, फिर भी उसने सीधे उनसे न कहकर महाराज को कष्ट दिया—शायद वह उनमें कोई गुण नहीं देखती। यह वाक्य अत्यन्त मार्मिक था, जिसमें पीड़ा भी थी और विनम्रता भी।
राम अंततः कहते हैं कि वे माता कौसल्या से अनुमति लेकर, सीता को समझाकर आज ही वन को प्रस्थान करेंगे। साथ ही वे कैकेयी से निवेदन करते हैं कि भरत राज्य का पालन करें और पिता की सेवा करें—क्योंकि यही सनातन धर्म है।
दशरथ यह सब सुनकर टूट जाते हैं। वे कुछ बोल नहीं पाते, केवल रोते रहते हैं। राम उनके चरणों में प्रणाम करते हैं—और कैकेयी के भी—फिर महल से बाहर निकल जाते हैं।
लक्ष्मण यह अन्याय देखकर क्रोधित हैं, परंतु अपने आँसुओं को रोककर वे चुपचाप राम के पीछे चल पड़ते हैं। उनके भीतर अग्नि जल रही है, परंतु भाई के प्रति प्रेम उन्हें शांत रखता है।
राम अब वन जाने के लिए पूर्णतः तैयार हैं। अभिषेक की सामग्री के पास से गुजरते हुए वे उसकी ओर देखना भी नहीं चाहते—मानो उन्होंने सब कुछ मन से त्याग दिया हो।
उनकी आभा में कोई कमी नहीं आती। जैसे चन्द्रमा क्षीण होने पर भी सुंदर रहता है, वैसे ही राज्य का त्याग भी राम की शोभा को कम नहीं कर पाता।
वे पूर्णतः स्थितप्रज्ञ हैं—जैसे कोई महात्मा संसार के मोह से परे हो। उनके मन में कोई विकार नहीं, कोई द्वंद्व नहीं।
वे राजसी सुख-सुविधाओं को अस्वीकार कर देते हैं—छत्र, चँवर, रथ—सब कुछ। अपने प्रियजनों को विदा करके वे अपने दुःख को भीतर ही दबा लेते हैं और माता कौसल्या को यह समाचार देने के लिए आगे बढ़ते हैं।
जो लोग सदा उनके साथ रहते थे, उन्होंने भी उनके मुख पर कोई परिवर्तन नहीं देखा। उनकी स्वाभाविक प्रसन्नता वैसी ही बनी रही—जैसे शरद ऋतु का चन्द्रमा अपने तेज को नहीं खोता।
मधुर वाणी और विनम्र व्यवहार के साथ वे सबका सम्मान करते हुए माता के पास पहुँचते हैं। लक्ष्मण भी उनके पीछे-पीछे चलते हैं, अपने दुःख को भीतर छिपाए हुए।
जब वे उस आनंदमय भवन में प्रवेश करते हैं, जहाँ अभी कुछ समय पहले उत्सव की तैयारी थी, तब भी वे अपने चेहरे पर कोई दुःख प्रकट नहीं होने देते। उन्हें चिंता है कि उनके दुःख से दूसरों को पीड़ा न हो।
इस प्रकार, श्रीराम ने अपने जीवन के सबसे कठिन क्षण में भी धैर्य, त्याग और धर्म का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जो युगों-युगों तक मानवता को मार्ग दिखाता रहेगा।