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भरत का अद्वितीय त्याग — सिंहासन ठुकराकर श्रीराम को लौटाने का धर्मसंकल्प
चौदहवें दिन की प्रभात बेला थी। महाराज दशरथ के निधन का शोक अभी भी अयोध्या के कण-कण में व्याप्त था। महल के विशाल प्रांगण में मंत्री, सेनापति, पुरोहित, नगर के श्रेष्ठजन, व्यापारी और समस्त राजकर्मचारी एकत्र हुए। सभी के मन में एक ही चिंता थी—अब राज्य का संचालन कौन करेगा? भारी मन और गंभीर मुखमुद्रा के साथ वे राजकुमार भरत के समक्ष उपस्थित हुए।
उन्होंने अत्यंत विनम्रता और आदरपूर्वक कहा, “राजकुमार! हमारे पूजनीय महाराज दशरथ अब इस संसार में नहीं रहे। वे अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम और वीर लक्ष्मण को वन भेजकर स्वयं स्वर्गलोक को प्रस्थान कर चुके हैं। आज अयोध्या का सिंहासन रिक्त है, राज्य अनाथ-सा हो गया है। ऐसी स्थिति में अब आप ही हमारे राजा बनें। महाराज ने स्वयं श्रीराम को वनवास की आज्ञा दी थी और आपको राज्य सौंपा था। इसलिए यदि आप राज्य स्वीकार करते हैं तो इसमें आपका कोई दोष नहीं होगा। यह राजधर्म के अनुसार ही होगा।”
सभा में उपस्थित सभी लोग भरत की ओर आशा भरी दृष्टि से देखने लगे। उन्हें विश्वास था कि अब भरत ही राज्य की बागडोर संभालेंगे।
फिर उन्होंने आगे कहा, “रघुकुल के राजकुमार! आपके मंत्री, समस्त स्वजन, अयोध्या के नागरिक और नगर के श्रेष्ठ व्यापारी अभिषेक की संपूर्ण सामग्री लेकर आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। सब कुछ तैयार है। बस आपके आदेश की देर है।”
उन्होंने पुनः आग्रह किया, “भरतजी! यह वही राज्य है, जिसे आपके पूर्वजों ने धर्मपूर्वक संभाला था। अब आप भी इस राजसिंहासन को स्वीकार कीजिए, अपना राजतिलक कराइए और हमारी रक्षा कीजिए। समस्त प्रजा आपके नेतृत्व की प्रतीक्षा कर रही है।”
इन वचनों को सुनकर भरत कुछ क्षण मौन रहे। उनके नेत्रों में करुणा, विनम्रता और धर्मनिष्ठा झलक रही थी। वे धीरे-धीरे उठे। अभिषेक के लिए सजे हुए स्वर्णकलश, चंदन, पुष्प, पवित्र जल और अन्य समस्त राजतिलक सामग्री के समीप पहुँचे। उन्होंने उन सभी पवित्र वस्तुओं की श्रद्धापूर्वक प्रदक्षिणा की, मानो यह सम्मान अपने लिए नहीं, श्रीराम के लिए अर्पित कर रहे हों। फिर वे सभा के मध्य खड़े होकर शांत किन्तु दृढ़ स्वर में बोले।
“हे सज्जनो! आप सभी बुद्धिमान हैं। आपसे ऐसी बात की मुझे कभी आशा नहीं थी। हमारे रघुवंश में सदा से यही परंपरा रही है कि ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है। यही धर्म है, यही न्याय है और यही मर्यादा है।”
भरत की वाणी में अटूट श्रद्धा थी। उन्होंने आगे कहा, “हम सबके ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम ही अयोध्या के वास्तविक राजा हैं। उनके रहते मैं कभी भी सिंहासन स्वीकार नहीं कर सकता। यदि वनवास की अवधि पूर्ण करनी ही है, तो उनके स्थान पर मैं चौदह वर्ष वन में रहूँगा और श्रीराम अयोध्या का राज्य संभालेंगे।”
यह सुनते ही सभा में उपस्थित अनेक लोगों की आँखें भर आईं। ऐसा त्याग, ऐसा धर्मपालन और ऐसा भाईचारा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।
भरत ने आगे आदेश दिया, “आप सब तत्काल एक विशाल और सुसज्जित चतुरंगिणी सेना तैयार कीजिए। रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक सब साथ चलेंगे। मैं स्वयं वन जाकर अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम को आदरपूर्वक वापस अयोध्या लेकर आऊँगा।”
फिर उन्होंने उस अभिषेक सामग्री की ओर संकेत करते हुए कहा, “यह समस्त राजतिलक सामग्री भी हमारे साथ चलेगी। मैं वन में ही श्रीराम का अभिषेक करूँगा। जैसे यज्ञ की पवित्र अग्नि को अत्यंत सम्मान के साथ आगे ले जाया जाता है, उसी प्रकार मैं श्रीराम को आगे रखकर पूरे सम्मान और गौरव के साथ अयोध्या वापस लाऊँगा।”
इसके बाद भरत का मुख कठोर हो उठा। उन्होंने गहरी पीड़ा के साथ कहा, “जिस स्त्री में मातृत्व का थोड़ा-सा भी भाव शेष होता, वह कभी ऐसा अनर्थ न करती। कैकेयी चाहे मेरी माता कहलाती हो, पर मैं उसके इस अन्यायपूर्ण मनोरथ को कभी सफल नहीं होने दूँगा। अयोध्या के राजा केवल श्रीराम होंगे, और मैं स्वयं प्रसन्नतापूर्वक वन में निवास करूँगा।”
भरत के इन वचनों में क्रोध नहीं था, केवल धर्म के प्रति अटल निष्ठा और सत्य के प्रति अडिग संकल्प था।
फिर उन्होंने राज्य के अधिकारियों को आदेश दिया, “कारीगर तुरंत आगे बढ़ें। जहाँ मार्ग ऊबड़-खाबड़ है, उसे समतल करें। पुल बनाएँ, झाड़ियाँ हटाएँ और दुर्गम स्थानों को सुगम बनाएँ। ऐसे रक्षक भी साथ चलें जिन्हें वन के प्रत्येक मार्ग और प्रत्येक कठिन स्थान का पूरा ज्ञान हो, ताकि श्रीराम को सम्मानपूर्वक वापस लाने में किसी प्रकार की बाधा न आए।”
भरत के इन दिव्य और धर्ममय वचनों को सुनकर सभा में उपस्थित सभी लोग भावविभोर हो उठे। उनके सामने ऐसा राजकुमार खड़ा था जिसे राज्य, वैभव और सत्ता का कोई मोह नहीं था; जिसकी सबसे बड़ी इच्छा केवल अपने बड़े भाई को उनका अधिकार लौटाना थी।
सबने एक स्वर में भरत को आशीर्वाद देते हुए कहा, “भरतजी! जिस प्रकार कमलों से भरे सरोवर में स्वयं लक्ष्मी निवास करती हैं, उसी प्रकार धर्म, यश और समृद्धि सदा आपके साथ रहें। क्योंकि आप स्वयं राज्य त्यागकर अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम को उनका अधिकार लौटाना चाहते हैं। ऐसा त्यागी, धर्मात्मा और निष्काम पुरुष संसार में अत्यंत दुर्लभ होता है।”
इन मंगलमय आशीर्वचनों को सुनकर भरत का हृदय भावनाओं से भर उठा। उनकी आँखों से आनंद और विनम्रता के आँसू छलक पड़े। उन्होंने प्रेम और कृतज्ञता से सभा की ओर देखा। उन आँसुओं में सिंहासन पाने का सुख नहीं, बल्कि श्रीराम को वापस लाने की आशा का उज्ज्वल प्रकाश झलक रहा था।
जब सभा ने भरत के मुख से यह अटल संकल्प सुना कि वे स्वयं वन जाकर श्रीराम को वापस लाएँगे, तब जैसे पूरे अयोध्या का वातावरण बदल गया। जो महल अभी तक शोक से बोझिल था, वहाँ आशा की नई किरण फूट पड़ी। मंत्री, अधिकारी, सैनिक और समस्त राजकर्मचारी हर्ष से खिल उठे। उनके हृदयों का सारा दुःख मानो दूर हो गया।
उन्होंने प्रसन्न होकर भरत से कहा, “नरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा का पालन तुरंत प्रारंभ कर दिया गया है। राजपरिवार के प्रति भक्तिभाव रखने वाले कारीगर और मार्गदर्शक वन के मार्ग को समतल और सुरक्षित बनाने के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। अब पूरा अयोध्या एक ही उद्देश्य से प्रेरित है—अपने प्रिय प्रभु श्रीराम को सम्मानपूर्वक वापस लाना।”
इस प्रकार चौदहवें दिन अयोध्या ने एक ऐसे राजकुमार का दर्शन किया जिसने सिंहासन को ठुकराकर धर्म को अपनाया, राज्य को अस्वीकार कर भाई के अधिकार की रक्षा की, और संसार को यह सिखा दिया कि सच्चा राजा वही है जो स्वयं के लिए नहीं, धर्म और सत्य के लिए जीता है।