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पुत्र-वियोग का श्राप और राजा दशरथ की अंतिम रात्रि
अयोध्या के राजमहल में उस रात गहरा शोक छाया हुआ था। राजा दशरथ का शरीर दुर्बल हो चुका था और उनका मन केवल श्रीराम के वियोग में डूबा हुआ था। कौसल्या उनके पास बैठी थीं। तभी दशरथ को अपने जीवन की वह घटना स्मरण हो आई, जिसने आज उनके सामने दुःख का यह महासागर खड़ा कर दिया था।
उन्होंने कौसल्या से कहा कि जब वे युवा थे, तब एक भयंकर भूल उनसे हो गई थी। वन में शब्दवेधी बाण चलाते समय उन्होंने एक तपस्वी बालक को मार दिया था। जब वे उसके अंधे माता-पिता के पास पहुँचे और सारी घटना बताई, तब वे दोनों शोक से टूट गए।
अपने पुत्र का अंतिम संस्कार करने के बाद वह महातेजस्वी वृद्ध मुनि अपनी पत्नी के साथ खड़े हुए। उनकी आँखों से अश्रु बह रहे थे और उनका कंठ दुःख से भर गया था। उन्होंने दशरथ से कहा कि अब उनका जीवन निरर्थक हो गया है। उनका एकमात्र पुत्र ही उनके जीवन का आधार था। अब जब वह उनसे छिन गया है, तब मृत्यु भी उन्हें भयावह नहीं लगती।
फिर वे बोले कि यद्यपि यह अपराध अज्ञानवश हुआ है, फिर भी उसके फल से कोई नहीं बच सकता। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार आज वे पुत्र-वियोग की असहनीय पीड़ा सह रहे हैं, उसी प्रकार एक दिन दशरथ भी अपने प्रिय पुत्र के वियोग में तड़पेंगे। उनका हृदय भी इसी प्रकार टूटेगा और अंततः वे भी पुत्र-शोक में ही अपने प्राण त्यागेंगे।
वृद्ध मुनि ने यह भी कहा कि यह कर्मफल अवश्य प्राप्त होगा। जैसे दान देने वाले को उसके कर्म के अनुसार फल मिलता है, वैसे ही इस कर्म का फल भी समय आने पर अवश्य मिलेगा।
श्राप देने के बाद वे दोनों पति-पत्नी अपने पुत्र के शरीर के पास बैठकर बहुत देर तक विलाप करते रहे। उनका रोदन इतना करुण था कि वन का वातावरण भी शोकमय हो उठा। अंत में उन्होंने अपने पुत्र की चिता में ही प्रवेश कर लिया और अपने प्राण त्याग दिए।
दशरथ ने भारी स्वर में कहा कि आज वही श्राप उनके सामने खड़ा है। वर्षों पहले किया गया वह पाप अब उन्हें स्मरण हो आया है। जिस प्रकार गलत भोजन शरीर में रोग उत्पन्न कर देता है, उसी प्रकार उनके उस कर्म का परिणाम अब उनके जीवन में प्रकट हो गया है। उस महात्मा का श्राप अब फल देने आ पहुँचा है।
इतना कहते-कहते दशरथ भय और शोक से काँप उठे। उन्होंने कौसल्या से कहा कि अब उन्हें स्पष्ट अनुभव हो रहा है कि वे पुत्र-वियोग में अपने प्राण त्याग देंगे। उनकी आँखें धुँधली हो गई थीं। वे कौसल्या को देख नहीं पा रहे थे। उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें देख नहीं सकता, केवल तुम्हारा स्पर्श महसूस करना चाहता हूँ।”
उनकी आवाज भर्रा गई। वे बोले, “मृत्यु के निकट पहुँचा हुआ मनुष्य अपने प्रियजनों को स्पष्ट नहीं देख पाता। यदि इस समय राम आ जाएँ, एक बार मेरा हाथ पकड़ लें, या लौटकर अयोध्या का राज्य स्वीकार कर लें, तो शायद मैं जीवित रह जाऊँ।”
फिर उनके हृदय में पश्चाताप की लहर उठी। उन्होंने कहा, “मैंने राम के साथ न्याय नहीं किया। एक पिता होकर भी मैं उन्हें वन जाने से नहीं रोक सका। परन्तु राम ने कभी मेरे विरुद्ध एक शब्द नहीं कहा। उन्होंने न कोई शिकायत की, न कोई कटु वचन कहा।”
दशरथ स्वयं को धिक्कारते हुए बोले, “संसार में कौन ऐसा पिता होगा जो अपने धर्मात्मा और आज्ञाकारी पुत्र का त्याग कर दे? और कौन ऐसा पुत्र होगा जिसे घर से निकाल दिया जाए, फिर भी वह अपने पिता के प्रति क्रोध का एक शब्द भी न बोले? राम वास्तव में महान हैं।”
धीरे-धीरे उनकी चेतना क्षीण होने लगी। उन्होंने कहा, “अब मेरी आँखें कुछ नहीं देख पा रही हैं। मेरी स्मरण-शक्ति भी साथ छोड़ती जा रही है। मुझे ऐसा लगता है कि यमराज के दूत मुझे लेने के लिए आ पहुँचे हैं।”
उनकी सबसे बड़ी पीड़ा यही थी कि जीवन के अंतिम क्षणों में वे राम का दर्शन नहीं कर पा रहे थे। वे बार-बार कहते, “इससे बड़ा दुःख मेरे लिए क्या होगा कि मैं अपने सत्यपराक्रमी, धर्मज्ञ पुत्र राम को अंतिम बार भी नहीं देख पा रहा हूँ?”
राम का स्मरण करते हुए उनका हृदय प्रेम और वेदना से भर उठा। वे बोले, “राम जैसा पुत्र संसार में दूसरा नहीं है। उनके वियोग का शोक मेरे प्राणों को वैसे ही सुखा रहा है, जैसे प्रखर धूप थोड़े-से जल को शीघ्र सुखा देती है।”
उनकी आँखों के सामने राम का दिव्य स्वरूप घूमने लगा। वे कहने लगे, “वे लोग धन्य होंगे जो वनवास पूरा होने के बाद लौटे हुए राम का दर्शन करेंगे। वे उनके सुन्दर कुण्डलों से शोभित मुख को देखेंगे। वे उनके कमल जैसे नेत्र, सुन्दर भौंहें, उज्ज्वल दाँत और चन्द्रमा के समान शीतल मुख का दर्शन करेंगे।”
दशरथ की वाणी में अब केवल प्रेम ही प्रेम था। वे बोले, “जो लोग राम को पुनः अयोध्या लौटते देखेंगे, वही वास्तव में भाग्यशाली होंगे। उनके दर्शन से लोगों को वही सुख मिलेगा, जो अंधकार दूर होने पर प्रकाश मिलने से प्राप्त होता है।”
अब मृत्यु और निकट आ रही थी। दशरथ ने अनुभव किया कि उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो रही हैं। उन्होंने कहा, “मेरा मन मोह से घिर गया है। हृदय फटा जा रहा है। मैं शब्द, स्पर्श और स्वाद का अनुभव भी नहीं कर पा रहा हूँ।”
वे आगे बोले, “जैसे तेल समाप्त होने पर दीपक की लौ बुझ जाती है, वैसे ही मेरी चेतना क्षीण होती जा रही है। मेरी इन्द्रियाँ भी अब मेरा साथ छोड़ रही हैं।”
फिर उन्होंने अपने दुःख की तुलना प्रबल नदी से की और कहा, “जिस प्रकार नदी का वेग अपने ही किनारे को काटकर गिरा देता है, उसी प्रकार मेरा अपना शोक मुझे भीतर से नष्ट कर रहा है।”
अचानक वे व्याकुल होकर पुकार उठे—
“हा राम! हे महाबाहु रघुनन्दन! हे मेरे दुःख दूर करने वाले पुत्र! हे मेरे प्रिय बेटे! तुम कहाँ हो?”
उनकी करुण पुकार सुनकर कौसल्या और सुमित्रा के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी।
दशरथ ने अंतिम बार कौसल्या को पुकारा। फिर सुमित्रा को स्मरण किया। उसके बाद कैकेयी की ओर संकेत करते हुए अत्यंत दुःख से कहा कि उसकी इच्छा पूरी हो गई।
अब उनका शरीर पूर्णतः शिथिल हो चुका था। उनके होंठों पर राम का नाम था, हृदय में राम का प्रेम था और आँखों में राम के दर्शन की अधूरी आकांक्षा।
शोक, पश्चाताप, प्रेम और पुत्र-वियोग की अग्नि में जलते हुए अयोध्या के वृद्ध सम्राट ने अंततः आधी रात के समय अपने प्राण त्याग दिए।
राजा दशरथ की मृत्यु किसी युद्ध में नहीं हुई थी, न किसी शत्रु के हाथों। उनका अंत उस श्राप से हुआ, जो एक शोकाकुल पिता ने दिया था, और उस प्रेम से हुआ, जो एक पिता अपने पुत्र राम के लिए अपने हृदय में सँजोए हुए था। पुत्र-वियोग की वही पीड़ा अंततः उनके जीवन की अंतिम साँस बन गई।