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वेदों की रक्षा हेतु भगवान् का दिव्य हयग्रीव अवतार — ज्ञान की पुनर्स्थापना और अधर्म का विनाश
सृष्टि के आरम्भिक काल में ब्रह्माण्ड की रचना का महान कार्य चल रहा था। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी अपने दिव्य दायित्व में पूर्णतः तल्लीन थे। उनके सामने असंख्य लोकों, प्राणियों और व्यवस्थाओं की रचना का कार्य था। इस विराट कार्य का आधार वेद थे, क्योंकि वेद ही समस्त ज्ञान, धर्म, विज्ञान और सृष्टि-विधान के मूल स्रोत हैं।
किन्तु उसी समय एक अत्यन्त भयावह घटना घट गई। मधु और कैटभ नाम के दो बलशाली दैत्यों ने अवसर पाकर वेदों का अपहरण कर लिया। वे उन दिव्य वेदों को लेकर तुरंत रसातल में जा पहुँचे। यह केवल ग्रन्थों की चोरी नहीं थी, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के ज्ञान-सूर्य को ढक देने जैसा था।
जब ब्रह्माजी ने देखा कि वेद उनसे छिन गए हैं, तो वे अत्यन्त दुःखी हो उठे। उनके हृदय में गहन शोक छा गया। वे विचार करने लगे—
“वेद ही मेरे नेत्र हैं। वेद ही मेरा परम बल हैं। वेद ही मेरे गुरु हैं और वेद ही मेरे आराध्य हैं। इनके बिना मैं सृष्टि की रचना कैसे करूँगा? संसार को धर्म और ज्ञान का मार्ग कौन दिखाएगा?”
वेद-वियोग में व्याकुल होकर ब्रह्माजी की बुद्धि कुछ समय के लिए मोह से आच्छादित हो गई। तब उन्हें स्मरण हुआ कि समस्त संकटों के एकमात्र आश्रय भगवान् श्रीहरि ही हैं। वे विनम्रतापूर्वक भगवान् की शरण में पहुँचे और करबद्ध होकर उनकी स्तुति करने लगे।
भक्तवत्सल भगवान् श्रीहरि अपने भक्त की पीड़ा को कैसे सह सकते थे? ब्रह्माजी की करुण प्रार्थना सुनते ही उन्होंने वेदों की रक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना का संकल्प लिया।
भगवान् ने एक अद्भुत और दिव्य रूप धारण किया—हयग्रीव अवतार। इस स्वरूप में उनका मुख अश्व (घोड़े) के समान था। यह रूप केवल बल का ही नहीं, बल्कि ज्ञान और दिव्य चेतना का भी प्रतीक था।
हयग्रीव रूप धारण करके भगवान् रसातल में पहुँचे। वहाँ उन्होंने सीधे युद्ध करने के स्थान पर अपनी अद्भुत योगमाया का प्रयोग किया। परम योग का आश्रय लेकर वे अत्यन्त मधुर, उदात्त और दिव्य स्वरों में सामवेद का गान करने लगे।
वह स्वर इतना मोहक, इतना विलक्षण और इतना आकर्षक था कि सम्पूर्ण रसातल उसकी ध्वनि से गूँज उठा। मधु और कैटभ ने जब वह अद्भुत वेदध्वनि सुनी, तो वे चकित रह गए। वे सोचने लगे कि यह स्वर कहाँ से आ रहा है।
उस ध्वनि के आकर्षण में पड़कर उन्होंने वेदों को वहीं छोड़ दिया और ध्वनि के स्रोत को खोजने के लिए दौड़ पड़े। इसी अवसर का लाभ उठाकर भगवान् हयग्रीव ने रसातल में पड़े हुए समस्त वेदों को अपने अधिकार में ले लिया।
कार्य पूर्ण होते ही भगवान् वेदों को लेकर ब्रह्माजी के पास पहुँचे और उन्हें पुनः सौंप दिया। वेदों को वापस पाकर ब्रह्माजी का हृदय प्रसन्नता से भर गया। उनका शोक समाप्त हो गया और सृष्टि का कार्य पुनः सुचारु रूप से चल पड़ा। इसके पश्चात् भगवान् अपने मूल दिव्य स्वरूप में स्थित हो गए।
उधर मधु और कैटभ जब उस स्थान पर पहुँचे जहाँ से वेदध्वनि सुनाई दे रही थी, तो वहाँ उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दिया। वे आश्चर्यचकित रह गए। तत्पश्चात् वे तुरंत उस स्थान पर लौटे जहाँ वे वेदों को छोड़कर गए थे। किन्तु वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि वेद तो लुप्त हो चुके हैं।
अब वे दोनों क्रोध से भर उठे। वे अत्यन्त तीव्र गति से रसातल से ऊपर आए और खोजते-खोजते उस स्थान पर पहुँचे जहाँ भगवान् श्रीहरि शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में स्थित थे।
भगवान् को देखकर वे उपहास करने लगे। वे ठहाका मारकर हँसे और अहंकारवश भगवान् को ललकारते हुए उन्हें जगाया। शीघ्र ही दोनों दैत्यों और भगवान् के बीच भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया।
मधु और कैटभ रजोगुण और तमोगुण से पूर्णतः आविष्ट थे। उनके भीतर अहंकार, शक्ति का मद और अधर्म की भावना भरी हुई थी। दूसरी ओर भगवान् धर्म, सत्य और ज्ञान के रक्षक थे।
अन्ततः भगवान् मधुसूदन ने ब्रह्माजी की प्रतिष्ठा और वेदों की रक्षा के लिए उन दोनों दैत्यों का संहार कर दिया। इस प्रकार भगवान् ने हयग्रीव अवतार धारण कर ब्रह्माजी का शोक दूर किया और ज्ञान की पुनर्स्थापना की।
एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार हयग्रीव नाम का एक दैत्य दिति का पुत्र था। उसने कठोर तपस्या करके जगदम्बा देवी को प्रसन्न किया। देवी उसके सामने प्रकट हुईं और वरदान माँगने को कहा।
दैत्य ने अमरता का वर माँगा। तब देवी ने कहा—
“जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है।”
देवी के इस उत्तर पर दैत्य ने अत्यन्त चतुराई से कहा—
“तो मुझे केवल हयग्रीव के हाथों ही मृत्यु प्राप्त हो।”
देवी ने उसे यह वरदान दे दिया।
हयग्रीव दैत्य मन-ही-मन प्रसन्न हुआ। उसने सोचा—
“हयग्रीव तो मैं स्वयं हूँ। मैं अपने आपको कभी नहीं मारूँगा। इसलिए अब संसार में कोई मेरा वध नहीं कर सकता।”
अपने इसी भ्रम और अहंकार में वह उन्मत्त हो गया। उसने पृथ्वी पर अत्याचारों की वर्षा कर दी। ऋषि-मुनि, देवता और सामान्य प्रजा सभी उसके आतंक से पीड़ित हो उठे। धर्म दुर्बल होने लगा और अधर्म का प्रभाव बढ़ने लगा।
जब पृथ्वी का दुःख असहनीय हो गया, तब करुणासागर भगवान् ने पुनः हस्तक्षेप किया। उन्होंने स्वयं हयग्रीव स्वरूप धारण किया ताकि देवी के वरदान की मर्यादा भी बनी रहे और दैत्य का अंत भी हो सके।
इसके बाद भगवान् और हयग्रीव दैत्य के मध्य भीषण युद्ध हुआ। अन्ततः भगवान् ने उसका वध कर दिया और संसार को उसके अत्याचारों से मुक्त किया।
यह कथा केवल एक दैत्य-वध की कहानी नहीं है। यह हमें बताती है कि ज्ञान ही सृष्टि का वास्तविक प्रकाश है। जब ज्ञान पर अज्ञान और अधर्म का आक्रमण होता है, तब भगवान् स्वयं उसकी रक्षा के लिए अवतरित होते हैं। हयग्रीव अवतार इस सत्य का दिव्य प्रतीक है कि अंततः सत्य, ज्ञान और धर्म की ही विजय होती है।