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(2)
प्रतिशोध की अग्नि से धर्म के प्रकाश तक
जनमेजय का पश्चाताप, नैमिषारण्य की दिव्य सभा और महाराजा अग्रसेन की कथा का मंगल आरम्भ
जब भाग्य ने ऐसा प्रहार किया, हस्तिनापुर रोता रह गया,
पिता के बिछड़ने का दुःख लेकर, जनमेजय भीतर से ढह गया।
आँखों में आँसू, मन में ज्वाला, प्रतिशोध ने डेरा डाल दिया,
क्रोध की छोटी-सी चिंगारी ने, जीवन का उपवन जला दिया।
नागयज्ञ की प्रचंड अग्नि में, जलने लगे वन, पर्वत, आकाश,
पर बदले की उस धधकन में, खो बैठा वह अपना विश्वास।
तक्षक बचा इन्द्र की शरण में, और क्रोध हुआ और भी प्रबल,
विवेक छिपा घनघोर घटाओं में, जैसे ढक जाए सूरज निर्मल।
गुरुओं पर भी संशय कर बैठा, रानी का भी मान भुला दिया,
क्रोध की आँधी ने पल भर में, जीवन का सारा धन लुटा दिया।
यज्ञ समाप्त हुआ एक दिन, पर मन की अग्नि बुझी नहीं,
महलों में वैभव बहुत मिला, पर अंतर की शांति मिली नहीं।
राख तले जैसे अंगारे, चुपचाप धधकते रहते हैं,
वैसे ही पश्चाताप के क्षण, मन को भीतर से कहते हैं।
तब सत्य की खोज में एक दिवस, वह नैमिष वन की ओर चला,
जहाँ ऋषियों का तप बहता था, जहाँ ज्ञान का निर्मल जल मिला।
वेदों की मधुर स्वर-लहरियाँ, हर पत्ते पर गूँज रही थीं,
मानो स्वयं सरस्वती माता, हर हृदय में पूज रही थीं।
शौनक ने विनयपूर्वक पूछा—
“हे सूत! अब वह कथा सुनाओ,
जिसने अपने हित से बढ़कर, जग के हित का दीप जलाया।
जिसका जीवन त्याग बना था, जिसकी करुणा थी पहचान,
जिसने प्रजा को पुत्र समझा, वही था अग्रसेन महान।”
सूत मुस्काए, शीश झुकाया—
“यह केवल इतिहास नहीं,
मानव जीवन की अमर ज्योति, यह कोई साधारण बात नहीं।
पहले सुनो वह सीख अनोखी, जो जैमिनी ने दी थी कभी,
जिससे जनमेजय के मन में, फिर जागी थी धर्म की छवि।”
प्रेम भरे स्वर में ऋषि बोले—
“राजन! क्या प्रतिशोध सफल हुआ?
क्या पिता तुम्हें फिर मिल पाए?
क्या दुःख का अंधियारा टल गया?”
मौन खड़ा था राजसभा में, उत्तर स्वयं ही बन बैठा,
क्रोध सदा ऐसा विष होता, जो पीने वाला ही ऐंठा।
“नदी की विपरीत धार में तैरना जितना कठिन होता है,
वैसा ही विपदा का हर क्षण धैर्यवान को परखता है।
किन्तु पर्वत-सा जो अडिग रहे, आँधी उसका क्या कर पाए,
धैर्य धरे जो हर संकट में, विजय उसी के चरण चूम जाए।”
“संसार अथाह समुद्र समान, लहरों का जिसका नहीं किनार,
धर्म ही उसकी सच्ची नौका, जो पहुँचा दे भव के पार।
लोभ, अहंकार और प्रतिशोध, भँवर बनाकर डुबोते हैं,
सत्य, दया और क्षमा सदा, जीवन-नैया को ढोते हैं।”
वचन ऋषि के अमृत बनकर, जनमेजय के मन में उतरे,
तपती धरती पर जैसे सावन के पहले बादल बरसे।
पिघला क्रोध, झुका अभिमान, पश्चाताप के अश्रु बहे,
मन के काले बादल छँटते ही, ज्ञान-सूर्य फिर से उगे।
तब जैमिनी मुस्काकर बोले—
“अब तुम सुनने योग्य हुए,
जिसने जग को प्रेम सिखाया, उसके दर्शन योग्य हुए।
जो अपने सुख में नहीं जिया, जनहित जिसका था सम्मान,
ऐसे धर्मप्राण महापुरुष थे, हमारे श्री अग्रसेन महान।”
यहीं से आरम्भ हुई वह गाथा, युग-युग जिसका होगा गान,
जब तक धरती, गगन रहेंगे, अमर रहेगा उनका नाम।
हर महान कथा की शुरुआत किसी विजय से नहीं होती।
कुछ कथाएँ आँसुओं से जन्म लेती हैं…
कुछ पश्चाताप से…
और कुछ तब आरम्भ होती हैं, जब मनुष्य संसार से हारकर सत्य की शरण में आता है।
यह भी ऐसी ही एक कथा है।
यह केवल महाराजा श्री अग्रसेन के गौरवशाली जीवन की कथा नहीं है, बल्कि उस राजा की भी कथा है जिसने क्रोध में अपना विवेक खो दिया था और फिर संतों के वचनों से स्वयं को पुनः प्राप्त किया।
एक पुत्र का टूटता हुआ संसार
हस्तिनापुर के सिंहासन पर उस समय राजा जनमेजय विराजमान थे।
वे महान धनुर्धर अर्जुन के प्रपौत्र और धर्मात्मा राजा परीक्षित के पुत्र थे।
राजा परीक्षित केवल एक राजा नहीं थे, वे अपनी प्रजा के लिए पिता के समान थे।
परन्तु समय का चक्र जब घूमता है, तब सबसे शक्तिशाली मनुष्य भी उसके सामने असहाय हो जाता है।
एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन…
श्राप के प्रभाव से नागराज तक्षक ने राजा परीक्षित को डँस लिया।
कुछ ही क्षणों में हस्तिनापुर का सूर्य अस्त हो गया।
जब यह समाचार जनमेजय तक पहुँचा, तो ऐसा लगा मानो उनके जीवन का आधार ही टूट गया हो।
जिस पुत्र ने बचपन से अपने पिता की उँगली पकड़कर चलना सीखा था, आज वही पुत्र अपने पिता के निर्जीव शरीर के सामने खड़ा था।
आँखों से आँसू बह रहे थे…
हृदय विलाप कर रहा था…
किन्तु धीरे-धीरे उन आँसुओं का स्थान एक भयंकर अग्नि ने ले लिया।
प्रतिशोध की अग्नि।
क्रोध मनुष्य के भीतर उसी प्रकार जन्म लेता है जैसे किसी सूखी घास में एक छोटी-सी चिनगारी। प्रारम्भ में वह तुच्छ प्रतीत होती है, किन्तु यदि समय रहते उसे बुझाया न जाए तो वही चिनगारी देखते-देखते पूरे वन को भस्म कर देती है।
जनमेजय के हृदय में भी वही चिनगारी धधक उठी।
उन्होंने प्रतिज्ञा कर ली—
“जब तक सम्पूर्ण नाग जाति का विनाश नहीं कर दूँगा, तब तक मेरे पिता की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।”
प्रतिशोध का यज्ञ
राजमहल में एक विशाल नागयज्ञ की तैयारी आरम्भ हुई।
देश-विदेश के विद्वान ब्राह्मण बुलाए गए।
विशाल यज्ञकुण्ड बनाया गया।
वैदिक मंत्रों का उच्चारण प्रारम्भ हुआ।
मंत्रों की शक्ति इतनी प्रबल थी कि जहाँ कहीं भी नाग थे, वे अदृश्य शक्ति से खिंचकर अग्नि में गिरने लगे।
आकाश भय से भर उठा।
धरती काँपने लगी।
वन सूने होने लगे।
मानो सम्पूर्ण सृष्टि करुण स्वर में पुकार रही हो—
“राजन्! प्रतिशोध की कोई सीमा भी होती है…”
किन्तु क्रोध बहरे कानों को जन्म देता है।
जो मनुष्य क्रोध के अधीन हो जाता है, उसे सत्य की आवाज़ भी सुनाई नहीं देती।
जब क्रोध विवेक पर पर्दा डाल देता है
नागराज तक्षक भयभीत होकर देवराज इन्द्र की शरण में पहुँच गया।
इन्द्र ने उसे अपने समीप स्थान दे दिया।
उधर यज्ञ के मंत्र और प्रबल होते गए।
अब अग्नि केवल तक्षक को नहीं, इन्द्र के सिंहासन को भी अपनी ओर खींचने लगी।
जनमेजय ने यह दृश्य देखा।
उनका क्रोध और भड़क उठा।
उन्होंने सोचा—
“इन्द्र मेरे शत्रु का साथ दे रहे हैं।”
यहीं से उनके विवेक का सूर्य अस्त होने लगा।
क्रोध उस काले बादल के समान होता है जो सूर्य को नहीं बुझाता, बल्कि हमारी आँखों से उसका प्रकाश छिपा देता है।
जनमेजय ने इन्द्र पर दोष लगाया।
यज्ञ कराने वाले ऋषियों पर भी संदेह किया।
यहाँ तक कि अपनी धर्मपरायणा, पतिव्रता रानी वपुष्टमा पर भी बिना किसी प्रमाण के शंका कर बैठे।
जिस पत्नी ने हर सुख-दुःख में उनका साथ दिया था, उसी का उन्होंने अपमान कर दिया।
जिन ऋषियों ने उनके लिए यज्ञ किया, उन्हीं का उन्होंने तिरस्कार कर दिया।
क्रोध ने उनसे एक-एक करके उनके अपने ही लोग छीन लिए।
प्रतिशोध समाप्त हुआ… पर पीड़ा नहीं
समय बीता।
यज्ञ समाप्त हो गया।
क्रोध धीरे-धीरे शांत हो गया।
लेकिन…
हृदय की पीड़ा शांत नहीं हुई।
रात को सोते तो पिता का चेहरा दिखाई देता।
सुबह उठते तो अपने ही कठोर शब्द कानों में गूँजने लगते।
महल में संगीत बजता था…
पर उनके भीतर केवल सन्नाटा था।
सैकड़ों सेवक सामने खड़े रहते…
फिर भी उन्हें ऐसा लगता जैसे वे संसार के सबसे अकेले मनुष्य हों।
पश्चाताप उस राख के समान होता है जिसके नीचे अंगारे लंबे समय तक सुलगते रहते हैं। बाहर से सब कुछ शांत दिखाई देता है, पर भीतर मन निरंतर जलता रहता है।
अब जनमेजय समझने लगे थे—
प्रतिशोध ने उन्हें विजय नहीं दी…
केवल अकेलापन दिया।
सत्य की खोज
एक दिन उन्होंने दर्पण में स्वयं को देखा।
चेहरे पर राजा का तेज़ था…
लेकिन आँखों में शांति नहीं थी।
उन्होंने मन ही मन कहा—
“यदि राजसिंहासन होते हुए भी मन अशांत है, तो मेरा यह वैभव किस काम का?”
उसी समय उन्हें ज्ञात हुआ कि पवित्र नैमिषारण्य में अनेक महर्षि, तपस्वी और विद्वान एक विशाल धर्मसभा में एकत्र हुए हैं।
वहाँ केवल शास्त्र नहीं पढ़ाए जाते।
वहाँ टूटे हुए हृदयों को जोड़ा जाता है।
वहाँ केवल प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते।
वहाँ जीवन जीने की दिशा मिलती है।
जनमेजय ने निश्चय किया—
“अब मैं शस्त्र नहीं, शास्त्र की शरण में जाऊँगा।”
नैमिषारण्य — जहाँ ज्ञान बहता था
नैमिषारण्य…
मानो धरती पर स्वर्ग का एक शांत कोना।
ऊँचे-ऊँचे वृक्ष मंद पवन के साथ झूम रहे थे।
पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को संगीत से भर रहा था।
यज्ञ की सुगंध पूरे वन में फैल रही थी।
ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं प्रकृति भी वहाँ ध्यानमग्न बैठी हो।
देश के कोने-कोने से ऋषि, मुनि, तपस्वी और विद्वान वहाँ एकत्र हुए थे।
उस विशाल सभा के मध्य विराजमान थे—महर्षि शौनक।
उनके मुख पर तेज था…
नेत्रों में करुणा…
और हृदय में सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की भावना।
वे जानते थे—
महापुरुषों की कथाएँ केवल इतिहास नहीं होतीं।
वे दीपक होती हैं, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्ग प्रकाशित करती हैं।
जैसे अंधेरी रात में एक छोटा-सा दीपक यात्रियों को सही दिशा दिखा देता है, वैसे ही महापुरुषों का जीवन संकटों में भटके मनुष्य को राह दिखाता है।
सूतपुत्र का आगमन
उसी समय सभा में प्रवेश हुआ महान कथावाचक उग्रश्रवा सूत का।
वे लोमहर्षण सूत के पुत्र थे।
वर्षों तक उन्होंने महर्षि व्यास, महर्षि जैमिनी और अनेक विद्वानों से वेद, पुराण और इतिहास का अध्ययन किया था।
उनके मुख से निकला प्रत्येक शब्द अनुभव से जन्म लेता था।
संपूर्ण सभा उनके सम्मान में खड़ी हो गई।
महर्षि शौनक ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया।
शौनक ऋषि की जिज्ञासा
उन्होंने अत्यंत विनम्र स्वर में कहा—
“हे सूतनन्दन!
आपने हमें चंद्रवंश के राजाओं का इतिहास सुनाया।
आपने सूर्यवंश के महान सम्राटों की गौरवगाथाएँ सुनाईं।
आपकी वाणी से हमने अनेक महापुरुषों के आदर्श जाने।
किन्तु आज हमारे हृदय में एक नई जिज्ञासा जन्मी है।
हम उस पुरुष की कथा सुनना चाहते हैं जिसने अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीवन जिया।
जिसके लिए प्रजा केवल प्रजा नहीं, अपना परिवार थी।
जिसने शक्ति से नहीं, प्रेम से लोगों के हृदय जीते।
कृपया हमें महाराजा श्री अग्रसेन की दिव्य कथा सुनाइए।”
सभा में पूर्ण मौन छा गया।
सभी ऋषियों की दृष्टि अब सूतपुत्र की ओर थी।
सूतपुत्र का उत्तर
सूतजी ने हाथ जोड़कर कहा—
“ऋषिवर!
आपने जिस कथा की इच्छा की है, वह साधारण कथा नहीं है।
वह लोककल्याण का अमृत है।
यह कथा मुझे वैसे ही प्राप्त हुई है जैसे महर्षि व्यास के परम शिष्य महर्षि जैमिनी ने राजा जनमेजय को सुनाई थी।
मैं उसी परंपरा का पालन करते हुए आज आपके समक्ष उसका वर्णन करूँगा।”
कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा—
“किन्तु उससे पहले यह समझना आवश्यक है कि जिस हृदय में क्रोध भरा हो, उसमें ज्ञान का अमृत नहीं ठहर सकता।
पहले उस घटना को सुनिए, जब महर्षि जैमिनी ने स्वयं राजा जनमेजय के हृदय से क्रोध का अंधकार दूर किया था।”
जैमिनी ऋषि का करुणामय उपदेश
महर्षि जैमिनी ने जनमेजय की ओर प्रेम से देखा।
उनकी वाणी कठोर नहीं थी।
वह पिता की तरह समझाने वाली थी।
उन्होंने कहा—
“राजन्…
आपने नागों से प्रतिशोध ले लिया।
पर बताइए…
क्या आपके पिता लौट आए?
क्या आपके हृदय की पीड़ा समाप्त हो गई?
क्या आपकी आत्मा को शांति मिली?”
जनमेजय मौन रहे।
मौन ही उनका उत्तर था।
जैमिनी बोले—
“क्रोध से जीती हुई लड़ाई भी अंततः हार में बदल जाती है।
क्रोध उस विष के समान है जिसे मनुष्य अपने शत्रु के मरने की आशा में स्वयं पी लेता है।”
उन्होंने आगे कहा—
“आपने इन्द्र पर संदेह किया।
अपने गुरुजनों का अपमान किया।
निर्दोष रानी का तिरस्कार किया।
क्या इनमें से किसी कार्य ने आपके यश को बढ़ाया?
नहीं राजन्…
यश वृक्ष की तरह वर्षों में बढ़ता है, किन्तु क्रोध की आँधी उसे एक ही क्षण में जड़ से उखाड़ देती है।”
सभा में गहरा मौन छा गया।
धैर्य ही सच्ची वीरता है
जैमिनी ने आगे कहा—
“जीवन में भाग्य कभी-कभी प्रबल हो जाता है।
परिस्थितियाँ हमारे विरुद्ध खड़ी हो जाती हैं।
उनसे लड़ना वैसा ही कठिन है जैसे प्रचण्ड नदी की धारा के विपरीत तैरना।
किन्तु जो धैर्य नहीं छोड़ता, वही अंततः दूसरे किनारे तक पहुँचता है।
पर्वत पर कितनी ही आँधियाँ आएँ, वह अपनी जगह से नहीं हटता।
वैसे ही धैर्यवान मनुष्य विपत्ति में भी अडिग रहता है।”
धर्म ही जीवन की नाव है
फिर जैमिनी ने कहा—
“राजन्!
यह संसार अथाह समुद्र के समान है।
इसमें कभी सुख की लहरें उठती हैं, कभी दुःख के तूफ़ान।
जो मनुष्य अहंकार, क्रोध और लोभ के सहारे इस समुद्र को पार करना चाहता है, वह बीच भँवर में डूब जाता है।
किन्तु जो धर्म, सत्य, करुणा और सज्जनों के बताए मार्ग को अपनी नाव बना लेता है, वह सबसे प्रचण्ड तूफ़ानों के बीच भी सुरक्षित पार पहुँच जाता है।”
फिर उन्होंने जनमेजय के कंधे पर हाथ रखा और कहा—
“इसलिए शोक मत करो।
क्रोध का त्याग ही सबसे बड़ा धर्म है।
क्षमा सबसे बड़ी विजय है।
और धर्म से बढ़कर मनुष्य का कोई रक्षक नहीं।”
उन वचनों ने जनमेजय के हृदय को उसी प्रकार शीतल कर दिया जैसे तपती हुई धरती पर बरसने वाली पहली वर्षा।
वर्षों से भीतर धधकती प्रतिशोध की अग्नि धीरे-धीरे शांत होने लगी।
उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
किन्तु इस बार वे दुःख के नहीं…
पश्चाताप और आत्मबोध के आँसू थे।
जिन आँखों में अब तक प्रतिशोध की ज्वाला थी, उनमें पहली बार विनम्रता का प्रकाश दिखाई देने लगा।
महर्षि जैमिनी ने संतोषपूर्वक मुस्कुराते हुए कहा—
“अब तुम्हारा हृदय तैयार है।
अब तुम उस महापुरुष की कथा सुन सकते हो, जिसने अपने जीवन से सिद्ध किया कि सच्चा वैभव धन में नहीं, बल्कि परोपकार में होता है।
आओ राजन्…
अब मैं तुम्हें लोकनायक, धर्मनिष्ठ, दयालु और प्रजावत्सल महाराजा श्री अग्रसेन की अमर गाथा सुनाता हूँ।”
और यहीं से आरम्भ होती है उस महापुरुष की दिव्य यात्रा, जिनका जीवन आज भी मानवता के लिए प्रकाशस्तंभ बनकर संसार का मार्ग आलोकित कर रहा है।
लघु उत्तरीय प्रश्न (उत्तर सीमा – 30 शब्द)
1. राजा जनमेजय कौन थे?
उत्तर: राजा जनमेजय, अर्जुन के प्रपौत्र और राजा परीक्षित के पुत्र थे। वे हस्तिनापुर के धर्मप्रिय राजा थे, किन्तु पिता की मृत्यु के बाद अत्यंत दुःखी हो गए।
2. राजा जनमेजय के दुःख का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: नागराज तक्षक द्वारा उनके पिता राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई थी। इसी कारण वे शोक और प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगे।
3. नागयज्ञ कराने का उद्देश्य क्या था?
उत्तर: जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने और सम्पूर्ण नाग जाति का विनाश करने के उद्देश्य से नागयज्ञ कराया।
4. प्रतिशोध के कारण जनमेजय ने कौन-कौन सी भूलें कीं?
उत्तर: उन्होंने इन्द्र पर संदेह किया, ऋषियों का अपमान किया, अपनी निर्दोष पत्नी वपुष्टमा का त्याग किया और क्रोध में विवेक खो दिया।
5. प्रतिशोध लेने के बाद भी जनमेजय को शांति क्यों नहीं मिली?
उत्तर: प्रतिशोध से पिता वापस नहीं आए। उनके मन में पश्चाताप, शोक और अशांति बनी रही, इसलिए उन्हें सच्ची शांति नहीं मिली।
6. जनमेजय नैमिषारण्य क्यों गए?
उत्तर: अपने अशांत मन को शांति देने तथा संतों और ऋषियों से धर्म एवं जीवन का सच्चा मार्ग जानने के लिए वे नैमिषारण्य गए।
7. नैमिषारण्य का क्या महत्व था?
उत्तर: नैमिषारण्य महान ऋषियों, मुनियों और विद्वानों का पवित्र तपोस्थल था, जहाँ धर्म, ज्ञान और लोककल्याण की कथाएँ सुनाई जाती थीं।
8. महर्षि शौनक ने सूतपुत्र से क्या निवेदन किया?
उत्तर: उन्होंने महाराजा श्री अग्रसेन के लोककल्याणकारी जीवन, आदर्शों और महान कार्यों की विस्तृत एवं प्रेरणादायक कथा सुनाने का अनुरोध किया।
9. सूतपुत्र ने अग्रसेन की कथा से पहले जनमेजय का प्रसंग क्यों सुनाया?
उत्तर: उन्होंने समझाया कि क्रोध से भरे मन में ज्ञान नहीं ठहरता। पहले जनमेजय का मन शांत करना आवश्यक था।
10. महर्षि जैमिनी ने जनमेजय को क्या शिक्षा दी?
उत्तर: उन्होंने बताया कि क्रोध कभी शांति नहीं देता। क्षमा, धैर्य और धर्म का पालन ही सच्चा सुख और जीवन की सफलता का मार्ग है।
11. महर्षि जैमिनी ने धैर्य का क्या महत्व बताया?
उत्तर: उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखना ही सच्ची वीरता है। धैर्यवान व्यक्ति अंततः हर कठिनाई पर विजय प्राप्त करता है।
12. धर्म की तुलना नाव से क्यों की गई है?
उत्तर: जैसे नाव समुद्र पार कराती है, वैसे ही धर्म मनुष्य को संसार के दुःखों और मोह से सुरक्षित पार लगाता है।
13. जनमेजय के जीवन में परिवर्तन कैसे आया?
उत्तर: महर्षि जैमिनी के उपदेश सुनकर उनका क्रोध शांत हुआ, पश्चाताप जागा और उन्होंने धर्म तथा ज्ञान का मार्ग अपनाने का संकल्प लिया।
14. महाराजा अग्रसेन की कथा सुनने की इच्छा क्यों हुई?
उत्तर: क्योंकि वे ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने परोपकार, समानता और लोककल्याण को अपने जीवन का सर्वोच्च आदर्श बनाया।
15. इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: क्रोध विनाश का कारण है, जबकि धैर्य, क्षमा, धर्म और महापुरुषों के आदर्शों का अनुसरण जीवन में शांति, सम्मान और सफलता प्रदान करता है।
MCQs
1. राजा जनमेजय किसके पुत्र थे?
A) अर्जुन
B) अभिमन्यु
C) परीक्षित
D) युधिष्ठिर
उत्तर: C) परीक्षित
2. राजा जनमेजय किसके प्रपौत्र थे?
A) भीम
B) अर्जुन
C) नकुल
D) सहदेव
उत्तर: B) अर्जुन
3. राजा परीक्षित की मृत्यु किसके डँसने से हुई थी?
A) वासुकी
B) कर्कोटक
C) तक्षक
D) शेषनाग
उत्तर: C) तक्षक
4. पिता की मृत्यु के बाद जनमेजय के हृदय में कौन-सी भावना सबसे अधिक उत्पन्न हुई?
A) प्रसन्नता
B) प्रतिशोध
C) संतोष
D) करुणा
उत्तर: B) प्रतिशोध
5. जनमेजय ने किस उद्देश्य से नागयज्ञ कराया?
A) वर्षा की कामना के लिए
B) राज्य विस्तार के लिए
C) सम्पूर्ण नाग जाति का विनाश करने के लिए
D) पुत्र प्राप्ति के लिए
उत्तर: C) सम्पूर्ण नाग जाति का विनाश करने के लिए
6. तक्षक किसकी शरण में गया था?
A) भगवान शिव
B) भगवान विष्णु
C) देवराज इन्द्र
D) ब्रह्माजी
उत्तर: C) देवराज इन्द्र
7. क्रोध के कारण जनमेजय ने किस पर संदेह किया?
A) केवल इन्द्र पर
B) केवल ऋषियों पर
C) केवल रानी वपुष्टमा पर
D) उपर्युक्त सभी पर
उत्तर: D) उपर्युक्त सभी पर
8. जनमेजय ने अपनी किस रानी का तिरस्कार किया?
A) द्रौपदी
B) वपुष्टमा
C) देवयानी
D) सत्यवती
उत्तर: B) वपुष्टमा
9. नागयज्ञ समाप्त होने के बाद भी जनमेजय को क्या प्राप्त नहीं हुआ?
A) धन
B) राज्य
C) शांति
D) सेना
उत्तर: C) शांति
10. अंततः जनमेजय ने किसकी शरण में जाने का निश्चय किया?
A) युद्धभूमि
B) संतों और ऋषियों
C) वनवास
D) विदेश
उत्तर: B) संतों और ऋषियों
11. महान धर्मसभा कहाँ आयोजित थी?
A) कुरुक्षेत्र
B) प्रयाग
C) नैमिषारण्य
D) काशी
उत्तर: C) नैमिषारण्य
12. नैमिषारण्य की सभा के कुलपति कौन थे?
A) व्यासजी
B) जैमिनी
C) शौनक ऋषि
D) वशिष्ठ
उत्तर: C) शौनक ऋषि
13. सभा में किस महान कथावाचक का आगमन हुआ?
A) नारद
B) उग्रश्रवा सूत
C) पराशर
D) विश्वामित्र
उत्तर: B) उग्रश्रवा सूत
14. उग्रश्रवा सूत किसके पुत्र थे?
A) व्यासजी
B) लोमहर्षण सूत
C) जैमिनी
D) शुकदेव
उत्तर: B) लोमहर्षण सूत
15. शौनक ऋषि ने किस महापुरुष की कथा सुनने की इच्छा व्यक्त की?
A) श्रीराम
B) श्रीकृष्ण
C) महाराजा अग्रसेन
D) भीष्म पितामह
उत्तर: C) महाराजा अग्रसेन
16. सूतजी ने बताया कि यह कथा उन्हें किससे प्राप्त हुई थी?
A) नारद मुनि
B) वशिष्ठ
C) महर्षि जैमिनी
D) शुकदेव
उत्तर: C) महर्षि जैमिनी
17. महर्षि जैमिनी ने जनमेजय को सबसे पहले किस दोष का त्याग करने का उपदेश दिया?
A) लोभ
B) क्रोध
C) मोह
D) आलस्य
उत्तर: B) क्रोध
18. जैमिनी के अनुसार मनुष्य के जीवन की सच्ची नाव क्या है?
A) धन
B) बल
C) धर्म और सज्जनों का आचरण
D) राज्य
उत्तर: C) धर्म और सज्जनों का आचरण
19. जैमिनी के उपदेश का जनमेजय पर क्या प्रभाव पड़ा?
A) उनका क्रोध बढ़ गया।
B) वे युद्ध के लिए तैयार हो गए।
C) उनके हृदय में पश्चाताप और आत्मबोध जाग उठा।
D) उन्होंने राज्य त्याग दिया।
उत्तर: C) उनके हृदय में पश्चाताप और आत्मबोध जाग उठा।
20. इस अध्याय के अंत में किसकी कथा प्रारम्भ होने वाली है?
A) राजा हरिश्चंद्र
B) भगवान श्रीराम
C) महाराजा श्री अग्रसेन
D) सम्राट अशोक
उत्तर: C) महाराजा श्री अग्रसेन