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(२१)

पुत्र-स्नेह और धर्म-प्रतिज्ञा के बीच अयोध्या की राजसभा

 

अयोध्या की राजसभा उस समय गहन विषाद और करुणा से भरी हुई थी। महाराज दशरथ सिंहासन पर विराजमान अवश्य थे, किंतु उनका हृदय पिता के स्नेह से व्याकुल था। उनके मुख से निकलने वाले प्रत्येक वचन में श्रीराम के प्रति ममत्व स्पष्ट झलक रहा था। ऐसा प्रतीत होता था मानो उनका अंतःकरण ही शब्दों का रूप धारण कर सभा में बह रहा हो।

 

राजा के वचनों में भरे इस अपार पुत्र-स्नेह को सुनकर महर्षि विश्वामित्र का तपस्वी चित्त क्षुब्ध हो उठा। धर्म के प्रति उनकी निष्ठा भावनाओं के बंधन को स्वीकार नहीं कर सकती थी। वे कुपित होकर कठोर स्वर में बोले कि महाराज ने पहले उनकी माँग को स्वीकार कर प्रतिज्ञा की थी और अब उसी वचन से पीछे हटना चाहते हैं। प्रतिज्ञा का ऐसा परित्याग रघुवंशी राजाओं के अनुरूप नहीं है और ऐसा आचरण कुल के लिए अशुभ संकेत है। यदि राजा को यही उचित प्रतीत होता है तो वे बिना कार्य सिद्ध किए वैसे ही लौट जाना ही श्रेयस्कर समझते हैं और महाराज अपनी प्रतिज्ञा को मिथ्या सिद्ध कर सुखपूर्वक राज्य करें।

 

विश्वामित्र के इस प्रचंड रोष से समस्त वातावरण दहक उठा। ऐसा लगा मानो पृथ्वी काँप रही हो और दिशाएँ भय से थरथरा रही हों। देवताओं के मन में भी महान् आशंका उत्पन्न हो गई और समस्त संसार उस ब्रह्मतेज से त्रस्त हो उठा।

 

इस विकट स्थिति को देखकर धैर्य और धर्म के प्रतीक महर्षि वसिष्ठ आगे आए। उनका मुख शांत था और वाणी गंभीर। उन्होंने महाराज दशरथ को स्मरण कराया कि वे इक्ष्वाकुवंश में साक्षात् धर्म के समान उत्पन्न हुए हैं। वे धैर्यशील, उत्तम व्रतों के पालक और धर्मनिष्ठ राजा हैं, अतः उन्हें अपने धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए। तीनों लोकों में उनकी कीर्ति एक महान् धर्मात्मा के रूप में प्रसिद्ध है, इसलिए उन्हें अधर्म का भार अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए।

 

महर्षि वसिष्ठ ने प्रतिज्ञा की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहा कि जो पुरुष किसी कार्य की प्रतिज्ञा करके भी उसका पालन नहीं करता, उसके यज्ञ, याग और पूर्त कर्मों से अर्जित पुण्य नष्ट हो जाते हैं। अतः महाराज को चाहिए कि वे श्रीराम को महर्षि विश्वामित्र के साथ भेजें। साथ ही उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि चाहे श्रीराम अस्त्रविद्या में पूर्ण निपुण हों या न हों, राक्षस उनका सामना नहीं कर सकते। जैसे प्रज्वलित अग्नि से सुरक्षित अमृत को कोई स्पर्श नहीं कर सकता, उसी प्रकार विश्वामित्र के संरक्षण में रहते हुए श्रीराम को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता।

 

वसिष्ठ ने आगे कहा कि श्रीराम और महर्षि विश्वामित्र दोनों ही साक्षात् धर्म के स्वरूप हैं। वे बल में श्रेष्ठ, विद्या में अद्वितीय और तपस्या के अथाह भंडार हैं। तीनों लोकों में जितने भी अस्त्र-शस्त्र विद्यमान हैं, उनका पूर्ण ज्ञान विश्वामित्र को है और उनके प्रभाव को देवता, ऋषि, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और महान् नाग भी पूरी तरह नहीं जान सके हैं।

 

उन्होंने अस्त्रों की दिव्य उत्पत्ति का वर्णन करते हुए बताया कि वे प्रजापति कृशाश्व के धर्मात्मा पुत्र हैं, जिन्हें प्रजापति ने पूर्वकाल में कुशिकनन्दन विश्वामित्र को प्रदान किया था। प्रजापति दक्ष की दो कन्याएँ—जया और सुप्रभा—उन अस्त्रों की जननी बनीं। जया से उत्पन्न पचास पुत्र असुर सेनाओं के विनाश हेतु प्रकट हुए और सुप्रभा से जन्मे संहार नामक पचास पुत्र अत्यन्त दुर्जय और पराक्रमी बने। इन सभी अस्त्र-शस्त्रों का संपूर्ण ज्ञान विश्वामित्र को है तथा जो अभी तक प्रकट नहीं हुए हैं, उन्हें उत्पन्न करने की शक्ति भी उनमें विद्यमान है।

 

अंत में महर्षि वसिष्ठ ने दृढ़ स्वर में कहा कि ऐसे महातेजस्वी और महायशस्वी विश्वामित्र से भूत और भविष्य की कोई बात छिपी नहीं है। वे स्वयं राक्षसों का संहार करने में समर्थ हैं, किंतु वे महाराज के पुत्र का कल्याण चाहते हैं, इसी कारण वे यहाँ आकर याचना कर रहे हैं। इसलिए महाराज को उनके साथ श्रीराम को भेजने में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं करना चाहिए।

 

महर्षि वसिष्ठ के इन वचनों को सुनकर रघुकुलशिरोमणि महाराज दशरथ का मन शांत हो गया। यद्यपि पुत्र-वियोग का दुःख उनके हृदय में बना रहा, तथापि धर्म-बुद्धि ने उस पीड़ा पर विजय पा ली। विचार करने पर उन्हें यह स्पष्ट प्रतीत हुआ कि विश्वामित्र की प्रसन्नता के लिए श्रीराम का उनके साथ जाना ही श्रेयस्कर और कल्याणकारी है। उस क्षण अयोध्या की राजसभा साक्षी बनी, जब एक पिता ने अपने हृदय के दुख को दबाकर धर्म के पथ का वरण किया और रामकथा ने अपने दिव्य प्रवाह की अगली दिशा ग्रहण की।