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पुत्रेष्टि यज्ञ और रामावतार की दिव्य योजना

 

यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और भावपूर्ण अध्याय है, जहाँ एक ओर पुत्रेष्टि यज्ञ की पावन तैयारी चल रही है और दूसरी ओर रावण-वध के लिये अवतार की दिव्य योजना बन रही है।

महात्मा ऋष्यशृंग अपने समय के महान् तपस्वी, वेदों के गहन ज्ञाता और अद्भुत तेज से युक्त ऋषि थे। जब राजा दशरथ ने उनसे पुत्रप्राप्ति का उपाय पूछा, तब उन्होंने कुछ समय तक गहन ध्यान लगाया। ध्यानावस्था में उन्होंने अपने भावी कर्तव्य को स्पष्ट रूप से देख लिया। ध्यान से विरत होकर उन्होंने शांत और विश्वासपूर्ण स्वर में राजा से कहा कि वे अथर्ववेद के मंत्रों द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करेंगे और यदि यह यज्ञ वेदों की विधि के अनुसार सम्पन्न किया गया, तो निश्चय ही सफल होगा।

 

ऋष्यशृंग मुनि ने तत्क्षण उस महान यज्ञ की तैयारी प्रारम्भ कर दी। यज्ञ का उद्देश्य केवल राजा दशरथ को पुत्र प्रदान करना नहीं था, बल्कि इसके पीछे त्रिलोकी के उद्धार की एक गूढ़ योजना छिपी हुई थी। श्रौत-विधि के अनुसार अग्नि में आहुतियाँ दी जाने लगीं। जैसे ही यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित हुई, वैसे ही उसकी दिव्य ऊर्जा समस्त लोकों में फैल गई।

 

इस यज्ञ की महत्ता को देखकर देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षिगण भी विधिपूर्वक अपने-अपने भाग ग्रहण करने के लिये वहाँ एकत्र हुए। परन्तु यज्ञ-सभा में एक और गम्भीर घटना घट रही थी। समस्त देवता, एक-दूसरे की दृष्टि से अदृश्य रहते हुए, लोककर्ता ब्रह्माजी के पास पहुँचे और अत्यन्त पीड़ा के साथ अपनी व्यथा प्रकट करने लगे।

 

देवताओं ने ब्रह्माजी से कहा कि रावण, जो उनके वरदान से अत्यन्त बलशाली हो गया है, तीनों लोकों को असहनीय कष्ट दे रहा है। उसके अत्याचारों को सहने की उनमें शक्ति नहीं बची है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ब्रह्माजी द्वारा दिया गया वरदान ही उसके अहंकार और उन्माद का कारण बन गया है। रावण देवताओं, ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों और ब्राह्मणों तक को अपमानित करता फिरता है। सूर्य उसको ताप नहीं पहुँचा पाते, वायु उसके सामने निर्बल हो जाती है और समुद्र तक उसे देखकर भय से स्थिर हो जाता है।

 

देवताओं ने अत्यन्त करुण स्वर में ब्रह्माजी से प्रार्थना की कि वे इस भयंकर राक्षस के वध का कोई उपाय बतायें, क्योंकि अब उसका आतंक असहनीय हो चुका है।

 

ब्रह्माजी ने गम्भीरता से विचार किया और फिर समाधान के स्वर में कहा कि रावण ने वरदान माँगते समय एक बड़ी भूल कर दी थी। उसने देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष और राक्षसों से न मारे जाने का वर माँगा था, परन्तु मनुष्य को तुच्छ समझकर उनसे अवध्य होने का वर नहीं माँगा। अतः उसका वध अब केवल मनुष्य के हाथों ही सम्भव है।

 

यह सुनकर समस्त देवता और महर्षि हर्ष से भर उठे। उसी क्षण आकाश में दिव्य प्रकाश फैल गया और गरुड़ पर सवार, मेघों के ऊपर सूर्य के समान तेजस्वी भगवान् विष्णु वहाँ प्रकट हुए। पीताम्बर धारण किये, शंख-चक्र-गदा से सुशोभित, सुवर्ण के केयूरों से दमकती भुजाओं वाले भगवान् को देखकर समस्त देवताओं ने उनकी वन्दना की।

 

देवताओं ने विनयपूर्वक भगवान् विष्णु से प्रार्थना की कि वे अयोध्या के धर्मात्मा राजा दशरथ के पुत्र रूप में अवतार लें। उन्होंने बताया कि दशरथ धर्मज्ञ, उदार और महर्षियों के समान तेजस्वी हैं तथा उनकी तीनों रानियाँ साक्षात् ह्री, श्री और कीर्ति के समान हैं। देवताओं ने निवेदन किया कि भगवान् अपने चार स्वरूपों में अवतरित होकर मनुष्य रूप में रावण का वध करें, क्योंकि वही एकमात्र उपाय है।

 

भगवान् विष्णु ने देवताओं को आश्वस्त करते हुए कहा कि वे रावण को उसके पुत्र, पौत्र, मन्त्री और सम्पूर्ण कुल सहित नष्ट करेंगे और ग्यारह हजार वर्षों तक पृथ्वी पर मनुष्य रूप में निवास करेंगे। यह वचन देकर भगवान् ने अपने अवतार की भूमि और पिता के विषय में विचार किया और राजा दशरथ को अपना पिता स्वीकार करने का निश्चय किया।

 

इसके बाद देवताओं, ऋषियों, गन्धर्वों और अप्सराओं ने भगवान् मधुसूदन की दिव्य स्तुति की और उनसे प्रार्थना की कि वे उस अहंकारी, क्रूर और तपस्वियों को भयभीत करने वाले रावण की जड़ उखाड़ फेंकें। उन्होंने कहा कि रावण साधुओं के लिये काँटे के समान है और उसके नाश से ही संसार में शान्ति लौट सकती है।

 

इस प्रकार, पुत्रेष्टि यज्ञ केवल चार पुत्रों की प्राप्ति का साधन नहीं था, बल्कि वह रामावतार की भूमिका, धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म के विनाश की दिव्य योजना का प्रारम्भ था।