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प्रतिशोध, तपस्या और करुणा की कथा
दिति का हृदय उस दिन असहनीय शोक से भर उठा था। उनके पुत्र देवताओं के हाथों मारे जा चुके थे। एक माँ के लिए इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता था? उनका हृदय करुणा और क्रोध के मिश्रण से जल रहा था। इसी पीड़ा को लेकर वे अपने पति, महर्षि कश्यप के पास पहुँचीं। आँखों में आँसू थे, स्वर काँप रहा था। वे बोलीं कि देवताओं ने उनके बलवान पुत्रों को मार डाला है। इस अन्याय ने उनके हृदय को भीतर तक तोड़ दिया है। अब वे एक ऐसा पुत्र चाहती हैं जो इतना शक्तिशाली हो कि इन्द्र का वध कर सके। वे बोलीं कि वे कठोर तपस्या करने के लिए तैयार हैं, बस उन्हें आज्ञा दी जाए और ऐसा पुत्र प्रदान किया जाए जो सब पर विजय पाने वाला और इन्द्र का अंत करने वाला हो।
महर्षि कश्यप अपनी पत्नी की वेदना को समझ रहे थे। वे महान तपस्वी थे, लेकिन साथ ही एक पति भी थे जो अपनी पत्नी के दुःख को देख रहे थे। उन्होंने शांत स्वर में दिति को समझाया कि यदि वे शुद्ध आचरण और पवित्रता का पालन करेंगी, तो उन्हें ऐसा पुत्र प्राप्त होगा जो युद्ध में इन्द्र को मारने की शक्ति रखेगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि पूरे एक हजार वर्षों तक वे पूर्ण पवित्रता और नियमों का पालन करती रहेंगी, तब वे उनसे ऐसा पुत्र प्राप्त करेंगी जो इन्द्र का वध करने में समर्थ होगा। यह सुनकर दिति के मन में आशा की किरण जग उठी।
इतना कहकर महातेजस्वी कश्यप ने स्नेहपूर्वक दिति के शरीर पर हाथ फेरा और उन्हें आशीर्वाद दिया—“तुम्हारा कल्याण हो।” फिर वे अपने तप में लीन होने के लिए वहाँ से चले गये। उनके जाने के बाद दिति का मन आशा और उत्साह से भर गया। उन्होंने ठान लिया कि वे किसी भी कीमत पर अपनी तपस्या पूर्ण करेंगी। वे कुशप्लव नामक पवित्र तपोवन में पहुँचीं और वहाँ अत्यन्त कठोर तपस्या आरम्भ कर दी। उनका हर क्षण संकल्प और साधना में बीतने लगा।
उधर देवराज इन्द्र को यह समाचार मिला कि उनकी मौसी दिति एक ऐसे पुत्र की प्राप्ति के लिए तपस्या कर रही हैं जो उनका वध करेगा। यह सुनकर इन्द्र के मन में भय और चिंता दोनों उत्पन्न हुए। परंतु उन्होंने एक चाल चली। वे अत्यन्त विनम्र बनकर दिति की सेवा करने लगे। वे हर समय उनके पास रहते, उनकी सेवा-टहल करते और स्वयं को अत्यन्त आज्ञाकारी और विनीत दिखाते।
इन्द्र अपनी मौसी के लिए अग्नि, कुश, लकड़ी, जल, फल और मूल जैसी आवश्यक वस्तुएँ लाकर देते। वे उनकी हर छोटी-बड़ी आवश्यकता का ध्यान रखते। जब दिति थक जातीं तो इन्द्र उनके चरण दबाते, उनकी थकान दूर करते और पूरी श्रद्धा से उनकी सेवा करते। देखने वाला यही समझता कि भांजा अपनी मौसी की अत्यन्त प्रेम से सेवा कर रहा है।
इस प्रकार समय बीतता गया। एक-एक वर्ष तपस्या में बीतता रहा। जब एक हजार वर्षों की तपस्या पूरी होने में केवल दस वर्ष शेष रह गए, तब एक दिन दिति अत्यन्त प्रसन्न हो उठीं। उनके मन में यह विश्वास जाग उठा कि अब उनका संकल्प पूर्ण होने वाला है। उन्होंने स्नेहपूर्वक इन्द्र से कहा—“वीरों में श्रेष्ठ! अब मेरी तपस्या के केवल दस वर्ष ही शेष रह गए हैं। दस वर्ष बाद तुम अपने होने वाले भाई को देखोगे।”
दिति ने आगे कहा कि जिस पुत्र को उन्होंने इन्द्र के विनाश के लिए माँगा था, जब वह जन्म लेगा और यदि वह इन्द्र से युद्ध करना चाहेगा, तो वे स्वयं उसे शांत कर देंगी। वे उसे समझाएँगी कि इन्द्र उसका शत्रु नहीं, बल्कि उसका भाई है। वे चाहती थीं कि दोनों भाइयों के बीच प्रेम और स्नेह हो। उन्होंने इन्द्र से कहा कि वह अपने होने वाले भाई के साथ मिलकर त्रिभुवन की विजय का सुख भोगे।
उन्होंने यह भी बताया कि उनके पिता कश्यप ने उन्हें यह वरदान दिया है कि एक हजार वर्षों की तपस्या के बाद उन्हें पुत्र प्राप्त होगा। दिति के शब्दों में आशा, विश्वास और मातृस्नेह झलक रहा था।
इतना कहते-कहते दिति अत्यन्त थक चुकी थीं। दोपहर का समय था, सूर्य आकाश के मध्य में चमक रहा था। तपस्या की थकान से उनका शरीर शिथिल हो गया और वे बैठी-बैठी ही झपकी लेने लगीं। धीरे-धीरे उनकी आँखें बंद हो गईं। उनका सिर झुक गया और उनके लंबे केश नीचे लटकते हुए पैरों से जा लगे। अनजाने में उन्होंने अपने पैरों को सिर के सहारे की तरह टिका लिया।
यह दृश्य देखकर इन्द्र के मन में एक विचार कौंधा। उन्होंने देखा कि दिति की पवित्रता भंग हो गई है, क्योंकि उनके केश पैरों से स्पर्श कर रहे थे और वे अशुद्ध अवस्था में सो गई थीं। यही वह क्षण था जिसकी इन्द्र को प्रतीक्षा थी। वे मन ही मन प्रसन्न हुए और तुरंत अवसर का लाभ उठाने का निश्चय कर लिया।
सावधानी से इन्द्र ने अपनी दिव्य शक्ति का प्रयोग किया और दिति के उदर में प्रवेश कर गए। वहाँ उन्होंने उस गर्भ को देखा जिसमें वह बालक पल रहा था जो आगे चलकर उनका वध करने वाला था। इन्द्र ने अपने वज्र से उस गर्भ के सात टुकड़े कर दिए।
जब वज्र से आघात हुआ तो गर्भ में पल रहा बालक दर्द से करुण स्वर में रोने लगा। उसकी वेदनापूर्ण चीखें इतनी तीव्र थीं कि दिति की नींद टूट गई। वे घबराकर उठ बैठीं। उधर इन्द्र उस रोते हुए गर्भ से कह रहे थे—“भाई, मत रो… मत रो।” परंतु बालक का रोना बंद नहीं हुआ। तब भी इन्द्र ने अपने वज्र से उसके टुकड़े कर दिए।
दिति ने यह भयानक दृश्य देखा तो उनका हृदय काँप उठा। वे चीख उठीं—“इन्द्र! बच्चे को मत मारो, मत मारो।” माँ की यह करुण पुकार सुनकर इन्द्र ठिठक गए। मातृवचन का सम्मान करते हुए वे तुरंत दिति के उदर से बाहर निकल आए।
बाहर आकर इन्द्र ने हाथ जोड़कर दिति से विनम्रता से कहा—“देवि! जब आप सो रही थीं, तब आपके सिर के बाल पैरों से लग गए थे और आप अशुद्ध अवस्था में थीं। यही दोष देखकर मैंने अवसर पा लिया। इस कारण मैंने उस ‘इन्द्रहंता’ बालक के सात टुकड़े कर दिए। माँ! कृपया मेरे इस अपराध को क्षमा करें।”
इन्द्र के शब्दों में भय भी था और पश्चात्ताप भी। दिति का हृदय उस क्षण एक माँ की करुणा और एक स्त्री की पीड़ा से भर उठा। यह घटना केवल प्रतिशोध की कथा नहीं थी, बल्कि यह दिखाती थी कि क्रोध, तपस्या, भय और करुणा—इन सब भावनाओं से भरा हुआ जीवन कितना जटिल और मार्मिक होता है।