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परशुराम का प्रचंड आह्वान और राम की शांत तेजस्विता
आँधी के शांत होते ही धूल से ढका हुआ आकाश धीरे-धीरे साफ होने लगा। उसी धुंधले वातावरण में एक अग्नि-शिखा के समान तेजस्वी पुरुष आगे बढ़ते दिखाई दिये। उनके चरणों की आहट ही मानो पृथ्वी को कंपा रही थी। कंधे पर भयानक फरसा, हाथ में दिव्य धनुष, नेत्रों में अग्नि और मुख पर कठोर तेज—यह स्वरूप देखकर सभी समझ गये कि यह कोई साधारण तपस्वी नहीं, बल्कि भृगुवंशी महापराक्रमी परशुराम हैं। उनके आगमन से वातावरण में भय, सम्मान और उत्सुकता एक साथ भर उठी।
परशुराम की दृष्टि सीधे श्रीराम पर जाकर ठहर गई। वे गंभीर स्वर में बोले कि दशरथनन्दन राम! तुम्हारे अद्भुत पराक्रम की चर्चा चारों दिशाओं में फैल चुकी है। शिवधनुष को तोड़ देना कोई साधारण बात नहीं, वह असंभव-सी घटना थी। उसी समाचार को सुनकर वे स्वयं यहाँ आये हैं। उनके स्वर में चुनौती भी थी और जिज्ञासा भी। उन्होंने अपने हाथ का विशाल धनुष आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह वही भयंकर वैष्णव धनुष है, जिसे खींचना ही वीरों के लिए कठिन है। यदि राम इसे उठाकर उस पर बाण चढ़ा दें, तो वे उनके बल को स्वीकार करेंगे और फिर एक महान द्वन्द्वयुद्ध देंगे, जो किसी भी वीर के लिए गौरव का विषय होगा।
यह सुनते ही राजा दशरथ का हृदय मानो थम गया। उनके मुख पर चिंता की रेखाएँ स्पष्ट दिखाई देने लगीं। वे काँपते हुए हाथ जोड़कर परशुराम के सामने खड़े हो गये। उनका स्वर दीन और विनम्र था। उन्होंने कहा कि आप ब्राह्मणों के श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न, तप और ज्ञान से शोभित महापुरुष हैं। आपने पहले ही क्षत्रियों पर अपना क्रोध प्रकट करके शस्त्र त्याग दिया था, अतः अब कृपा करके उनके बालक पुत्रों को अभय दें। उन्होंने स्मरण कराया कि परशुराम ने इन्द्र के समक्ष प्रतिज्ञा करके शस्त्र त्यागे थे, पृथ्वी कश्यप मुनि को दान कर दी थी और महेन्द्र पर्वत पर तपस्या में लीन हो गये थे। फिर आज वे पुनः शस्त्र लेकर क्यों आये हैं? दशरथ की वाणी भावुक हो उठी—उन्होंने कहा कि यदि राम को कुछ हो गया, तो उनके साथ पूरा परिवार भी जीवन त्याग देगा।
दशरथ की करुण पुकार पर भी परशुराम के चेहरे पर कोई परिवर्तन नहीं आया। वे जैसे इन शब्दों को सुन ही नहीं रहे थे। उनकी दृष्टि केवल श्रीराम पर टिकी रही। वे शांत किंतु दृढ़ स्वर में बोले कि संसार में दो दिव्य धनुष थे, जिन्हें स्वयं विश्वकर्मा ने बनाया था। उनमें से एक देवताओं ने भगवान शिव को दिया था, जिससे उन्होंने त्रिपुरासुर का संहार किया था—और वही धनुष राम ने तोड़ दिया है। दूसरा धनुष उनके हाथ में है, जिसे देवताओं ने भगवान विष्णु को प्रदान किया था। यह वैष्णव धनुष शत्रुओं का विनाश करने वाला है और शिवधनुष के समान ही प्रबल है।
परशुराम ने आगे बताया कि एक समय देवताओं के मन में जिज्ञासा उठी कि शिव और विष्णु में कौन अधिक बलवान है। पितामह ब्रह्मा ने उस जिज्ञासा को जानकर दोनों में विरोध उत्पन्न कर दिया। तब दोनों देवताओं में भयंकर युद्ध हुआ—ऐसा युद्ध कि देवताओं के भी हृदय काँप उठे। उस समय भगवान विष्णु की हुँकार से शिव का धनुष शिथिल हो गया और स्वयं महादेव भी क्षणभर के लिए स्तम्भित हो गये। यह देखकर ऋषि, देवता और चारण भयभीत होकर दोनों से शांति की प्रार्थना करने लगे। अंततः दोनों शांत हुए और देवताओं ने विष्णु के पराक्रम को श्रेष्ठ माना।
क्रोधित होकर रुद्र ने अपना धनुष विदेह के राजर्षि देवरात को दे दिया। दूसरी ओर वैष्णव धनुष विष्णु ने भृगुवंशी ऋचीक मुनि को धरोहर रूप में दिया। ऋचीक ने यह धनुष अपने पुत्र जमदग्नि को सौंपा, और वही धनुष परंपरा से परशुराम के पास आया। परशुराम का स्वर अब भावुक हो उठा। उन्होंने बताया कि जब उनके पिता जमदग्नि तपस्या में लीन थे, तभी कृतवीर्य अर्जुन ने उनका वध कर दिया। इस अन्यायपूर्ण घटना ने उनके हृदय में प्रचंड अग्नि जला दी। उन्होंने क्रोध में आकर बार-बार क्षत्रियों का संहार किया और पृथ्वी को अपने अधिकार में लेकर यज्ञ के बाद कश्यप मुनि को दान कर दी। फिर वे महेन्द्र पर्वत पर तपस्या में लीन हो गये। वहीं रहते हुए उन्हें शिवधनुष के टूटने का समाचार मिला और वे तुरंत यहाँ आ पहुँचे।
अब उनका स्वर फिर चुनौतीपूर्ण हो उठा। उन्होंने राम की ओर धनुष बढ़ाते हुए कहा कि यह वही वैष्णव धनुष है, जो पीढ़ियों से उनके कुल में सुरक्षित रहा है। यदि राम सचमुच क्षत्रियधर्म का पालन करने वाले वीर हैं, तो वे इस धनुष को उठाकर उस पर बाण चढ़ाएँ। यदि वे ऐसा कर सके, तभी वे उन्हें द्वन्द्वयुद्ध का अवसर देंगे। परशुराम के शब्दों के साथ वातावरण में तनाव फैल गया। सभी की साँसें थम गईं। एक ओर परशुराम का प्रचंड तेज था, दूसरी ओर श्रीराम का शांत और धैर्यपूर्ण मुख—जैसे आने वाला क्षण इतिहास में अमिट होने वाला हो।