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बालक ध्रुव की तपस्या और ध्रुवपद की प्राप्ति

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अटल संकल्प का अमर दीप — बालक ध्रुव की तपस्या और ध्रुवपद की प्राप्ति

राजा उत्तानपाद का विशाल राजमहल वैभव और ऐश्वर्य से परिपूर्ण था, किंतु उसके भीतर एक ऐसा अन्याय पल रहा था, जिसने एक दिन इतिहास को बदल दिया। राजा की दो रानियाँ थीं—सुनीति और सुरुचि। सुनीति धर्मपरायण, विनम्र और सद्गुणों की मूर्ति थीं, जबकि सुरुचि राजा की अत्यन्त प्रिय रानी थीं। राजा का अधिकांश समय सुरुचि के महल में ही बीतता था। सुनीति के पुत्र ध्रुव और सुरुचि के पुत्र उत्तम दोनों ही राजकुमार थे, परंतु राजमहल का व्यवहार दोनों के प्रति समान नहीं था।

एक दिन राजसभा का वातावरण अत्यन्त स्नेहपूर्ण था। राजा उत्तानपाद अपने प्रिय पुत्र उत्तम को गोद में बिठाकर दुलार कर रहे थे। उसी समय पाँच वर्ष का बालक ध्रुव खेलता-कूदता वहाँ आ पहुँचा। उसने देखा कि उसके पिता अपने छोटे भाई को प्रेमपूर्वक गोद में बैठाए हुए हैं। उसके बाल-हृदय में भी वही स्नेह पाने की स्वाभाविक इच्छा जाग उठी।

वह धीरे-धीरे सिंहासन के पास पहुँचा और पिता की गोद में बैठने का प्रयास करने लगा। किंतु राजा ने उसकी ओर ध्यान तक नहीं दिया। पिता के प्रेम की आकांक्षा लिए ध्रुव बार-बार उनकी ओर देखता रहा। उसके नन्हे हाथ मानो कह रहे थे—“पिताजी! मुझे भी अपनी गोद में स्थान दीजिए।”

परंतु तभी सुरुचि का अभिमान बोल उठा।

उसने कटु स्वर में कहा—“ध्रुव! यह स्थान तुम्हारे लिए नहीं है। यदि राजा की गोद और यह सिंहासन चाहिए, तो पहले मेरे गर्भ से जन्म लेना होगा। तुम सुनीति के पुत्र हो, इसलिए इस अधिकार के योग्य नहीं हो। जाओ, भगवान् की तपस्या करो और उनसे वर माँगो कि अगले जन्म में मेरा पुत्र बनो, तभी तुम्हें यह सम्मान मिल सकेगा।”

ये शब्द केवल वचन नहीं थे, एक मासूम बालक के हृदय पर चलाए गए विषैले बाण थे।

ध्रुव स्तब्ध रह गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। सबसे अधिक पीड़ा उसे इस बात की हुई कि उसके पिता सब कुछ देखते रहे, किंतु मौन बैठे रहे। उस क्षण ध्रुव को लगा जैसे संसार में उसका कोई अपना नहीं है।

रोता हुआ बालक अपनी माता सुनीति के पास पहुँचा। उसकी रुलाई देखकर माँ का हृदय तड़प उठा। उन्होंने उसे गोद में भर लिया और कारण पूछा। साथ के बालकों ने पूरी घटना कह सुनाई।

माँ सुनीति का हृदय भीतर से टूट चुका था, किंतु उन्होंने अपने दुःख को छिपाकर पुत्र को धर्म का अमृत पिलाया। उन्होंने कहा—

“बेटा! किसी के प्रति द्वेष मत रखना। जो दुःख मिले, उसे सहन करना सीखो। सुरुचि ने कठोर वचन कहे हैं, परंतु उनमें एक सत्य भी छिपा है। संसार में ऊँचा पद, सम्मान और वैभव पुण्य के प्रभाव से प्राप्त होते हैं। यदि तुझे ऐसा पद चाहिए, तो भगवान् श्रीहरि की शरण में जा। उन्हीं की कृपा से सब कुछ प्राप्त होता है।”

माता के इन वचनों ने ध्रुव के जीवन की दिशा बदल दी।

अब उसके मन में केवल एक ही लक्ष्य था—भगवान् को प्राप्त करना।

पाँच वर्ष का वह बालक अपनी माँ को प्रणाम कर अकेला वन की ओर चल पड़ा। उसके कदम छोटे थे, किंतु संकल्प हिमालय से भी ऊँचा था।

मार्ग में देवर्षि नारद मिले। उन्होंने ध्रुव की परीक्षा लेने के लिए समझाया—

“वत्स! तुम अभी बहुत छोटे हो। घर लौट जाओ। भगवान् की प्राप्ति कोई सरल कार्य नहीं है। बड़े-बड़े योगी वर्षों तपस्या करते हैं, तब भी सफलता नहीं मिलती।”

परंतु ध्रुव का उत्तर उसकी दृढ़ता का परिचय था—

“भगवन्! मेरे हृदय में जो घाव लगा है, वह साधारण नहीं है। मैं ऐसा सर्वोच्च पद प्राप्त करना चाहता हूँ, जिस पर मेरे पूर्वज भी न पहुँच सके हों। कृपया मुझे भगवान् तक पहुँचने का मार्ग बताइए।”

नारदजी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने ध्रुव को द्वादशाक्षर महामंत्र—

‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’

का उपदेश दिया और मधुवन में तपस्या करने की आज्ञा दी।

मधुवन पहुँचकर ध्रुव ने अद्भुत तप आरम्भ किया।

पहले महीने में वे तीन दिन बाद केवल बेर और कैथा ग्रहण करते। दूसरे महीने में छह दिन बाद सूखे पत्ते खाते। तीसरे महीने में नौ दिन बाद केवल जल पीते। चौथे महीने में बारह दिन बाद केवल वायु पर जीवित रहे। और पाँचवें महीने में तो उन्होंने श्वास तक रोक दिया।

उनकी तपस्या इतनी प्रचंड थी कि तीनों लोकों में उसका प्रभाव अनुभव होने लगा। देवता भयभीत हो उठे। भगवान् की माया ने अनेक प्रकार के भय, भ्रम और विघ्न उत्पन्न किए, परंतु ध्रुव की अचल निष्ठा को कोई डिगा न सका।

आखिरकार वह क्षण आ गया, जिसका समस्त सृष्टि को इंतजार था।

भगवान् श्रीहरि स्वयं गरुड़ पर आरूढ़ होकर मधुवन पहुँचे।

जब ध्रुव ने अपने आराध्य का दिव्य दर्शन किया, तो उनका हृदय प्रेम से भर उठा। वर्षों की तपस्या का फल सामने खड़ा था। वे भूमि पर दण्डवत् गिर पड़े। उनके नेत्रों से आनंदाश्रु बहने लगे।

वे भगवान् की स्तुति करना चाहते थे, किंतु भावनाओं के वेग से उनकी वाणी रुक गई।

तब करुणासागर भगवान् ने अपने वेदमय शंख को ध्रुव के कपोल से स्पर्श किया।

उस दिव्य स्पर्श के साथ ही उनके भीतर ज्ञान का प्रकाश फूट पड़ा। वाणी में अद्भुत शक्ति आ गई और वे भगवान् की स्तुति करने लगे।

भगवान् अपने इस अनन्य भक्त से अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे वह ध्रुवपद प्रदान किया जो अचल, शाश्वत और अद्वितीय है।

इसी कारण भगवान् का यह अवतार ‘ध्रुववरदेन’ कहलाता है—अर्थात् ध्रुव को वरदान देने वाले भगवान्।

यह कथा केवल एक बालक की तपस्या की कहानी नहीं है। यह हमें सिखाती है कि अपमान को प्रतिशोध में नहीं, पुरुषार्थ में बदलना चाहिए; दुःख को रोकर नहीं, संकल्प बनाकर जीतना चाहिए। जिस बालक को पिता की गोद में स्थान नहीं मिला, उसे भगवान् ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा स्थान दिया, जो आज भी ध्रुवतारे के रूप में अटल और अमर है।