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भरत का हृदयविदारक विलाप और पिता दशरथ के अंतिम संस्कार
महाराज दशरथ के स्वर्गारोहण के बाद अयोध्या का प्रत्येक क्षण शोक में डूबा हुआ था। समय के अनुसार जब दस दिनों का शोककाल पूरा हुआ, तब ग्यारहवें दिन राजकुमार भरत ने अपने पिता के प्रति पुत्रधर्म का पालन करते हुए आत्मशुद्धि के लिए पवित्र स्नान किया और विधिपूर्वक एकादशाह श्राद्ध सम्पन्न किया। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि पुत्र के हृदय में पिता के प्रति असीम श्रद्धा, प्रेम और कर्तव्य का प्रतीक था। प्रत्येक मंत्र के साथ भरत की आँखों से आँसू बह रहे थे। वे बार-बार यही सोच रहे थे कि जिन पिता के स्नेह की छाया में उन्होंने जीवन बिताया, आज उन्हीं के लिए श्राद्ध करना पड़ रहा है।
बारहवें दिन भरत ने मासिक श्राद्ध और सपिण्डीकरण जैसे अन्य सभी वैदिक संस्कार अत्यंत श्रद्धा और नियमपूर्वक सम्पन्न किए। उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि पिता की आत्मा की शांति के लिए कोई भी धार्मिक कर्तव्य अधूरा न रह जाए। उनका मन शोक से भरा था, फिर भी उन्होंने धर्म से कभी मुँह नहीं मोड़ा।
श्राद्ध के उपरान्त भरत ने ब्राह्मणों को उदारतापूर्वक धन, बहुमूल्य रत्न, उत्तम अन्न, कीमती वस्त्र, चाँदी, असंख्य गौएँ और अनेक बकरे दान किए। वे जानते थे कि दान केवल परम्परा नहीं, बल्कि दिवंगत आत्मा के कल्याण का एक महत्वपूर्ण साधन है। उन्होंने किसी प्रकार की कृपणता नहीं दिखाई। ऐसा प्रतीत होता था मानो वे अपने पिता के प्रति अंतिम सेवा में अपना सब कुछ अर्पित कर देना चाहते हों।
इतना ही नहीं, भरत ने अपने पिता के पारलौकिक कल्याण के लिए अनेक दास-दासियाँ, सवारियाँ और बड़े-बड़े भवन भी ब्राह्मणों को दान कर दिए। उनका हृदय इतना उदार था कि उन्हें राज्य की संपत्ति से अधिक अपने पिता की आत्मा की शांति की चिंता थी।
तेरहवें दिन प्रातःकाल जब अंतिम संस्कार की शेष क्रियाओं के लिए भरत श्मशान पहुँचे, तो वहाँ का दृश्य देखते ही उनका हृदय जैसे टूट गया। पिता की स्मृति ने उन्हें इस प्रकार घेर लिया कि वे स्वयं को संभाल न सके। उनका शरीर काँप उठा, आँखों के आगे अंधेरा छा गया और वे शोक से मूर्छित होकर विलाप करने लगे।
कुछ समय बाद जब उन्होंने स्वयं को संभाला, तो वे अपने पिता की चिता के स्थान पर अस्थियाँ एकत्र करने पहुँचे। वहाँ खड़े होकर उनका गला आँसुओं से भर गया। उन्होंने काँपती हुई आवाज़ में कहा—“तात! आपने मुझे सदैव मेरे ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम के संरक्षण में सौंपा था। अब श्रीराम वन चले गए और आप भी मुझे छोड़कर चले गए। आज मैं सचमुच बिल्कुल अकेला हो गया हूँ। मेरा सहारा ही छिन गया है।”
भरत का दुःख यहीं नहीं रुका। उन्होंने करुण स्वर में कहा—“हे पिता! आपने माता कौशल्या के एकमात्र सहारे श्रीराम को वन भेज दिया और अब स्वयं भी उन्हें छोड़कर चले गए। अब उस असहाय माता का सहारा कौन बनेगा? उनके दुःख को कौन समझेगा?”
जब भरत की दृष्टि उस चिता पर पड़ी जहाँ कभी उनके पिता का दिव्य शरीर अग्नि को समर्पित किया गया था, तो उनका हृदय फटने लगा। चारों ओर राख बिखरी हुई थी। कहीं अग्नि की तपन से भूमि लाल दिखाई दे रही थी, तो कहीं महाराज दशरथ की जली हुई अस्थियाँ बिखरी पड़ी थीं। कुछ ही दिन पहले जहाँ अयोध्या के महान सम्राट जीवित थे, आज वहाँ केवल राख और अस्थियाँ शेष थीं। यह दृश्य किसी भी पुत्र के लिए असहनीय था।
उस भयावह दृश्य को देखकर भरत का धैर्य पूरी तरह टूट गया। वे जोर-जोर से रोते हुए भूमि पर गिर पड़े। उनका गिरना ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे इन्द्र का ऊँचा ध्वज अचानक टूटकर धरती पर गिर गया हो। उनकी सारी शक्ति, साहस और आत्मविश्वास मानो उसी क्षण समाप्त हो गया।
जब मंत्रियों ने भरत की यह दशा देखी, तो वे तुरंत उनके पास दौड़कर आए। वे सब भी अत्यन्त दुःखी थे। उन्होंने भरत को उठाने और सांत्वना देने का प्रयास किया, जैसे स्वर्ग से पतित राजा ययाति के पास महान ऋषि पहुँचकर उन्हें संभालने आए थे।
भरत को इस प्रकार शोक में डूबा देखकर शत्रुघ्न भी अपने आँसू नहीं रोक सके। पिता की स्मृतियाँ उनके हृदय में उमड़ पड़ीं। वे बार-बार महाराज दशरथ का स्मरण करते हुए अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े।
शत्रुघ्न के मन में बचपन की अनगिनत स्मृतियाँ जीवित हो उठीं—पिता का स्नेह, उनका दुलार, उनकी शिक्षा, उनका संरक्षण। प्रत्येक स्मृति उनके हृदय को और अधिक विदीर्ण कर रही थी। वे सुध-बुध खो बैठे और मानो उन्मत्त व्यक्ति की भाँति विलाप करने लगे।
उन्होंने अत्यन्त दुःख से कहा—“यह सम्पूर्ण विपत्ति मंथरा के कारण उत्पन्न हुई। कैकेयी की जिद उस भयानक ग्राह (मगरमच्छ) के समान बन गई जिसने हम सबको इस अथाह शोक-सागर में डुबो दिया है। ऐसा दुःख जिसे मिटाना असम्भव प्रतीत होता है।”
फिर वे रोते हुए बोले—“हे तात! आपने जिस भरत को सदा अपने हृदय से लगाया, जिसे बालक समझकर स्नेह दिया, उसी भरत को रोता-बिलखता छोड़कर आप कहाँ चले गए?”
उन्हें याद आया कि महाराज दशरथ अपने पुत्रों के लिए स्वयं भोजन, पेय, वस्त्र और आभूषणों की व्यवस्था करते थे। वे स्नेहपूर्वक कहते थे कि अपनी-अपनी रुचि की वस्तु ले लो। शत्रुघ्न का हृदय भर आया—“अब हमारे लिए ऐसा प्रेम कौन करेगा?”
उन्होंने दुःख में कहा—“ऐसे धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा के बिना तो इस पृथ्वी को फट जाना चाहिए। यदि इतनी बड़ी घटना के बाद भी पृथ्वी नहीं फटी, तो यह सचमुच आश्चर्य की बात है।”
फिर भरत का दुःख अपने चरम पर पहुँच गया। उन्होंने निराश होकर कहा—“पिता स्वर्ग सिधार गए, श्रीराम वन चले गए। अब मेरे जीवन का क्या अर्थ रह गया है? ऐसे जीवन से तो अग्नि में प्रवेश करना ही अच्छा है।”
उन्होंने आगे कहा—“बड़े भाई श्रीराम और पिता महाराज दशरथ के बिना मैं इस सूनी अयोध्या में प्रवेश नहीं करूँगा। मैं भी वन में जाकर तपस्वी जीवन व्यतीत करूँगा।”
भरत और शत्रुघ्न के इन करुण वचनों को सुनकर वहाँ उपस्थित सभी सेवक, सैनिक और अनुचर भी फूट-फूटकर रोने लगे। पूरा वातावरण शोक और करुणा से भर गया।
दोनों भाई इतने अधिक दुःख और थकावट से टूट चुके थे कि वे भूमि पर वैसे ही पड़े थे जैसे युद्ध में घायल होकर सींग टूटे हुए दो बैल असहाय होकर धरती पर गिर जाते हैं।
इसी समय महर्षि वसिष्ठ वहाँ पहुँचे। वे केवल राजपुरोहित ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण रघुवंश के आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे। उन्होंने प्रेमपूर्वक भरत को उठाया और अत्यन्त धैर्य से समझाते हुए कहा—“वत्स! आज तुम्हारे पिता के दाह संस्कार का तेरहवाँ दिन है। अभी अस्थिसंचय की शेष क्रिया पूरी करनी है। ऐसे समय धर्म का पालन करना ही तुम्हारा सबसे बड़ा कर्तव्य है।”
वसिष्ठजी ने आगे जीवन का गहन सत्य समझाया—“भूख-प्यास, सुख-दुःख, शोक-मोह तथा बुढ़ापा और मृत्यु—ये सब संसार के प्रत्येक प्राणी के जीवन का अटल नियम हैं। इन्हें कोई भी रोक नहीं सकता। इसलिए अत्यधिक शोक में डूब जाना उचित नहीं है।”
उधर बुद्धिमान मंत्री सुमन्त्र ने भी शत्रुघ्न को संभाला। उन्होंने उन्हें जन्म और मृत्यु के सनातन नियम का स्मरण कराया तथा समझाया कि संसार में जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए धर्म और धैर्य का मार्ग ही श्रेष्ठ है।
धीरे-धीरे दोनों भाइयों ने स्वयं को संभाला। वे उठ तो गए, परन्तु उनके चेहरे आँसुओं, धूप और शोक से इतने मलिन हो चुके थे कि वे ऐसे प्रतीत होते थे जैसे वर्षा और धूप से फीके पड़ गए दो इन्द्रध्वज खड़े हों।
वे दोनों बार-बार अपने आँसू पोंछते, भर्राए हुए स्वर में बात करते और फिर रो पड़ते। उनकी आँखें लगातार रोने के कारण लाल हो चुकी थीं। दूसरी ओर मंत्रीगण उन्हें प्रेमपूर्वक समझाकर अंतिम संस्कार की शेष क्रियाएँ शीघ्र पूर्ण करने के लिए प्रेरित कर रहे थे, क्योंकि पुत्रधर्म का पालन ही उस समय महाराज दशरथ के प्रति उनकी सच्ची श्रद्धांजलि थी।