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भरत की अयोध्या वापसी — अनजाने दुःख की ओर बढ़ते कदम

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भरत की अयोध्या वापसी — अनजाने दुःख की ओर बढ़ते कदम

 

राजगृह की भव्य नगरी उस समय अपने वैभव और शांति के लिए प्रसिद्ध थी। ऊँची-ऊँची प्राचीरों से घिरा वह नगर इतना सुरक्षित था कि शत्रु उसकी खाई तक पहुँचने का साहस भी नहीं कर सकते थे। उसी सुरक्षित और समृद्ध नगर में, एक ओर भरत अपने मित्रों को अपने भयावह स्वप्न का वर्णन कर रहे थे, तो दूसरी ओर अयोध्या से आए दूत अपनी लंबी और कठिन यात्रा पूरी करके थके हुए घोड़ों के साथ नगर के विशाल द्वार से भीतर प्रवेश कर रहे थे।

घोड़ों की साँसें तेज़ चल रही थीं। उनके शरीर पर यात्रा की धूल जमी हुई थी, परंतु दूतों के मन में केवल एक ही चिंता थी—किसी भी प्रकार भरत को शीघ्र अयोध्या लेकर चलना है।

राजमहल पहुँचकर उन्होंने पहले केकय देश के महाराज अश्वपति और राजकुमारों को प्रणाम किया। राजपरिवार ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया। इसके बाद वे विनम्रता से भरत के समीप पहुँचे, उनके चरणों में झुककर प्रणाम किया और अत्यंत संयमित स्वर में बोले,

“राजकुमार! महर्षि वसिष्ठ, राजपुरोहित तथा अयोध्या के सभी मंत्री आपका कुशल-क्षेम पूछते हैं। उन्होंने आपसे निवेदन किया है कि आप बिना विलंब किए तुरंत अयोध्या चलें। वहाँ एक अत्यंत आवश्यक कार्य आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।”

दूतों के चेहरे पर थकान तो थी, पर उन्होंने अपने मन का दुःख अपने चेहरे पर आने नहीं दिया। उन्हें महर्षि वसिष्ठ की आज्ञा याद थी कि भरत को अभी किसी भी प्रकार राम के वनवास और महाराज दशरथ के निधन का समाचार नहीं देना है।

फिर उन्होंने अपने साथ लाए हुए बहुमूल्य रेशमी वस्त्र, स्वर्णाभूषण और अनेक दुर्लभ उपहार भरत के सामने रखे।

उन्होंने आदरपूर्वक कहा,

“राजकुमार! कृपया इन उपहारों को स्वीकार कीजिए। इनमें से कुछ आपके लिए हैं और शेष आपके पूज्य नाना महाराज अश्वपति तथा आपके मामाश्री के लिए।”

दूतों ने बताया कि केकय नरेश के लिए अत्यंत बहुमूल्य सामग्री लाई गई है और उनके पुत्रों के लिए भी अनेक उपहार भेजे गए हैं।

भरत स्वभाव से अत्यंत विनम्र और परिवार-प्रेमी थे। उन्होंने बिना देर किए सभी उपहार अपने नाना और मामा को श्रद्धापूर्वक भेंट कर दिए। इसके बाद उन्होंने दूतों का भी आदर-सत्कार किया और उनके विश्राम तथा भोजन की व्यवस्था करवाई।

लेकिन उनके मन में सुबह देखा गया भयानक स्वप्न अब भी बार-बार उभर रहा था।

अचानक उन्होंने गंभीर स्वर में दूतों से पूछा,

“मेरे पिता महाराज दशरथ कुशल तो हैं न?”

कुछ क्षण रुककर उन्होंने दूसरा प्रश्न किया,

“मेरे बड़े भाई श्रीराम और वीर लक्ष्मण स्वस्थ हैं न?”

उनकी आँखों में चिंता और बढ़ गई।

वे बोले,

“मेरी बड़ी माता, धर्मपरायण महारानी कौसल्या कैसी हैं? वे स्वस्थ तो हैं?”

फिर उन्होंने पूछा,

“माता सुमित्रा और मेरे भाई लक्ष्मण प्रसन्न हैं न?”

कुछ क्षण चुप रहने के बाद उन्होंने अपनी माता कैकेयी का स्मरण किया।

भरत ने बड़ी स्पष्टता से कहा,

“मेरी माता कैकेयी का स्वभाव कुछ कठोर है। वे सदैव अपनी इच्छा पूरी करना चाहती हैं और स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझती हैं। वे स्वस्थ तो हैं? उन्होंने कोई विशेष संदेश भेजा है क्या?”

भरत के इन प्रश्नों को सुनकर दूतों का हृदय भीतर से काँप उठा।

वे जानते थे कि जिनके विषय में भरत पूछ रहे हैं, उन्हीं के जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन आ चुका है।

लेकिन उन्होंने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया।

उन्होंने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया,

“राजकुमार! जिनका आप कुशल-क्षेम पूछ रहे हैं, वे सब कुशल हैं। इस समय आपके लिए सबसे आवश्यक कार्य अयोध्या पहुँचना है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं लक्ष्मी आपका स्वागत करने के लिए प्रतीक्षा कर रही हैं। अतः कृपया शीघ्र यात्रा की तैयारी कीजिए।”

दूतों के उत्तर ने भरत की शंका पूरी तरह समाप्त तो नहीं की, लेकिन उन्होंने और प्रश्न नहीं किए।

उन्होंने तुरंत अपने नाना महाराज अश्वपति के पास जाकर विनम्रता से कहा,

“महाराज! अयोध्या से आए दूत मुझे तुरंत लौटने के लिए कह रहे हैं। यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अभी पिताजी के पास प्रस्थान करूँ। जब भी आप मुझे स्मरण करेंगे, मैं पुनः आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा।”

महाराज अश्वपति ने अपने प्रिय नाती की ओर स्नेह से देखा।

वे उठे, भरत को अपने पास बुलाया और प्रेमपूर्वक उनके मस्तक को सूँघकर आशीर्वाद दिया।

भावुक होकर उन्होंने कहा,

“पुत्र! जाओ। मेरी ओर से तुम्हें अनुमति है। तुम जैसे धर्मनिष्ठ और विनम्र पुत्र को पाकर कैकेयी धन्य हो गई है।”

उन्होंने आगे कहा,

“अपने माता-पिता को हमारा प्रणाम कहना। महर्षि वसिष्ठ और अन्य सभी ब्राह्मणों को हमारा कुशल समाचार देना। और राम तथा लक्ष्मण को भी कहना कि हम सब उन्हें बहुत स्नेहपूर्वक याद करते हैं।”

अश्वपति को क्या पता था कि जिन लोगों के लिए वे संदेश भेज रहे हैं, उनमें से एक इस संसार में नहीं रहा और दूसरे वन की ओर प्रस्थान कर चुके हैं।

विदाई के समय उन्होंने अपने प्रिय नाती को अनेक बहुमूल्य उपहार दिए।

विशाल और युद्धकुशल हाथी, सुंदर कालीन, दुर्लभ मृगचर्म, असंख्य स्वर्ण मुद्राएँ, सोलह सौ उत्तम घोड़े, तेज़ दौड़ने वाले खच्चर, पर्वतीय प्रदेशों के विशाल हाथी और अनेक प्रकार की मूल्यवान वस्तुएँ भरत को भेंट की गईं।

उन्होंने अपने राजमहल में पाले गए बलवान शिकारी कुत्ते भी उपहार में दिए, जो बाघों की भाँति पराक्रमी और अत्यंत प्रशिक्षित थे।

इतना ही नहीं, अपने विश्वसनीय और अनुभवी मंत्रियों को भी भरत के साथ भेजने का आदेश दिया, ताकि यात्रा सुरक्षित और सम्मानपूर्वक पूरी हो सके।

किन्तु उस समय भरत का मन इन उपहारों में तनिक भी नहीं लगा।

उन्होंने औपचारिक रूप से सब स्वीकार तो कर लिया, लेकिन उनके चेहरे पर प्रसन्नता का कोई चिन्ह नहीं था।

उनका मन किसी अनजानी आशंका से बार-बार घिर रहा था।

एक ओर दूत लगातार शीघ्र प्रस्थान करने का आग्रह कर रहे थे, दूसरी ओर उनका वह भयानक स्वप्न बार-बार उनकी स्मृति में लौट आता था।

उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि हृदय इतना व्याकुल क्यों हो रहा है।

ऐसा लगता था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन्हें अयोध्या की ओर खींच रही हो।

उन्होंने तुरंत यात्रा की तैयारी प्रारंभ कर दी।

कुछ ही समय में राजमार्ग पर एक विशाल काफिला तैयार हो गया।

सैकड़ों रथ, हाथी, घोड़े, ऊँट, बैलगाड़ियाँ और सेवक प्रस्थान के लिए खड़े थे। उपहारों से लदे वाहन, सैनिकों की टुकड़ियाँ और अश्वपति के विश्वसनीय मंत्री भी साथ चलने को तैयार थे।

भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को साथ लेकर राजमहल के भीतर अंतिम बार पहुँचे।

उन्होंने अपनी नानी, अपने नाना, मामा युधाजित और परिवार के सभी सदस्यों के चरण स्पर्श किए।

सबने उन्हें स्नेह और आशीर्वाद के साथ विदा किया।

भरत और शत्रुघ्न रथ पर सवार हुए।

रथ धीरे-धीरे राजमहल से बाहर निकला।

पीछे सैकड़ों रथों, हाथियों, घोड़ों और सेवकों का विशाल काफिला चल पड़ा।

बाहरी दृष्टि से यह दृश्य किसी विजयी राजकुमार की गौरवपूर्ण यात्रा जैसा प्रतीत हो रहा था।

किन्तु उस रथ में बैठे भरत के हृदय में न उत्साह था, न प्रसन्नता।

उनकी आत्मा किसी अज्ञात दुःख की आहट सुन चुकी थी।

वे नहीं जानते थे कि जिस अयोध्या की ओर वे लौट रहे हैं, वहाँ उनका स्वागत उत्सव से नहीं, बल्कि पिता के वियोग, राम के वनवास और पूरे रघुवंश को बदल देने वाले एक ऐसे सत्य से होने वाला है, जो उनके जीवन की दिशा सदा के लिए बदल देगा।