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भरत की करुण पुकार और श्रीराम को अयोध्या लौटने का आग्रह
श्रीरामचन्द्रजी ने जब भरत को राजधर्म और राजा के कर्तव्यों का उपदेश दिया, तब भरत का हृदय और भी व्याकुल हो उठा। वे अत्यन्त विनम्र होकर श्रीराम से कहने लगे—
भरत ने कहा, “भैया! मैं इस राज्य का अधिकारी ही नहीं हूँ। जब राजा बनने का अधिकार मेरा है ही नहीं, तो मेरे लिए राजधर्म का यह उपदेश किस काम का है? जिस धर्म का पालन आपको करना चाहिए, उसका भार मुझ पर डालना उचित नहीं है। मैं तो केवल आपका छोटा भाई हूँ और आपका सेवक बनकर ही रहना चाहता हूँ।”
भरत के मन में अपने बड़े भाई के प्रति अत्यन्त श्रद्धा और प्रेम था। उन्हें यह बात स्वीकार ही नहीं थी कि श्रीराम के रहते वे अयोध्या के राजा बनें।
उन्होंने आगे अत्यन्त दृढ़ता से कहा, “रघुकुल में सदा से एक महान और शाश्वत परम्परा चली आ रही है—जब तक ज्येष्ठ पुत्र जीवित है, तब तक छोटा पुत्र राजा नहीं बन सकता। यही हमारे कुल की मर्यादा है और यही धर्म है। इसलिए आपके रहते मेरा राज्य पर बैठना धर्म और परम्परा दोनों के विरुद्ध होगा।”
भरत की आँखों के सामने अपने कुल की मर्यादा और श्रीराम का महान व्यक्तित्व था। वे किसी भी परिस्थिति में उस मर्यादा को तोड़ना नहीं चाहते थे।
फिर भरत ने प्रेम और विनय से श्रीराम से आग्रह किया, “हे रघुनन्दन! आप मेरे साथ अयोध्या चलिए। अयोध्या आपके बिना सूनी और उदास हो गई है। वहाँ की प्रजा अपने प्रिय राजा की प्रतीक्षा कर रही है। आप ही हमारे कुल की समृद्धि और प्रतिष्ठा को आगे बढ़ा सकते हैं। इसलिए आप अयोध्या लौटकर राजा के पद पर अपना अभिषेक स्वीकार कीजिए।”
भरत के लिए सिंहासन कोई आकर्षण नहीं था। उनके मन में केवल एक इच्छा थी—श्रीराम वापस अयोध्या लौटें और स्वयं राजा बनें।
भरत ने राजा के पद की महिमा बताते हुए कहा, “लोग राजा को केवल एक मनुष्य मानते हैं, लेकिन मेरी दृष्टि में राजा साधारण मनुष्य नहीं होता। राजा के पद पर देवत्व की प्रतिष्ठा होती है। उससे ऐसी धर्मपूर्ण और न्यायपूर्ण आचरण की अपेक्षा की जाती है, जिसे निभाना किसी साधारण मनुष्य के लिए बहुत कठिन होता है। इसलिए इस महान पद के योग्य आप ही हैं।”
भरत के शब्दों में श्रीराम के प्रति उनका गहरा विश्वास दिखाई देता था। वे जानते थे कि श्रीराम धर्म, सत्य, न्याय और कर्तव्य के आदर्श हैं।
इसके बाद भरत ने अत्यन्त दुःख के साथ अपने पिता महाराज दशरथ की मृत्यु का समाचार स्मरण किया। उन्होंने कहा, “जब मैं केकय देश में था और आप वन की ओर चले आए थे, उसी समय हमारे पूजनीय पिता महाराज दशरथ इस संसार से विदा हो गए। वे महान राजा थे। उन्होंने अश्वमेध जैसे यज्ञ किए थे और सभी सज्जन तथा विद्वान उनका सम्मान करते थे। ऐसे महान पिता अब हमारे बीच नहीं हैं।”
भरत के लिए पिता की मृत्यु का दुःख पहले ही बहुत बड़ा था, लेकिन उन्हें यह पीड़ा और भी अधिक सताती थी कि पिता की मृत्यु के समय वे उनके पास नहीं थे।
उन्होंने आगे कहा, “भैया! आपके सीता माता और लक्ष्मणजी के साथ अयोध्या से वन के लिए निकलते ही पिता का हृदय दुःख और शोक से टूट गया था। वे आपके वियोग को सह नहीं सके। आपके वन चले जाने का दुःख उनके जीवन पर इतना भारी पड़ा कि उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।”
यह कहते-कहते भरत का हृदय भर आया। उन्हें लग रहा था कि पिता के अंतिम समय में श्रीराम उनके पास होते तो शायद उनके दुःख को कुछ शान्ति मिलती।
भरत ने श्रीराम से अत्यन्त करुण स्वर में कहा, “पुरुषश्रेष्ठ! अब आप उठिए और हमारे पिता को जलाञ्जलि दीजिए। मैं और शत्रुघ्न पहले ही पिता के लिए जल अर्पित कर चुके हैं। अब उनके सबसे प्रिय पुत्र होने के नाते आपका भी यह कर्तव्य है।”
भरत जानते थे कि पिता महाराज दशरथ के हृदय में श्रीराम के लिए कितना गहरा प्रेम था। इसलिए उन्होंने कहा, “कहा जाता है कि प्रिय पुत्र द्वारा अपने पिता को दिया गया जल और किया गया तर्पण पितृलोक में अक्षय फल देने वाला होता है। और आप तो पिता के सबसे प्रिय पुत्र थे। इसलिए आपका उनके लिए जल अर्पित करना अत्यन्त आवश्यक है।”
अन्त में भरत ने अपने पिता की अंतिम अवस्था का अत्यन्त मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने कहा—
“भैया! जब आप उनसे दूर हुए, उसी क्षण से पिता का मन दुःख से टूट गया था। वे आपके वियोग में बीमार पड़ गए थे। उनका मन हर समय केवल आपको देखने के लिए व्याकुल रहता था। उनकी बुद्धि, उनके विचार, उनकी स्मृतियाँ—सब कुछ केवल आपमें ही लगा हुआ था। वे आपको याद करते रहे, आपकी प्रतीक्षा करते रहे और अंततः आपके वियोग का दुःख सहते-सहते इस संसार से विदा हो गए।”
भरत की पूरी बात में केवल एक ही भावना दिखाई देती थी—श्रीराम के प्रति असीम प्रेम, पिता के प्रति गहरा दुःख और अपने कुल की मर्यादा के प्रति अटूट श्रद्धा। भरत स्वयं राजा बनने की इच्छा नहीं रखते थे। उनके लिए अयोध्या का सिंहासन तभी सार्थक था, जब उस पर श्रीराम विराजमान हों।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. भरत ने राजधर्म का उपदेश अपने लिए अनुपयोगी क्यों बताया?
उत्तर: भरत ने कहा कि वे राज्य के अधिकारी नहीं हैं, इसलिए राजधर्म का उपदेश उनके लिए उपयोगी नहीं है।
प्रश्न 2. रघुकुल की कौन-सी शाश्वत परम्परा भरत ने श्रीराम को याद दिलाई?
उत्तर: भरत ने बताया कि रघुकुल की परम्परा के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र के रहते छोटा पुत्र राजा नहीं बन सकता।
प्रश्न 3. भरत ने श्रीराम से अयोध्या लौटने का आग्रह क्यों किया?
उत्तर: भरत चाहते थे कि श्रीराम अयोध्या लौटकर राजा बनें और अपने कुल की मर्यादा तथा प्रजा का कल्याण करें।
प्रश्न 4. भरत की दृष्टि में राजा साधारण मनुष्य से अलग क्यों होता है?
उत्तर: भरत के अनुसार राजा देवत्व से प्रतिष्ठित होता है, क्योंकि उससे धर्म, न्याय और अर्थयुक्त आचरण की अपेक्षा की जाती है।
प्रश्न 5. महाराज दशरथ की मृत्यु किस परिस्थिति में हुई?
उत्तर: श्रीराम के वन जाने के दुःख और वियोग से पीड़ित होकर महाराज दशरथ अत्यन्त शोकग्रस्त हुए और उनका निधन हो गया।
प्रश्न 6. भरत ने श्रीराम से जलाञ्जलि देने के लिए क्यों कहा?
उत्तर: भरत ने कहा कि श्रीराम पिता के परम प्रिय पुत्र थे, इसलिए उन्हें पिता के लिए जलाञ्जलि अर्पित करनी चाहिए।
प्रश्न 7. महाराज दशरथ श्रीराम के वियोग में किस प्रकार पीड़ित हुए?
उत्तर: श्रीराम से अलग होते ही दशरथ शोक से रुग्ण हो गए और उन्हें देखने की इच्छा में निरन्तर उनका स्मरण करते रहे।
प्रश्न 8. भरत के मन में श्रीराम के प्रति कौन-सी भावनाएँ थीं?
उत्तर: भरत के मन में श्रीराम के प्रति गहरा प्रेम, सम्मान और श्रद्धा थी तथा वे उन्हें ही अयोध्या का योग्य राजा मानते थे।
प्रश्न 9. भरत स्वयं राजा क्यों नहीं बनना चाहते थे?
उत्तर: भरत श्रीराम को ज्येष्ठ पुत्र और वास्तविक अधिकारी मानते थे। वे कुल की परम्परा और धर्म के विरुद्ध जाकर राजा नहीं बनना चाहते थे।
प्रश्न 10. इस प्रसंग में भरत के चरित्र की कौन-सी विशेषताएँ दिखाई देती हैं?
उत्तर: इस प्रसंग में भरत की विनम्रता, त्याग, भ्रातृ-प्रेम, धर्मनिष्ठा, कर्तव्यबोध और कुल की मर्यादा के प्रति सम्मान दिखाई देता है।