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धर्म के लिए कठोर निर्णय
वन की नीरवता में महर्षि विश्वामित्र के तेज से वातावरण आलोकित था। उनके वचन गंभीर और प्रभावशाली थे। उन्हें सुनकर पुरुषसिंह श्रीराम के मन में एक जिज्ञासा जाग उठी। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से कहा,
“मुनिश्रेष्ठ! जब वह यक्षिणी एक अबला कही जाती है, तब उसकी शक्ति तो थोड़ी ही होनी चाहिए। फिर वह एक हजार हाथियों का बल कैसे धारण करती है?”
राम का प्रश्न सरल था, पर उसमें करुणा और धर्म दोनों की छाया थी।
अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथ के ये वचन सुनकर विश्वामित्र के अधरों पर मृदु मुस्कान आई। उन्होंने स्नेहभरी वाणी में लक्ष्मण सहित श्रीराम को संबोधित करते हुए कहा,
“रघुनन्दन! सुनो। ताटका के अधिक बलशाली होने का कारण साधारण नहीं है। उसमें वरदानजनित बल का उदय हुआ है। इसलिए वह अबला होकर भी सबला बन गई है।”
फिर उन्होंने अतीत का पट खोला—
बहुत पहले सुकेतु नाम के एक महान यक्ष थे। वे अत्यंत पराक्रमी, धर्मात्मा और सदाचारी थे, किंतु संतानहीन थे। संतान की अभिलाषा में उन्होंने कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से ब्रह्माजी अत्यंत प्रसन्न हुए। वे प्रकट हुए और सुकेतु को एक कन्यारत्न प्रदान किया। उसका नाम रखा गया—ताटका।
ब्रह्माजी ने उस कन्या को एक हजार हाथियों के समान बल भी दिया। परंतु उन्होंने सुकेतु को पुत्र नहीं दिया, क्योंकि वे जानते थे कि यदि पुत्र हुआ, तो उसके द्वारा जनता को अत्यधिक कष्ट पहुँच सकता है। इस विचार से उन्होंने केवल कन्या का ही वरदान दिया।
समय बीता। वह यक्ष-बालिका धीरे-धीरे बढ़ने लगी। रूप और यौवन से वह अत्यंत शोभायमान हुई। तब सुकेतु ने अपनी उस यशस्विनी कन्या का विवाह जम्भपुत्र सुन्द से कर दिया।
कुछ समय पश्चात् ताटका ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम मारीच रखा गया। वह दुर्जय था। परंतु आगे चलकर अगस्त्य मुनि के शाप से वही मारीच राक्षस बन गया।
विश्वामित्र का स्वर गंभीर हो उठा—
“श्रीराम! अगस्त्य मुनि ने ही शाप देकर ताटकापति सुन्द का भी वध कर दिया। पति के मारे जाने पर ताटका के हृदय में प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठी। वह अपने पुत्र के साथ अगस्त्य मुनि को मार डालने की इच्छा से दौड़ी।”
वह क्रोध से पागल होकर गर्जना करती हुई मुनि की ओर बढ़ी। उसे आते देख भगवान अगस्त्य ने मारीच से कहा,
“तू देवयोनि-रूप का परित्याग कर राक्षसभाव को प्राप्त हो जा।”
और फिर अमर्ष से भरे हुए ऋषि ने ताटका को भी शाप दिया—
“तू विकराल मुखवाली नरभक्षिणी राक्षसी हो जा। तू महायक्षी है, पर अब शीघ्र ही यह रूप छोड़कर भयावह स्वरूप धारण करेगी।”
शाप का प्रभाव तुरंत प्रकट हुआ। उसका दिव्य सौंदर्य नष्ट हो गया। उसका रूप भयंकर हो उठा। पर शाप के साथ उसका क्रोध और भी प्रज्वलित हो गया। वह अमर्ष से मूर्छित-सी होकर उस सुंदर देश को उजाड़ने लगी जहाँ अगस्त्य निवास करते थे। यज्ञों में विघ्न पड़ने लगे, ऋषि भयभीत हो उठे, और वह भूमि जो कभी शांत थी, आतंक से काँपने लगी।
विश्वामित्र ने दृढ़ स्वर में कहा,
“रघुनन्दन! गौओं और ब्राह्मणों के हित के लिए इस दुष्ट पराक्रमवाली, भयङ्कर दुराचारिणी यक्षी का वध करो। तीनों लोकों में इसे मारने में तुम्हारे सिवा कोई समर्थ नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा,
“नरश्रेष्ठ! स्त्री-हत्या का विचार करके इसके प्रति दया मत दिखाओ। यदि एक राजपुत्र को चारों वर्णों के हित के लिए स्त्री का वध भी करना पड़े, तो उसे पीछे नहीं हटना चाहिए। प्रजापालक नरेश को प्रजा की रक्षा के लिए चाहे क्रूरतापूर्ण या निर्दोष, पातकयुक्त या सदोष कर्म ही क्यों न करना पड़े, उसे करना चाहिए। यही उसका सनातन धर्म है।”
वन में जैसे समय ठहर गया था। राम शांत खड़े थे, पर उनके भीतर धर्म का निर्णय आकार ले रहा था।
विश्वामित्र ने उदाहरण देते हुए कहा,
“पूर्वकाल में विरोचन की पुत्री मन्थरा संपूर्ण पृथ्वी का नाश करना चाहती थी। यह जानकर इन्द्र ने उसका वध कर डाला।
और प्राचीन समय में शुक्राचार्य की माता तथा भृगु की पतिव्रता पत्नी त्रिभुवन को इन्द्र से शून्य कर देना चाहती थीं। तब भगवान विष्णु ने उन्हें भी मार डाला।
अनेक महामनस्वी राजकुमारों ने पापाचारिणी स्त्रियों का वध किया है। अतः नरेश्वर! तुम भी मेरी आज्ञा से दया और घृणा दोनों का त्याग कर इस राक्षसी का वध करो।”
मुनि के शब्दों में केवल आदेश नहीं था—वह धर्म का आह्वान था।
श्रीराम ने शांत नेत्रों से मुनि की ओर देखा। उनके हृदय में करुणा थी, पर उससे भी अधिक प्रजा की रक्षा का संकल्प। उस क्षण एक राजकुमार के भीतर का रक्षक जाग उठा।
वन की वायु गंभीर हो गई। धर्म ने अपना मार्ग चुन लिया था।