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भरत का विलाप और श्रीराम की वन-रात्रि

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भरत का विलाप और श्रीराम की वन-रात्रि

गुह के मुख से यह सुनते ही कि श्रीराम ने वन में पहुँचकर राजसी वस्त्र त्याग दिए हैं, जटाएँ धारण कर ली हैं और तपस्वी का जीवन स्वीकार कर लिया है, भरत का हृदय मानो टूट गया। उन्हें लगा कि जिस आशा के सहारे वे अयोध्या से यहाँ तक आए थे, वह अब शायद कभी पूरी न हो सके। यदि श्रीराम ने जटाएँ धारण कर ली हैं, तो इसका अर्थ है कि वे वनवास को पूरे मन से स्वीकार कर चुके हैं। अब उन्हें वापस लाना कितना कठिन होगा! यह विचार उनके मन को भीतर तक झकझोरने लगा। वे बाहर से शांत दिखाई दे रहे थे, पर भीतर उनका हृदय वेदना से भर चुका था।

भरत देखने में अत्यन्त तेजस्वी और बलशाली थे। उनके सिंह के समान विशाल कंधे, लम्बी भुजाएँ और कमल के समान सुन्दर नेत्र उनके राजकुमार होने की गरिमा प्रकट करते थे। वे अभी युवा थे, परन्तु उनका हृदय अत्यन्त कोमल था। गुह की बात सुनकर उन्होंने अपने मन को संभालने का भरसक प्रयास किया। कुछ समय तक उन्होंने धैर्य रखा, किन्तु दुःख का भार इतना बढ़ गया कि उनका शरीर उसे सह न सका। वे ऐसे व्याकुल हुए जैसे किसी बलवान हाथी को अचानक तीक्ष्ण अंकुश से घायल कर दिया गया हो। देखते ही देखते उनका शरीर शिथिल पड़ गया और वे मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।

भरत को इस अवस्था में देखकर निषादराज गुह घबरा उठा। उसका मुख पीला पड़ गया। उसे लगा मानो उसके पैरों तले धरती ही हिल गई हो। वह उसी प्रकार व्याकुल हो उठा जैसे भूकम्प के समय कोई विशाल वृक्ष अपनी जड़ों सहित काँप उठता है। उसे अपनी कही हुई बात पर भी दुःख होने लगा कि कहीं उसके शब्दों ने भरत को असहनीय पीड़ा तो नहीं दे दी।

भरत के समीप बैठे शत्रुघ्न ने जब अपने प्रिय बड़े भाई को मूर्छित होकर गिरते देखा, तो उनका धैर्य भी टूट गया। वे तुरंत भरत को अपनी बाँहों में उठा कर हृदय से लगा लेते हैं। उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगती है। वे बार-बार भरत को पुकारते हैं, पर कोई उत्तर नहीं मिलता। शोक ने उनके मन और बुद्धि दोनों को मानो सुन्न कर दिया।

कुछ ही क्षणों में यह समाचार तीनों माताओं तक पहुँच गया। वे पहले ही महाराज दशरथ के वियोग में दुःखी थीं। लगातार उपवास और शोक के कारण उनके शरीर दुर्बल हो चुके थे। जैसे ही उन्होंने भरत की यह दशा देखी, उनका दुःख और भी बढ़ गया। वे दौड़ती हुई वहाँ पहुँचीं।

तीनों माताएँ भूमि पर पड़े भरत को चारों ओर से घेरकर बैठ गईं। किसी की आँखों में आँसू रुक नहीं रहे थे। वातावरण करुण विलाप से भर गया। कौसल्या का हृदय तो मानो फटने लगा। जिन भरत को वे सदैव अपने पुत्र के समान प्रेम करती थीं, उन्हें इस दशा में देखकर उनका मातृहृदय करुणा से भर उठा। वे तुरंत भरत के पास पहुँचीं और उन्हें अपनी गोद में उठा लिया।

कौसल्या ने भरत को उसी प्रकार अपनी छाती से लगा लिया जैसे कोई गाय अपने बिछड़े हुए बछड़े को पाकर प्रेम से उसे चाटती और दुलारती है। उनकी आँखों से अश्रु निरन्तर बह रहे थे। वे भरत के सिर पर हाथ फेरती जातीं और रोती जातीं। उनके भीतर केवल एक ही भाव था—अपने पुत्र को किसी भी प्रकार संभाल लेना।

कौसल्या ने अत्यन्त व्याकुल स्वर में पूछा, “बेटा! तुम्हें कोई रोग तो नहीं हो गया? कहीं तुम्हारे शरीर को कोई कष्ट तो नहीं है?” वे जानती थीं कि इस समय रघुकुल का सहारा केवल भरत ही हैं। इसलिए उनकी चिंता केवल भरत के लिए नहीं, पूरे राजवंश के भविष्य के लिए भी थी।

फिर उन्होंने भरत को स्नेह से देखते हुए कहा, “वत्स! अब मैं केवल तुम्हें देखकर ही जीवित हूँ। श्रीराम और लक्ष्मण वन चले गए हैं। तुम्हारे पिता महाराज दशरथ भी हमें छोड़कर स्वर्ग सिधार चुके हैं। अब इस परिवार और हम सबकी रक्षा का भार केवल तुम्हारे कंधों पर है।”

कौसल्या के मन में एक और भय उठने लगा। उन्होंने काँपते हुए स्वर में पूछा, “बेटा! सच-सच बताओ, क्या तुम्हें वन में गए श्रीराम, लक्ष्मण या सीता के विषय में कोई और भी दुःखद समाचार मिला है? कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई नई विपत्ति आ गई हो?” यह कहते समय उनका हृदय भय और आशंका से काँप रहा था।

कुछ समय बाद भरत की मूर्छा टूटी। उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। सामने अपनी माँ कौसल्या को रोते देखकर उनके अपने आँसू भी रुक न सके। उन्होंने स्वयं दुःख में डूबे होने पर भी सबसे पहले माँ को सांत्वना दी। उन्होंने विनम्र स्वर में कहा, “माँ! आप चिंता मत कीजिए। मैंने श्रीराम के विषय में कोई नई अप्रिय बात नहीं सुनी है।” इसके बाद उन्होंने अपने मन की सबसे बड़ी जिज्ञासा लेकर गुह की ओर देखा।

भरत ने अत्यन्त भावुक होकर पूछा, “गुह! उस रात मेरे प्रिय भाई श्रीराम कहाँ ठहरे थे? माता सीता कहाँ विश्राम कर रही थीं? लक्ष्मण कहाँ थे? उन्होंने भोजन में क्या ग्रहण किया? किस प्रकार के बिछौने पर सोए? मुझे सब कुछ विस्तार से बताओ। मैं अपने प्रभु की वन-जीवन की प्रत्येक बात जानना चाहता हूँ।”

भरत के इन प्रश्नों में केवल जिज्ञासा नहीं थी, अपितु असीम प्रेम और भक्ति थी। यह देखकर निषादराज गुह का हृदय प्रसन्न हो उठा। उसे विश्वास हो गया कि भरत के मन में श्रीराम के प्रति केवल निष्कलंक प्रेम ही है। तब उसने अत्यन्त श्रद्धा से वह सब बताना आरम्भ किया जो उसने उस रात्रि स्वयं देखा था।

गुह ने कहा, “जब श्रीराम मेरे यहाँ आए, तब मैंने उनके लिए अनेक प्रकार के उत्तम भोजन, स्वादिष्ट पकवान और तरह-तरह के ताजे फल बड़ी श्रद्धा से भिजवाए। मेरी इच्छा थी कि वन में आने वाले मेरे अतिथि किसी प्रकार का कष्ट न पाएँ।”

गुह आगे बोला, “श्रीराम ने मेरे प्रेम का सम्मान करते हुए उन सभी वस्तुओं को स्वीकार तो किया, किन्तु उन्हें स्वयं ग्रहण नहीं किया। उन्होंने कहा कि अब वे वनवासी और तपस्वी के समान जीवन बिताएँगे। क्षत्रिय धर्म का स्मरण करते हुए उन्होंने अत्यन्त आदरपूर्वक मेरा सारा भोजन लौटा दिया।”

फिर श्रीराम ने मुस्कुराकर बड़े प्रेम से समझाया, “मित्र! क्षत्रिय का धर्म केवल लेना नहीं, बल्कि देना है। हमें सदैव दूसरों का पालन करना चाहिए, उनसे कुछ लेना नहीं चाहिए।”

गुह ने भरत को बताया, “उस पूरी रात श्रीराम और माता सीता ने उपवास ही रखा। उन्होंने कोई भोजन नहीं किया। केवल लक्ष्मण जो थोड़ा-सा जल लेकर आए थे, उसी जल को श्रीराम ने ग्रहण किया।”

गुह ने आगे कहा, “श्रीराम के जल पी लेने के बाद जो थोड़ा जल बच गया, उसी को लक्ष्मण ने प्रसाद समझकर ग्रहण किया। उससे पहले तीनों ने अत्यन्त श्रद्धा और एकाग्रता के साथ संध्या-वंदन किया। उनके मुख पर अद्भुत शांति और दिव्य तेज दिखाई दे रहा था।”

इसके बाद लक्ष्मण स्वयं वन में गए और अपने हाथों से कोमल कुश घास लाकर श्रीराम के लिए शीघ्र ही एक साधारण-सा बिछौना तैयार किया। उसमें न कोई गद्दा था, न रेशमी वस्त्र—केवल कुश की घास थी, किन्तु उसमें छोटे भाई का अथाह प्रेम समाया हुआ था।

जब वह बिछौना तैयार हो गया, तब श्रीराम माता सीता के साथ उस पर विराजमान हुए। लक्ष्मण ने अत्यन्त श्रद्धा से दोनों के चरण धोए, उन्हें विश्राम के लिए प्रणाम किया और फिर कुछ दूरी पर जाकर खड़े हो गए ताकि उनकी नींद में कोई बाधा न आए।

गुह ने भरत को वह स्थान दिखाते हुए कहा, “यही वह इङ्गुदी का वृक्ष है, और यही वह तृणों का बिछौना है, जहाँ उस रात श्रीराम और माता सीता ने विश्राम किया था।” यह सुनकर भरत की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। वे उस पवित्र स्थान को निहारते ही रह गए।

गुह ने आगे बताया, “लक्ष्मण ने उस रात तनिक भी विश्राम नहीं किया। अपनी पीठ पर दो भरे हुए तरकस बाँधे, हाथों में धनुष और बाण लेकर वे पूरी रात श्रीराम और सीता की रक्षा करते रहे। वे बार-बार चारों ओर घूमते, हर आहट पर सतर्क हो जाते। उनके मन में केवल एक ही संकल्प था—जब तक मैं जीवित हूँ, मेरे भाई और भाभी पर कोई संकट नहीं आने दूँगा।”

अन्त में गुह ने कहा, “मैं भी अपने धनुष-बाण लेकर लक्ष्मण के साथ खड़ा हो गया। मेरे सभी साथी भी जागते रहे। हम सबने पूरी रात निद्रा और आलस्य का त्याग किया। हम सब मिलकर देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी श्रीराम की रक्षा करते रहे। उस रात वन में केवल पहरा ही नहीं दिया जा रहा था, बल्कि प्रेम, भक्ति और समर्पण की एक अमर कथा लिखी जा रही थी।”