+91 8005792734
Contact Us
Contact Us
amita2903.aa@gmail.com
Support Email
Jhunjhunu, Rajasthan
Address
(73)
भरत का हृदयविदारक विलाप — मातृमोह पर धर्म की विजय
जब भरत अपने ननिहाल से अयोध्या लौटे, तब उनके मन में केवल एक ही उत्सुकता थी—शीघ्र ही अपने पिता महाराज दशरथ के चरणों में प्रणाम करेंगे और बड़े भाई श्रीराम से मिलकर उनका स्नेह प्राप्त करेंगे। उन्हें क्या पता था कि जिस अयोध्या की ओर वे प्रेम और उल्लास के साथ बढ़ रहे हैं, वही अयोध्या आज शोक के अथाह सागर में डूबी हुई है।
राजमहल में प्रवेश करते ही उन्हें न तो उत्सव दिखाई दिया, न वाद्ययंत्रों की ध्वनि सुनाई दी और न ही पिता तथा भाइयों का दर्शन हुआ। जब माता कैकेयी ने शांत स्वर में यह बताया कि महाराज दशरथ अब इस संसार में नहीं रहे और श्रीराम, लक्ष्मण तथा सीता चौदह वर्षों के वनवास पर चले गए हैं, तब यह समाचार सुनते ही भरत के पैरों तले मानो धरती खिसक गई। उनके हृदय पर ऐसा वज्राघात हुआ कि वे स्वयं को संभाल नहीं सके। वे पीड़ा से तड़प उठे और उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।
भरत विलाप करते हुए बोले कि आज तो सब कुछ समाप्त हो गया। पिता सदा के लिए उनसे बिछुड़ गए और बड़े भाई, जो उनके लिए पिता के समान थे, वे भी वन चले गए। ऐसे राज्य का वे क्या करेंगे जिसमें न पिता हैं, न राम हैं? उनके लिए अब राजसिंहासन केवल दुःख का प्रतीक बन चुका था।
उन्होंने अत्यन्त व्यथित होकर कैकेयी से कहा कि उसने उनके जीवन में एक साथ अनेक दुःखों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। पहले पिता का वियोग और फिर श्रीराम का वनवास—यह तो ऐसे है जैसे किसी गहरे घाव पर नमक छिड़क दिया जाए। उनका प्रत्येक शब्द हृदय की गहराइयों से निकल रहा था।
भरत का क्रोध और शोक बढ़ता गया। उन्होंने कहा कि कैकेयी मानो इस महान् रघुकुल के विनाश के लिए ही जन्मी थी। महाराज दशरथ ने जिसे प्रेमपूर्वक अपनी पत्नी बनाकर हृदय से लगाया, वास्तव में वह तो दहकते हुए अंगारे के समान निकली। उस समय पिता उसके वास्तविक स्वभाव को नहीं पहचान सके।
भरत ने उसे कठोर शब्दों में धिक्कारा। उन्होंने कहा कि तूने अपने स्वार्थ और मोह में आकर पूरे कुल का सुख छीन लिया। तूने ऐसे धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ राजा को मृत्यु के मुख में पहुँचा दिया, जिनका जीवन सदैव धर्म और प्रजा की भलाई के लिए समर्पित रहा।
उन्होंने दुःख से कहा कि उनके पिता ने असहनीय मानसिक पीड़ा सहते-सहते अपने प्राण त्याग दिए। यह सब उसी के कारण हुआ जिसने अपने लोभ में परिवार की जड़ ही काट दी।
भरत ने बार-बार एक ही प्रश्न किया—आखिर क्यों? उनके धर्मपरायण पिता ने ऐसा कौन-सा अपराध किया था? श्रीराम ने कौन-सा दोष किया था? फिर उन्हें घर से निकालकर वन भेजने का निर्णय क्यों लिया गया? उनके मन में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा था, जिसका उत्तर कैकेयी के पास नहीं था।
उन्होंने कौसल्या और सुमित्रा का स्मरण करते हुए कहा कि वे दोनों माताएँ भी आज पुत्र-वियोग में टूट चुकी होंगी। जिनके जीवन का आधार उनके पुत्र थे, उनके लिए अब जीवित रहना भी कितना कठिन हो गया होगा।
भरत ने श्रीराम के दिव्य चरित्र का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि राम धर्म के साक्षात् स्वरूप हैं। वे गुरुजनों और माता-पिता का आदर करना भली-भाँति जानते हैं। उन्होंने कभी कैकेयी में और कौसल्या में कोई भेद नहीं किया। जिस प्रकार वे अपनी जन्मदात्री माता का सम्मान करते थे, उसी प्रकार कैकेयी का भी आदर करते थे। इतने निष्कलंक पुत्र के साथ ऐसा अन्याय कैसे किया जा सकता है?
उन्होंने यह भी कहा कि माता कौसल्या कितनी महान् और उदार हैं। वे धर्म का पालन करते हुए कैकेयी के साथ सगी बहन जैसा व्यवहार करती थीं। उनके मन में कभी ईर्ष्या या द्वेष नहीं था। फिर भी कैकेयी ने उसी परिवार को दुःख देने में कोई संकोच नहीं किया।
भरत ने अत्यन्त वेदना से कहा कि जिस श्रीराम के शरीर पर राजसी वस्त्र शोभा देते थे, उसी महान् पुरुष को चीर और वल्कल पहनाकर जंगल भेज दिया गया। इतना बड़ा पाप करने के बाद भी कैकेयी के हृदय में पश्चात्ताप क्यों नहीं जागा?
उन्होंने श्रीराम के गुणों का वर्णन करते हुए कहा कि वे किसी की बुराई नहीं देखते। वे शूरवीर, पवित्र, दयालु और यशस्वी हैं। ऐसे निर्दोष व्यक्ति को वनवास देकर कैकेयी ने आखिर कौन-सा लाभ प्राप्त किया?
भरत ने स्पष्ट कहा कि कैकेयी केवल लोभ में अंधी हो चुकी है। यदि उसे उनके हृदय की थोड़ी-सी भी पहचान होती तो वह कभी यह नहीं सोचती कि भरत अपने भाई के अधिकार का राज्य स्वीकार कर लेंगे। वह उनके श्रीराम-प्रेम को समझ ही नहीं सकी।
उन्होंने भावुक होकर कहा कि श्रीराम और लक्ष्मण के बिना वे स्वयं को बिल्कुल असहाय अनुभव कर रहे हैं। जिन भाइयों की शक्ति और साहस पर उन्हें गर्व था, उनके बिना राज्य की रक्षा करना उनके लिए असंभव है।
भरत ने अपने पिता का उदाहरण देते हुए कहा कि स्वयं महाराज दशरथ भी श्रीराम को ही अपना सबसे बड़ा सहारा मानते थे। जैसे विशाल मेरु पर्वत अपने चारों ओर फैले घने वनों से सुरक्षित रहता है, वैसे ही राजा दशरथ भी अपने तेजस्वी पुत्र श्रीराम के कारण निश्चिंत रहते थे।
उन्होंने अपनी तुलना एक छोटे-से बछड़े से की। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक नन्हा बछड़ा भारी बोझ नहीं खींच सकता, उसी प्रकार इतना विशाल राज्य उनके लिए सम्भालना असम्भव है। यह भार केवल श्रीराम जैसे महापुरुष ही उठा सकते हैं।
भरत ने आगे कहा कि यदि किसी प्रकार वे राज्य चलाने में समर्थ भी हो जाएँ, तब भी वे कैकेयी की स्वार्थपूर्ण इच्छा कभी पूरी नहीं करेंगे। ऐसा राज्य उन्हें किसी भी मूल्य पर स्वीकार नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि श्रीराम कैकेयी को अपनी माता का स्थान न देते होते, तो वे स्वयं भी ऐसे अधर्म का साथ देने वाली माता का त्याग करने में तनिक भी संकोच न करते। परन्तु वे जानते थे कि श्रीराम सदैव मातृभक्ति और धर्म का पालन करते हैं, इसलिए वे स्वयं भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करेंगे।
भरत ने अत्यन्त दुःखी होकर कहा कि उनके पूर्वजों ने सदैव धर्म का पालन किया और अधर्म की निन्दा की। फिर कैकेयी के हृदय में इतनी पापपूर्ण बुद्धि कैसे उत्पन्न हो गई? यह सोचकर उनका हृदय और भी व्यथित हो उठा।
उन्होंने रघुकुल की महान् परम्परा का स्मरण कराया। इस वंश में सदैव ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है और छोटे भाई उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। यही सनातन व्यवस्था है।
भरत ने कहा कि कैकेयी न तो राजधर्म को समझती है और न ही राजाओं की मर्यादा को। यदि समझती होती, तो कभी भी ऐसी अनुचित माँग न करती।
उन्होंने पुनः दृढ़ता से कहा कि सभी राजवंशों में ज्येष्ठ पुत्र का ही राज्याभिषेक होता है और इक्ष्वाकु वंश में तो इस परम्परा का विशेष सम्मान है। इसे तोड़ना पूरे कुल की मर्यादा को नष्ट करना है।
उन्होंने दुःख व्यक्त किया कि जिस कुल की रक्षा सदैव धर्म और सदाचार ने की, उसी कुल की उज्ज्वल परम्परा आज कैकेयी के कारण कलंकित हो गई।
भरत को यह भी आश्चर्य हुआ कि कैकेयी स्वयं महान् केकय वंश में जन्मी थी, जहाँ धर्म और मर्यादा का सम्मान होता था। फिर उसके मन में ऐसा अधर्मपूर्ण विचार कैसे उत्पन्न हो गया?
अन्त में भरत ने दृढ़ स्वर में घोषणा की कि वे कभी भी उसकी इच्छा पूरी नहीं करेंगे। उसने उनके लिए ऐसी विपत्ति उत्पन्न कर दी है जो उनके प्राण भी ले सकती है, परन्तु वे अन्याय का साथ नहीं देंगे।
भरत ने संकल्प लिया कि वे तत्काल वन जाएँगे और निष्पाप, धर्मस्वरूप तथा सबके प्रिय श्रीराम को अयोध्या वापस लाएँगे। यही उनका पहला और सबसे बड़ा कर्तव्य होगा।
उन्होंने अन्तिम निर्णय सुनाया कि जब श्रीराम लौट आएँगे, तब वे स्वयं उनके सेवक बनकर, उनके चरणों की सेवा करते हुए जीवन बिताएँगे। उनके लिए यही सबसे बड़ा सम्मान, सबसे बड़ा सुख और सबसे बड़ा धर्म होगा।
यह सब कहते-कहते भरत का हृदय शोक, करुणा, क्रोध और धर्मभाव से भर उठा। वे बार-बार कैकेयी को उसके अधर्म का बोध कराते रहे। उनकी वाणी में सिंह की गर्जना जैसा तेज था, पर उस गर्जना के भीतर एक पुत्र का टूटा हुआ हृदय छिपा था—ऐसा हृदय, जिसने पिता को खो दिया था, भाई से बिछड़ गया था, परन्तु जिसने धर्म और श्रीराम के प्रति अपनी अटूट निष्ठा को किसी भी परिस्थिति में डगमगाने नहीं दिया। यही भरत के दिव्य चरित्र की सबसे महान् पहचान है।