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निषादराज गुह की व्याकुलता और भरत से हृदयस्पर्शी मिलन

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निषादराज गुह की व्याकुलता और भरत से हृदयस्पर्शी मिलन

गङ्गा के शांत तट पर संध्या धीरे-धीरे उतर रही थी। तभी निषादराज गुह की दृष्टि नदी के उस पार ठहरी एक विशाल सेना पर पड़ी। जहाँ तक नज़र जाती, सैनिकों, रथों, हाथियों और घोड़ों का अंत दिखाई नहीं देता था। वह दृश्य ऐसा था मानो स्वयं समुद्र अपनी अनगिनत लहरों सहित धरती पर उतर आया हो। गुह का हृदय एकाएक आशंका से भर उठा। उसे लगा कि इतनी बड़ी सेना का यहाँ आना किसी साधारण उद्देश्य से नहीं हो सकता।

वह गम्भीर मन से अपने भाई-बन्धुओं और निषाद वीरों के बीच पहुँचा। उसके चेहरे पर चिंता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उसने कहा कि यह सेना इतनी विशाल है कि इसकी सीमा का अनुमान लगाना भी असंभव है। जितना वह सोचता है, उतनी ही उसकी चिंता बढ़ती जाती है। उसे समझ नहीं आ रहा कि इस अचानक आए हुए सैन्यबल का उद्देश्य क्या हो सकता है।

कुछ देर तक ध्यानपूर्वक देखने पर उसकी दृष्टि एक विशाल ध्वजा पर पड़ी, जिस पर कोविदार वृक्ष का चिन्ह अंकित था। गुह तुरंत पहचान गया कि यह अयोध्या के राजकुमार भरत की ध्वजा है। उसके मन में विचार आया कि निश्चय ही भरत स्वयं इस सेना के साथ आए हैं।

किन्तु श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम रखने वाले गुह के मन में तुरंत एक भयंकर आशंका जन्म लेने लगी। उसने सोचा—यदि भरत का उद्देश्य श्रीराम को हानि पहुँचाना हुआ तो? कहीं ऐसा तो नहीं कि पहले वे हमें बंदी बना लें या हमारा वध कर दें, ताकि श्रीराम तक पहुँचने में कोई बाधा न रहे? फिर वे वन में जाकर उन श्रीराम का भी अंत कर दें, जिन्हें राजा दशरथ ने वनवास दिया है।

गुह का मन कैकेयी की कठोर मांगों को याद करके और भी विचलित हो उठा। उसे लगा कि शायद भरत भी अपनी माता की ही इच्छा पूरी करना चाहते हैं। उसने मन ही मन सोचा कि दुर्लभ राजसिंहासन पर अकेले अधिकार करने के लिए कहीं भरत श्रीराम को वन में मार डालने न आए हों। श्रीराम के प्रति प्रेम और चिंता ने उसके विवेक को भय से ढक लिया।

पर अगले ही क्षण उसका हृदय दृढ़ हो गया। उसने अपने साथियों से कहा कि श्रीराम केवल अयोध्या के राजकुमार ही नहीं, उसके स्वामी भी हैं और प्रिय मित्र भी। उनके प्राणों की रक्षा करना उसका धर्म है। इसलिए सब लोग तुरंत अपने अस्त्र-शस्त्र धारण कर गङ्गा के तट पर चौकसी करें और किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार रहें।

उसने विशेष रूप से सभी मल्लाहों को आदेश दिया कि वे पूरी रात गङ्गा की रक्षा करें। कोई भी नाव बिना अनुमति नदी पार न कर सके। सभी नाविक अपने साथ रखे फल-मूल खाकर रातभर जागते रहें और सावधानी में कोई कमी न आने दें। गुह जानता था कि यदि नदी सुरक्षित रही, तो श्रीराम तक पहुँचना भी कठिन होगा।

उसने अपनी पूरी नौसेना को भी तैयार कर दिया। पाँच सौ नावों में प्रत्येक पर सौ-सौ बलवान और युद्धकला में निपुण निषाद सैनिक बैठा दिए गए। हर नाव को युद्ध के लिए सज्जित कर दिया गया। यह केवल सुरक्षा की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि अपने प्रिय मित्र श्रीराम के प्रति गुह की अटूट निष्ठा का प्रमाण था।

फिर भी उसके मन में न्याय और सत्य का स्थान बना रहा। उसने अपने साथियों से कहा कि यदि भरत का हृदय वास्तव में श्रीराम के प्रति निर्मल और प्रेमपूर्ण होगा, तभी उनकी सेना को गङ्गा पार करने दिया जाएगा। पहले वह स्वयं भरत की भावना को परखेगा, उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा। वह बिना सत्य जाने किसी पर अन्याय नहीं करना चाहता था।

यह निश्चय करके गुह स्वयं भेंट लेकर भरत से मिलने चला। वह अपने साथ मिश्री, फल, फलों का गूदा, मधु और अनेक वनोपज लेकर गया। यह उसके हृदय का संस्कार था—अतिथि चाहे मित्र हो या शत्रु, पहले उसका सम्मान किया जाता है।

उधर भरत के पास पहुँचने से पहले ही सुमन्त्र ने दूर से गुह को आते देखा। वे समय की आवश्यकता को भली-भाँति समझते थे। उन्होंने भरत से अत्यंत आदरपूर्वक कहा कि यह निषादराज गुह हैं। वे इस प्रदेश के अधिपति हैं, हजारों निषाद इनके साथ रहते हैं और सबसे बढ़कर, वे श्रीराम के अत्यंत प्रिय मित्र हैं। वन के प्रत्येक मार्ग से परिचित होने के कारण इन्हें अवश्य पता होगा कि श्रीराम और लक्ष्मण इस समय कहाँ हैं। इसलिए इनसे अवश्य मिलना चाहिए।

सुमन्त्र की बात सुनकर भरत के मन में प्रसन्नता भर गई। वे स्वयं भी श्रीराम के समाचार पाने के लिए व्याकुल थे। उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि निषादराज गुह को बिना विलंब उनके पास आदर सहित लाया जाए।

आज्ञा मिलते ही गुह अपने भाई-बन्धुओं के साथ विनम्रता और प्रसन्नता से भरत के सामने पहुँचा। उसने बड़े आदर से प्रणाम किया। उसके हृदय की प्रारम्भिक शंका अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी, परन्तु अतिथि-सत्कार उसका स्वभाव था। इसलिए उसने अपने मन की चिंता को छिपाकर अत्यंत विनम्र शब्दों में भरत का स्वागत किया।

गुह ने प्रेमपूर्वक कहा कि यह वन उनके लिए किसी पराए स्थान जैसा नहीं, बल्कि अपने घर के बगीचे के समान है। यदि भरत ने आने का संदेश पहले भेज दिया होता तो वह और भी भव्य स्वागत की तैयारी करता। उसके पास जो कुछ भी है—यह भूमि, यह वन, यह निवास, यह सब भरत का ही है। वे यहाँ बिना किसी संकोच के सुखपूर्वक रहें।

फिर उसने बड़े स्नेह से अपने साथ लाए उपहार प्रस्तुत किए। उसने बताया कि निषादों ने अपने हाथों से ताजे फल तोड़े हैं। कुछ फल अभी हरे और ताजे हैं, कुछ सूख चुके हैं। स्वादिष्ट फल का गूदा तैयार किया गया है। मधु और अनेक प्रकार की वन-उपज भी उनके लिए लाई गई है। उसने आग्रह किया कि भरत इन सरल किन्तु प्रेम से भरी भेंटों को अवश्य स्वीकार करें।

अंत में गुह ने अत्यंत आत्मीयता से निवेदन किया कि भरत अपनी पूरी सेना सहित आज की रात यहीं विश्राम करें। वह और उसके निषाद बन्धु अपने सामर्थ्य के अनुसार सभी सैनिकों का सत्कार करेंगे, उनकी प्रत्येक आवश्यकता पूरी करेंगे। अगले दिन प्रातः विश्राम और सेवा ग्रहण करने के बाद वे अपनी यात्रा आगे बढ़ाएँ। गुह के इन शब्दों में किसी राजा का औपचारिक स्वागत नहीं था, बल्कि एक सरल, निष्कपट और धर्मनिष्ठ हृदय का सच्चा प्रेम झलक रहा था। उसकी विनम्रता यह बता रही थी कि बाहरी वैभव से कहीं अधिक मूल्यवान होता है प्रेम, सेवा और आत्मीयता से किया गया सत्कार।