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भरत की करुण विनती और श्रीराम की अडिग धर्मनिष्ठा

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भरत की करुण विनती और श्रीराम की अडिग धर्मनिष्ठा

मन्दाकिनी नदी का शांत तट था। चारों ओर वन की नीरवता फैली हुई थी, पर उस समय वहाँ उपस्थित लोगों के हृदयों में गहरा दुःख और व्याकुलता उमड़ रही थी। श्रीराम ने भरत को धर्म, कर्तव्य और जीवन के सत्य का उपदेश देकर मौन धारण कर लिया।

श्रीराम के मुख से निकले गंभीर और अर्थपूर्ण वचनों को सुनकर भरत का हृदय और भी द्रवित हो उठा। वे जानते थे कि श्रीराम संसार के किसी भी सुख-दुःख से विचलित नहीं होते। प्रिय वस्तु मिलने पर भी वे अत्यधिक प्रसन्न नहीं होते और दुःख आने पर भी उनके मन का संतुलन नहीं बिगड़ता। वे बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करते हुए उनसे भी धर्म और नीति से जुड़ी बातें पूछते थे। ऐसी विवेकपूर्ण बुद्धि रखने वाले श्रीराम को भला संसार का कोई दुःख कैसे विचलित कर सकता था?

भरत ने श्रीराम की महानता का स्मरण करते हुए कहा कि जिस मनुष्य को आत्मा और शरीर के वास्तविक भेद का ज्ञान हो जाता है, वह विपत्ति में भी अधिक समय तक शोक में डूबा नहीं रहता। श्रीराम तो देवताओं के समान सात्त्विक, सत्यप्रतिज्ञ, बुद्धिमान, सर्वज्ञ और सबके साक्षी हैं। वे जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझते हैं। इसलिए भरत को विश्वास था कि श्रीराम जैसे महान पुरुष के पास असह्य दुःख टिक ही नहीं सकता।

लेकिन इसके बाद भरत का स्वर और अधिक करुण हो गया। उन्होंने अपनी माता कैकेयी के अपराध की बात उठाई। उन्होंने कहा कि जब वे अयोध्या से दूर थे, तब उनकी माता ने उनके लिए जो कुछ किया, वह उनके लिए बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं था। उन्हें ऐसा राज्य नहीं चाहिए था जो उनके भाई श्रीराम के वनवास और पिता के दुःख की कीमत पर मिला हो।

भरत के हृदय में अपनी माता के प्रति भी गहरा आक्रोश था, पर वे धर्म की मर्यादा से बँधे हुए थे। उन्होंने कहा कि कैकेयी ने भले ही बहुत बड़ा अपराध किया हो, फिर भी वे अपनी ही माता की हत्या जैसा घोर और लोकनिन्दित कर्म नहीं कर सकते। वे महाराज दशरथ के पुत्र थे और धर्म-अधर्म का भेद जानते थे। इसलिए वे ऐसा पाप कैसे कर सकते थे?

भरत के हृदय में अपने पिता के प्रति भी अत्यन्त गहरा सम्मान था। उन्होंने कहा कि महाराज दशरथ उनके पिता ही नहीं, उनके गुरु, राजा और देवता के समान पूजनीय थे। अब वे इस संसार में नहीं रहे, इसलिए भरत भरी सभा में भी उनकी निन्दा नहीं करना चाहते थे। उनके मन में पिता के प्रति सम्मान था, लेकिन वे यह भी मानते थे कि उस समय मोह और क्रोध के कारण उनसे धर्म के विपरीत निर्णय हो गया था।

भरत ने अत्यन्त विनम्र होकर श्रीराम से कहा कि कौन-सा मनुष्य धर्म को जानते हुए भी किसी स्त्री को प्रसन्न करने के मोह में ऐसा कर्म कर सकता है, जिससे धर्म और अर्थ दोनों नष्ट हो जाएँ? उन्होंने उस पुरानी मान्यता का भी स्मरण कराया कि जीवन के अंतिम समय में मनुष्य की बुद्धि कभी-कभी मोह से ढक जाती है। भरत को लगा कि महाराज दशरथ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा।

अब भरत ने श्रीराम से सबसे बड़ी प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि यदि पिता से कोई भूल हो गई है, तो योग्य पुत्र का कर्तव्य है कि वह उस भूल को सुधार दे। जो पुत्र पिता की अनुचित भूल को भी ठीक करने का साहस करता है, वही वास्तव में श्रेष्ठ संतान कहलाता है। इसलिए श्रीराम को पिता के उस निर्णय का समर्थन नहीं करना चाहिए जो धर्म की सीमा से बाहर हो गया था।

भरत ने हाथ जोड़कर कहा कि श्रीराम ही उनके, कैकेयी के, समस्त बन्धु-बान्धवों के, अयोध्यावासियों के और पूरे राज्य की रक्षा कर सकते हैं। वे स्वयं को इस योग्य नहीं मानते थे कि श्रीराम के रहते हुए अयोध्या का राज्य संभाल सकें।

उन्होंने अत्यन्त भावुक होकर श्रीराम के सामने धर्म का दूसरा पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि क्षत्रिय का धर्म प्रजा की रक्षा करना है। फिर वन में जाकर जटाएँ धारण करना और राजधर्म का त्याग करना कैसे उचित हो सकता है? एक ओर राजसिंहासन और प्रजा की रक्षा का कर्तव्य था, दूसरी ओर वनवास। भरत को दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रहे थे।

भरत ने समझाया कि क्षत्रिय के लिए राज्याभिषेक केवल सुख प्राप्त करने का साधन नहीं है। राजा बनना वास्तव में प्रजा की सेवा और रक्षा करने का महान दायित्व है। जो राजा अपनी प्रजा की रक्षा करता है, उसे धर्म का प्रत्यक्ष फल इसी संसार में मिलता है। इसलिए भरत को यह स्वीकार नहीं था कि श्रीराम राजधर्म छोड़कर वन में रहें।

उन्होंने आगे कहा कि यदि श्रीराम को कष्ट सहकर धर्म का पालन करना ही है, तो वे राजधर्म निभाते हुए प्रजा की सेवा करें और उसी में कष्ट उठाएँ। भरत ने यह भी कहा कि धर्म के ज्ञाता पुरुष चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम को अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते हैं, क्योंकि गृहस्थ ही अनेक प्रकार से समाज और अन्य आश्रमों का पालन करता है। फिर श्रीराम ऐसे महत्वपूर्ण कर्तव्य को छोड़कर वन क्यों जाना चाहते हैं?

अब भरत ने अपने आपको श्रीराम के सामने बहुत छोटा बताते हुए कहा कि वे उम्र में भी छोटे हैं, अनुभव में भी छोटे हैं और गुण तथा बुद्धि में भी श्रीराम से बहुत पीछे हैं। ऐसे में श्रीराम के जीवित और उपस्थित रहते हुए वे विशाल पृथ्वी का शासन कैसे कर सकते हैं? उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि वे श्रीराम के बिना जीवन धारण करने की भी कल्पना नहीं कर सकते, राज्य संभालना तो बहुत दूर की बात है।

भरत ने हाथ जोड़कर फिर कहा कि महाराज दशरथ का यह विशाल, समृद्ध और निष्कण्टक राज्य श्रीराम का ही है। इसलिए श्रीराम अपने भाइयों और बन्धु-बान्धवों के साथ इस राज्य का पालन करें।

उन्होंने बताया कि महर्षि वसिष्ठ जैसे महान ऋषि, सभी ऋत्विज्, मन्त्री, सेनापति और राज्य के प्रमुख लोग वहाँ उपस्थित हैं। सभी श्रीराम का राज्याभिषेक करने के लिए तैयार हैं। भरत की इच्छा थी कि उसी समय मन्दाकिनी के तट पर श्रीराम का अभिषेक कर दिया जाए और फिर वे सभी श्रीराम को अयोध्या लेकर लौटें।

भरत की आँखों में आशा की चमक थी। उन्हें विश्वास था कि यदि श्रीराम उनकी प्रार्थना स्वीकार कर लें, तो अयोध्या का दुःख समाप्त हो जाएगा। उन्होंने कल्पना की कि श्रीराम इन्द्र के समान तेजस्वी होकर अयोध्या लौटेंगे, प्रजा का पालन करेंगे, देवताओं, ऋषियों और पितरों के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करेंगे, दुष्ट शत्रुओं का दमन करेंगे और मित्रों को सुख देंगे।

भरत ने भावुक होकर कहा कि श्रीराम के अयोध्या लौटते ही उनके मित्र और शुभचिन्तक प्रसन्न हो जाएँगे और उनके शत्रु भयभीत होकर चारों दिशाओं में भाग जाएँगे। इससे कैकेयी के माथे पर लगा कलंक भी मिट जाएगा और महाराज दशरथ भी संसार में निन्दा से बच जाएँगे।

अब भरत का धैर्य टूटने लगा। उन्होंने श्रीराम के चरणों में अपना सिर रख दिया और अत्यन्त दीन होकर प्रार्थना की—हे आर्य! मुझ पर कृपा कीजिए। जिस प्रकार भगवान महादेव सभी प्राणियों पर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने भाइयों, माता-पिता और समस्त प्रजा पर कृपा कीजिए।

भरत की आँखों से आँसू बह रहे थे। उनके शब्दों में भाई के प्रति प्रेम, पिता के प्रति सम्मान, माता के अपराध का पश्चात्ताप और अयोध्या के प्रति कर्तव्य—सब कुछ एक साथ दिखाई दे रहा था।

अन्त में भरत ने अपनी अंतिम विनती रखी। उन्होंने कहा कि यदि श्रीराम उनकी इतनी प्रार्थना के बाद भी अयोध्या लौटने के लिए तैयार नहीं होते और वन को ही जाना चाहते हैं, तो वे भी श्रीराम के साथ वन में जाएँगे। उन्हें ऐसा राज्य स्वीकार नहीं था जिसमें श्रीराम का साथ न हो।

भरत ने श्रीराम के चरणों में सिर रखकर उन्हें प्रसन्न करने का पूरा प्रयास किया। उनका हृदय ग्लानि, प्रेम और दुःख से भरा हुआ था। वहाँ उपस्थित सभी लोगों को लग रहा था कि अब शायद श्रीराम भरत की करुण पुकार सुनकर अयोध्या लौटने के लिए तैयार हो जाएँगे।

लेकिन श्रीराम की धर्मनिष्ठा पर्वत के समान अटल थी।

उन्होंने पिता की आज्ञा को अपना सर्वोच्च धर्म माना। भरत की करुण विनती, माताओं के आँसू, अयोध्यावासियों का दुःख और राज्य का आकर्षण—इनमें से कोई भी बात श्रीराम को उनकी प्रतिज्ञा से विचलित नहीं कर सकी। उन्होंने अयोध्या लौटने का विचार स्वीकार नहीं किया।

श्रीराम की इस अद्भुत दृढ़ता को देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग एक साथ दुःखी भी हुए और प्रसन्न भी। वे दुःखी इसलिए थे कि श्रीराम अयोध्या लौटने को तैयार नहीं थे, लेकिन उनकी सत्यनिष्ठा और प्रतिज्ञा-पालन की दृढ़ता देखकर उनके हृदय में गर्व और प्रसन्नता भी उत्पन्न हुई।

ऋत्विज्, अयोध्यावासी, अलग-अलग समुदायों के प्रमुख और तीनों माताएँ भरत के वचनों से अत्यन्त प्रभावित हुए। सबकी आँखों से आँसू बह रहे थे। भरत ने अपने भाई के लिए जिस प्रेम, त्याग और धर्मबुद्धि का परिचय दिया था, उसकी सभी ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

इसके बाद सभी लोगों ने विनम्र होकर श्रीराम के सामने अपनी-अपनी ओर से प्रार्थना की कि वे अयोध्या लौट चलें। पूरा वातावरण करुणा से भर गया था। एक ओर भरत का प्रेम था, दूसरी ओर माताओं की ममता, प्रजा का दुःख और सबकी विनती थी; और दूसरी ओर श्रीराम की अडिग धर्मनिष्ठा थी।

इस प्रकार मन्दाकिनी के तट पर भरत ने अपने जीवन की सबसे करुण और हृदयस्पर्शी विनती श्रीराम के सामने रखी। उन्होंने राज्य के लिए नहीं, बल्कि श्रीराम को उनका उचित स्थान दिलाने के लिए आग्रह किया। पर श्रीराम ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चे धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अपने प्रिय से प्रिय व्यक्ति की विनती और संसार के सारे सुखों को भी त्याग सकता है, पर सत्य और कर्तव्य से पीछे नहीं हटता।

 

प्रश्न–उत्तर

 

प्रश्न 1. भरत ने श्रीराम की किन विशेषताओं की प्रशंसा की?

उत्तर: भरत ने श्रीराम को सत्यप्रतिज्ञ, बुद्धिमान, सर्वज्ञ, सात्त्विक, धर्मात्मा, आत्मज्ञानी और सबके साक्षी के रूप में उनकी महानता की प्रशंसा की।

 

प्रश्न 2. भरत ने कैकेयी के कार्य के बारे में क्या कहा?

उत्तर: भरत ने कहा कि कैकेयी ने उनके लिए जो पाप किया, वह उन्हें स्वीकार नहीं है और वे उसके कारण प्राप्त राज्य नहीं चाहते।

 

प्रश्न 3. भरत अपनी माता कैकेयी को दण्ड क्यों नहीं देना चाहते थे?

उत्तर: भरत धर्म के बन्धन में थे और माता की हत्या को लोकनिन्दित कर्म मानते थे, इसलिए उन्होंने कैकेयी को दण्ड नहीं दिया।

 

प्रश्न 4. भरत ने महाराज दशरथ की निन्दा क्यों नहीं की?

उत्तर: भरत महाराज दशरथ को अपना पिता, गुरु, राजा और देवता मानते थे। इसलिए उनके निधन के बाद भी वे उनकी सभा में निन्दा नहीं करना चाहते थे।

 

प्रश्न 5. भरत के अनुसार श्रेष्ठ पुत्र किसे कहा जाता है?

उत्तर: भरत के अनुसार जो पुत्र अपने पिता की हुई अनुचित भूल को सुधार देता है, वही संसार में उत्तम और योग्य संतान माना जाता है।

 

प्रश्न 6. भरत ने श्रीराम से अयोध्या लौटने की प्रार्थना क्यों की?

उत्तर: भरत चाहते थे कि श्रीराम क्षत्रिय धर्म निभाकर राज्य संभालें, प्रजा की रक्षा करें और अयोध्या के लोगों को सुख प्रदान करें।

 

प्रश्न 7. भरत ने अपने आपको श्रीराम से छोटा क्यों बताया?

उत्तर: भरत ने कहा कि वे उम्र, अनुभव, बुद्धि और गुणों में श्रीराम से छोटे हैं, इसलिए उनके रहते राज्य का पालन करना उचित नहीं।

 

प्रश्न 8. भरत के अनुसार क्षत्रिय का प्रमुख धर्म क्या है?

उत्तर: भरत के अनुसार क्षत्रिय का प्रमुख धर्म राज्य का पालन करना और अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए उनके सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना है।

 

प्रश्न 9. भरत ने श्रीराम के राज्याभिषेक के लिए किन लोगों की उपस्थिति बताई?

उत्तर: भरत ने बताया कि महर्षि वसिष्ठ आदि ऋत्विज्, मन्त्री, सेनापति और राज्य की सभी प्रमुख प्रकृतियाँ श्रीराम के राज्याभिषेक के लिए उपस्थित थीं।

 

प्रश्न 10. भरत ने श्रीराम के चरणों में क्या प्रार्थना की?

उत्तर: भरत ने श्रीराम से दया करने, अयोध्या लौटने, राज्य स्वीकार करने और अपने बन्धु-बान्धवों तथा प्रजा पर कृपा करने की प्रार्थना की।

 

प्रश्न 11. यदि श्रीराम अयोध्या नहीं लौटते तो भरत ने क्या कहा?

उत्तर: भरत ने कहा कि यदि श्रीराम उनकी प्रार्थना स्वीकार करके अयोध्या नहीं लौटेंगे, तो वे भी उनके साथ वन चले जाएँगे।

 

प्रश्न 12. श्रीराम ने भरत की विनती स्वीकार क्यों नहीं की?

उत्तर: श्रीराम ने पिता की आज्ञा और अपनी प्रतिज्ञा को सर्वोच्च धर्म माना। इसलिए भरत और सभी लोगों की विनती के बावजूद वे अयोध्या नहीं लौटे।

 

प्रश्न 13. श्रीराम की दृढ़ता देखकर उपस्थित लोगों की क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर: लोग श्रीराम के अयोध्या न लौटने से दुःखी हुए, लेकिन उनकी सत्यनिष्ठा, धर्मपालन और प्रतिज्ञा की दृढ़ता देखकर हर्षित भी हुए।

 

प्रश्न 14. भरत के वचनों से उपस्थित लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: भरत के प्रेम, त्याग और धर्मपूर्ण वचनों से ऋषि, माताएँ और अयोध्यावासी अत्यन्त प्रभावित हुए तथा उन्होंने भरत की बहुत प्रशंसा की।

 

प्रश्न 15. इस प्रसंग से श्रीराम के चरित्र की कौन-सी विशेषता प्रकट होती है?

उत्तर: इस प्रसंग से श्रीराम की सत्यनिष्ठा, धर्मपालन, वचनबद्धता, आत्मसंयम और कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य पर अडिग रहने की विशेषता प्रकट होती है।