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🔥 ब्रह्मर्षि बनने की पराकाष्ठा – विश्वामित्र की अदम्य तपस्या

 

वन की नीरवता में एक अद्भुत परिवर्तन हुआ था। महर्षि विश्वामित्र ने अपनी पूर्व प्रतिज्ञा को स्मरण किया और दृढ़ निश्चय के साथ उत्तर दिशा का त्याग कर पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान किया। उनके भीतर एक ही संकल्प था—ऐसी तपस्या करनी है कि आत्मबल की पराकाष्ठा को प्राप्त किया जा सके। पूर्व दिशा के एक निर्जन स्थान पर पहुँचकर उन्होंने कठोर तप का आरम्भ किया। चारों ओर घना वन, निस्तब्ध वातावरण और बीच में एक अचल पर्वत की भाँति खड़े विश्वामित्र—मानो संकल्प स्वयं देह धारण कर तप में लीन हो गया हो।

 

उन्होंने मौन-व्रत धारण किया। ऐसा मौन कि न शब्द, न संकेत—केवल तप। समय बीतता गया। ऋतुएँ बदलीं, वर्षा आई, तपती गर्मी आई, शीत ने धरती को जकड़ लिया—परंतु विश्वामित्र अचल रहे। एक सहस्र वर्ष तक वे लकड़ी के समान निश्चेष्ट खड़े रहे। कभी प्रचंड वायु चली, कभी हिंसक पशु उनके चारों ओर घूमे, कभी दैवी विघ्न उत्पन्न हुए—पर उनके मन में क्रोध का एक स्पर्श भी प्रवेश न कर सका। उनका तप केवल शरीर का नहीं था; वह मन और अहंकार को जीतने का तप था।

 

जब हजार वर्ष पूर्ण हुए, तब उन्होंने अपने व्रत की समाप्ति के लिए अन्न ग्रहण करने का विचार किया। इतने लंबे काल के बाद वे भोजन करने को उद्यत हुए। उसी क्षण देवराज इन्द्र ने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे ब्राह्मण का वेश धारण कर वहाँ पहुँचे और विनम्र स्वर में भोजन माँग लिया। सामने रखा अन्न विश्वामित्र के लिए था—हजार वर्षों की तपस्या के बाद मिलने वाला प्रथम आहार—परन्तु दया और त्याग उनके स्वभाव में बस चुके थे। उन्होंने बिना एक क्षण सोचे पूरा भोजन उस ब्राह्मण को अर्पित कर दिया। अपने लिए कुछ भी शेष नहीं रखा।

 

भोजन दे देने के बाद भी उन्होंने मौन नहीं तोड़ा। वे भूखे ही रह गये, परंतु उनके मुख पर संतोष था। उन्होंने फिर से उसी कठोर तपस्या का आरम्भ किया—इस बार और भी कठिन। उन्होंने श्वास तक का त्याग कर दिया। उनका शरीर अचल हो गया, प्राण मानो भीतर स्थिर हो गये। समय पुनः बहता गया—एक और सहस्र वर्ष बीत गया। श्वास के न चलने से उनके मस्तक से धुएँ की लपटें उठने लगीं। उनका तप अग्नि बन गया था।

 

तीनों लोकों में हलचल मच गई। देवता, ऋषि, गन्धर्व, नाग, राक्षस—सभी विचलित हो उठे। आकाश धुएँ से भर गया। समुद्र उफान मारने लगे, पर्वत काँपने लगे, पृथ्वी डगमगाने लगी। तेज आँधियाँ चलने लगीं। सूर्य की प्रभा मंद पड़ गई। ऐसा लगने लगा मानो प्रलय का समय आ गया हो। सभी प्राणी भयभीत होकर ब्रह्माजी के पास पहुँचे और विनती करने लगे—“विश्वामित्र की तपस्या असाधारण है। हमने उन्हें लोभ और क्रोध में डालने की अनेक चेष्टाएँ कीं, पर वे अडिग रहे। उनमें कोई दोष नहीं दिखता। यदि उन्हें उनकी मनोकामना न मिली तो वे अपने तप से तीनों लोकों को जला देंगे।”

 

देवताओं की यह व्याकुल पुकार सुनकर ब्रह्माजी सहित सभी देवता विश्वामित्र के पास पहुँचे। उनके सामने खड़े होकर मधुर वाणी में बोले—“हे महात्मन्! तुम्हारा स्वागत है। तुम्हारी तपस्या से हम अत्यन्त प्रसन्न हैं। तुमने अपने तप से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया है। अब तुम ब्रह्मर्षि हो। दीर्घायु हो, तुम्हारा कल्याण हो।”

 

विश्वामित्र ने यह सुना तो उनके हृदय में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई, परंतु उनके भीतर अभी भी पूर्ण संतोष नहीं था। उन्होंने विनम्रता से कहा—“यदि मुझे वास्तव में ब्राह्मणत्व प्राप्त हुआ है, तो चारों वेद स्वयं मुझे स्वीकार करें। और सबसे बढ़कर ब्रह्मर्षि वसिष्ठ स्वयं आकर मुझे ब्राह्मण कहें। तभी मैं समझूँगा कि मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ।”

 

देवताओं ने वसिष्ठ मुनि को प्रसन्न किया। तब ब्रह्मर्षि वसिष्ठ स्वयं वहाँ आये। उनके मुख पर सौम्यता थी, आँखों में स्नेह। उन्होंने विश्वामित्र को देखकर कहा—“मुने! तुम ब्रह्मर्षि हो गये। इसमें कोई संदेह नहीं।” यह सुनते ही वर्षों का संघर्ष, तप, पीड़ा और संकल्प—सब एक क्षण में पूर्ण हो गया। दोनों महान ऋषियों के बीच पुरानी कटुता समाप्त हो गई। वसिष्ठ ने उन्हें मित्रता का आलिंगन दिया।

 

विश्वामित्र ने विनम्र होकर वसिष्ठ का पूजन किया। उनके हृदय में गर्व नहीं, केवल कृतज्ञता थी। अब वे ब्रह्मर्षि बन चुके थे—तप की पराकाष्ठा का साकार रूप। वे पृथ्वी पर विचरण करने लगे, परंतु उनके भीतर का तेज पहले से कहीं अधिक उज्ज्वल था। वे तप के मूर्तिमान स्वरूप बन गये थे—धर्म के जीवित प्रतीक।

 

यह कथा सुनाते-सुनाते शतानन्द मौन हो गये। सभा में गहरा प्रभाव छा गया। राजा जनक भाव-विभोर होकर विश्वामित्र की ओर देखने लगे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—“आज आपका मेरे यज्ञ में आना मेरे लिए परम सौभाग्य है। आपके दर्शन से मैं पवित्र हो गया। आपकी तपस्या अपरिमेय है, आपका बल अनन्त है। आपके गुणों का वर्णन सुनकर मेरा हृदय तृप्त नहीं होता।”

 

सूर्य अस्त होने लगा था। जनक ने विनम्रता से कहा—“अब यज्ञ का समय है। कल पुनः आपके दर्शन करूँगा।” विश्वामित्र मुस्कुराये और उन्हें अनुमति दी। जनक ने श्रद्धा से उनकी परिक्रमा की और अपने बन्धु-बान्धवों के साथ लौट गये।

 

तत्पश्चात् विश्वामित्र भी श्रीराम और लक्ष्मण के साथ अपने विश्राम स्थान की ओर लौट आये। उनके मुख पर शांति थी—क्योंकि अब वे केवल तपस्वी नहीं, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र थे—जिनकी तपस्या ने तीनों लोकों को झुका दिया था और जिनके संकल्प ने असम्भव को सम्भव कर दिखाया था।