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नियति का अवतरण — जब धर्म ने मनुष्य-रूप माँगा

 

 

तीनों लोकों में उस समय एक अदृश्य किंतु गहरा संकट छाया हुआ था। लंका का अधिपति रावण अपने तपोबल और ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के कारण उन्मत्त हो चुका था। उसने वर्षों तक कठोर तप किया था, जिससे सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा भी प्रसन्न हो गए थे। वरदान माँगते समय रावण ने देवताओं, दानवों, गंधर्वों, यक्षों और समस्त दिव्य प्राणियों से अभय माँगा, पर मनुष्य को उसने तुच्छ, दुर्बल और महत्वहीन समझकर पूरी तरह अनदेखा कर दिया। यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी। वरदान पाकर उसका अहंकार और बढ़ गया। वह स्वयं को अजेय मानने लगा और तीनों लोकों को पीड़ा देने लगा। ऋषियों के यज्ञ विध्वंस होने लगे, आश्रम उजड़ गए और नारी का अपहरण उसका सामान्य व्यवहार बन गया। अधर्म निर्भय होकर विचरने लगा।

 

इस असहनीय पीड़ा से व्यथित होकर देवता, ऋषि और सिद्धगण एकत्र हुए और अंततः सर्वव्यापी नारायण की शरण में पहुँचे। भगवान विष्णु सब कुछ जानते थे, फिर भी उन्होंने लीला-वश देवताओं से मधुर स्वर में प्रश्न किया—रावण का वध किस उपाय से किया जाए। यह प्रश्न अज्ञान का नहीं, बल्कि धर्म की मर्यादा का था, क्योंकि ईश्वर भी अपनी लीला में लोकसंवाद और सामूहिक विवेक को महत्व देते हैं। देवताओं ने विनयपूर्वक निवेदन किया कि रावण को केवल मनुष्य से ही भय है, क्योंकि उसी से उसने वरदान में सुरक्षा नहीं माँगी थी। इसलिए उसका अंत भी मनुष्य के हाथों ही निश्चित है।

 

देवताओं की बात सुनकर भगवान विष्णु के हृदय में करुणा उमड़ पड़ी। उन्होंने निश्चय किया कि वे अपनी दिव्यता को आच्छादित कर मनुष्य रूप में अवतरित होंगे। यह केवल रावण-वध की योजना नहीं थी, बल्कि संसार को यह दिखाने की लीला थी कि धर्म की स्थापना के लिए ईश्वर भी मानव मर्यादा में बँधना स्वीकार करते हैं। उन्होंने अयोध्या के धर्मपरायण, सत्यनिष्ठ और महातेजस्वी राजा दशरथ को अपना पिता बनाने का संकल्प किया। यह कोई संयोग नहीं था कि उसी समय राजा दशरथ संतानहीनता के दुःख से व्यथित होकर पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे। मानव की आकांक्षा और दैवी योजना एक ही बिंदु पर आकर मिल गई थी।

 

भगवान विष्णु ने पितामह ब्रह्मा से अनुमति ली, देवताओं और महर्षियों से पूजित हुए और अंतर्धान हो गए। उधर अयोध्या में यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित थी। मंत्रोच्चार से वातावरण पवित्र हो उठा था। तभी यज्ञकुंड से एक अद्भुत, विशालकाय और महातेजस्वी दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। उसका तेज सूर्य के समान था, वाणी दुंदुभि की तरह गंभीर थी और शरीर से ऐसी प्रभा निकल रही थी जिसकी कहीं तुलना नहीं थी। उसके रोम, दाढ़ी और केश सिंह के समान भव्य थे। वह लाल वस्त्र धारण किए हुए था और उसके हाथों में सुवर्ण की एक विशाल परात थी, जिसमें दिव्य खीर भरी हुई थी। वह खीर साधारण अन्न नहीं, बल्कि देवताओं द्वारा निर्मित संतानदायिनी अमृत थी।

 

उस दिव्य पुरुष ने राजा दशरथ से कहा कि वह प्रजापति की आज्ञा से आया है और यह खीर देवताओं की कृपा का प्रतीक है। इसे ग्रहण कर अपनी योग्य पत्नियों को देने से उन्हें तेजस्वी पुत्रों की प्राप्ति होगी। राजा दशरथ ने अपार श्रद्धा और आनंद के साथ उस परात को अपने मस्तक पर धारण किया। उन्होंने उस दिव्य पुरुष की परिक्रमा की और कृतज्ञ भाव से प्रणाम किया। अपना कार्य पूर्ण कर वह पुरुष वहीं अंतर्धान हो गया, पर अपने पीछे एक महान भविष्य की नींव छोड़ गया।

 

राजा दशरथ उस खीर को लेकर अंतःपुर में पहुँचे। वहाँ उन्होंने उसे अत्यंत विवेक और श्रद्धा से अपनी तीनों रानियों में बाँटा। आधा भाग महारानी कौसल्या को दिया, क्योंकि वही सबसे वरिष्ठ और धर्मनिष्ठ थीं। शेष आधे का आधा भाग सुमित्रा को दिया। फिर बचे हुए भाग का आधा कैकेयी को अर्पित किया और अंत में जो अमृतोपम अंश शेष बचा, उसे पुनः सुमित्रा को दे दिया। यह वितरण केवल मात्रा का नहीं था, बल्कि भविष्य में जन्म लेने वाले महान व्यक्तित्वों की भूमिका का सूक्ष्म विधान था।

 

तीनों रानियों ने उस खीर को अपने सौभाग्य का प्रतीक मानकर ग्रहण किया। उनके हृदय आनंद से भर उठे। शीघ्र ही उन्होंने गर्भ धारण किया और उनके गर्भ अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी हो उठे। अयोध्या का वातावरण आनंद और आशा से भर गया। जब राजा दशरथ ने अपनी रानियों को गर्भवती देखा, तो उन्हें लगा कि उनका जीवन सफल हो गया है। उनका दुःख मिट गया और हृदय संतोष से भर उठा।

 

इस प्रकार ईश्वर की वह लीला आगे बढ़ी, जिसमें अधर्म के विनाश का बीज मानव लोक में बोया गया। यह स्पष्ट हो गया कि रावण का अंत किसी दिव्य अस्त्र या देवता के हाथों नहीं, बल्कि मनुष्य रूप में अवतरित धर्म के द्वारा होगा। जो रावण मनुष्य को दुर्बल समझकर हँसता था, वही मनुष्य उसके विनाश का कारण बनेगा। यही इस पूरी कथा का गूढ़ सत्य है—कि अहंकार से बड़ी कोई कमजोरी नहीं और विनय से बड़ा कोई बल नहीं।