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भरत की श्रीराम से मिलने की व्याकुलता
चित्रकूट के घने वन में भरत अपनी विशाल सेना के साथ श्रीराम को खोजते हुए आगे बढ़ रहे थे। उनके मन में केवल एक ही इच्छा थी—किसी भी तरह अपने प्रिय बड़े भाई श्रीराम के दर्शन करना। सेना बहुत बड़ी थी, इसलिए भरत ने उचित समझा कि सभी लोग एक साथ वन में न फैलें, बल्कि अलग-अलग दिशाओं में खोज करें।
जब सेना को सुरक्षित स्थान पर रोक दिया गया, तब भरत ने अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को पास बुलाया। उन्होंने प्रेम और गंभीरता से कहा कि शत्रुघ्न बहुत-से सैनिकों और निषादों को साथ लेकर वन के अलग-अलग भागों में जाएँ और श्रीराम को खोजें। भरत के मन में यह चिंता थी कि इतने घने और कठिन वन में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता कहाँ होंगे।
भरत ने निषादराज गुह से भी कहा कि वे अपने हजारों साथियों के साथ धनुष-बाण और तलवार लेकर वन में जाएँ और श्रीराम तथा लक्ष्मण का पता लगाएँ। गुह इस वन के रास्तों और स्थानों को अच्छी तरह जानते थे, इसलिए भरत को विश्वास था कि उनकी सहायता से श्रीराम को शीघ्र खोज लिया जाएगा।
लेकिन भरत स्वयं भी आराम से बैठने वाले नहीं थे। उन्होंने निश्चय किया कि वे मंत्रियों, नगरवासियों, गुरुजनों और ब्राह्मणों के साथ पैदल ही पूरे वन में श्रीराम को खोजेंगे। उनके मन में भाई के प्रति इतना गहरा प्रेम था कि उन्हें अपनी थकान, कठिन रास्ते और वन की परेशानियों की कोई चिंता नहीं थी।
भरत का हृदय श्रीराम के लिए प्रेम और विरह से भरा हुआ था। वे मन-ही-मन सोच रहे थे कि जब तक उन्हें श्रीराम, वीर लक्ष्मण और माता सीता के दर्शन नहीं हो जाते, तब तक उन्हें चैन कैसे मिल सकता है? उनके लिए श्रीराम केवल बड़े भाई नहीं थे, बल्कि उनके जीवन के आधार और आदर्श थे।
भरत को श्रीराम का सुंदर मुख बार-बार याद आ रहा था। वे सोचते थे कि उनके बड़े भाई का मुख कमल की तरह सुंदर और उनके नेत्र कमल की पंखुड़ियों के समान विशाल हैं। उस प्रिय मुख के दर्शन किए बिना उनका मन बेचैन था। उन्हें लगता था कि श्रीराम को देखकर ही उनके हृदय की सारी पीड़ा दूर हो सकती है।
फिर भरत ने लक्ष्मण के भाग्य की प्रशंसा की। वे सोचने लगे कि लक्ष्मण कितने सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें हर समय श्रीराम के साथ रहने और उनके तेजस्वी, शांत तथा प्रसन्न मुख को देखने का अवसर मिलता है। भरत के मन में लक्ष्मण के प्रति कोई ईर्ष्या नहीं थी, बल्कि उन्हें इस बात पर खुशी थी कि कम-से-कम कोई तो श्रीराम की सेवा और संगति में है।
भरत की सबसे बड़ी इच्छा यह थी कि वे श्रीराम के चरणों को अपने सिर पर रख सकें। उनके लिए श्रीराम के चरण केवल भाई के चरण नहीं थे, बल्कि सम्मान, धर्म और प्रेम के प्रतीक थे। भरत चाहते थे कि वे अपने बड़े भाई के सामने जाकर उन्हें प्रणाम करें और उनके चरणों में अपना प्रेम अर्पित कर दें।
भरत के मन में एक और गहरी इच्छा थी। वे चाहते थे कि श्रीराम वापस अयोध्या लौटें और अपने पूर्वजों से प्राप्त राज्य के सच्चे अधिकारी के रूप में राजा बनें। वे चाहते थे कि श्रीराम का विधिपूर्वक राज्याभिषेक हो और अभिषेक के पवित्र जल से उनका शरीर भीग जाए। जब तक ऐसा नहीं होता, भरत के मन को शांति मिलने वाली नहीं थी।
इसके बाद भरत ने माता सीता के प्रति भी अपना सम्मान प्रकट किया। उन्होंने सोचा कि सीता ने अपने पति श्रीराम का साथ देकर महान धर्म और प्रेम का परिचय दिया है। अयोध्या के सुख और राजमहल को छोड़कर वे श्रीराम के साथ कठिन वन में चली आईं। इसलिए भरत ने माना कि सीता अपने इस महान त्याग और पति के प्रति निष्ठा से धन्य हो गई हैं।
भरत ने चित्रकूट की भी प्रशंसा की। उनके मन में विचार आया कि जिस वन में श्रीराम जैसे महान और धर्मात्मा पुरुष निवास कर रहे हैं, वह स्थान साधारण कैसे हो सकता है? जिस प्रकार देवताओं के लिए नन्दनवन अत्यंत सुंदर और पवित्र माना जाता है, उसी प्रकार श्रीराम के निवास के कारण चित्रकूट भी अत्यंत पवित्र और मंगलकारी हो गया है।
उन्होंने यह भी कहा कि जिस कठिन और भयानक वन में शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ श्रीराम निवास कर रहे हैं, वह वन भी धन्य हो गया है। अर्थात् श्रीराम की उपस्थिति ने उस वन को भी पवित्र बना दिया था।
इन भावपूर्ण बातों के बाद भरत ने देर नहीं की। वे अपने मन में श्रीराम के दर्शन की तीव्र इच्छा लिए विशाल वन में पैदल ही आगे बढ़ गए। उनके साथ शत्रुघ्न और निषादराज गुह भी थे।
वन का रास्ता कठिन था। चारों ओर ऊँचे पर्वत, घने पेड़ और फूलों से लदी शाखाएँ दिखाई दे रही थीं। भरत तेजी से आगे बढ़ रहे थे। उनके मन में केवल एक ही विचार था—कहाँ हैं मेरे राम? कब उनके दर्शन होंगे?
चलते-चलते भरत एक ऊँचे शाल-वृक्ष पर चढ़ गए। वहाँ से उन्होंने दूर तक देखने का प्रयास किया। अचानक उनकी दृष्टि एक स्थान पर ठहर गई। उन्होंने देखा कि चित्रकूट के पास कहीं से धुआँ ऊपर उठ रहा है।
भरत का हृदय अचानक खुशी से भर उठा। उन्हें लगा कि यह साधारण धुआँ नहीं हो सकता। वन में ऋषियों और तपस्वियों के आश्रमों में अग्नि जलती रहती थी, लेकिन भरत के मन ने जैसे तुरंत पहचान लिया कि शायद यही वह स्थान है जहाँ उनके प्रिय श्रीराम रहते हैं।
उन्होंने उत्साह से उस धुएँ की ओर देखा और मन में कहा—“यहीं कहीं मेरे श्रीराम हैं!”
शत्रुघ्न और भरत दोनों को अत्यंत आनंद हुआ। लंबे समय से जिस भाई की तलाश में वे भटक रहे थे, अब उसके मिलने की आशा सामने दिखाई दे रही थी। भरत को ऐसा लगा मानो कोई व्यक्ति अथाह और कठिन समुद्र को पार करके सुरक्षित किनारे पहुँच गया हो। उनके मन को अचानक बहुत बड़ा संतोष मिला।
अब उन्हें विश्वास हो गया था कि श्रीराम का आश्रम बहुत दूर नहीं है। उन्होंने खोजने के लिए आई हुई सेना को वहीं रोक दिया, ताकि इतनी बड़ी सेना के कारण आश्रम में कोई परेशानी न हो और श्रीराम को अचानक भय या असुविधा न हो।
इसके बाद भरत ने निषादराज गुह को साथ लिया और तेजी से श्रीराम के आश्रम की ओर चल पड़े।
उनके हृदय में उस समय अनेक भाव एक साथ उमड़ रहे थे—अपने प्रिय भाई से मिलने की खुशी, इतने दिनों के विरह की पीड़ा, श्रीराम के चरणों में पहुँचने की उत्कंठा और उन्हें अयोध्या वापस ले जाने की आशा।
अब भरत के कदम पहले से भी तेज हो गए थे।
जिस भाई को खोजने के लिए वे इतनी दूर आए थे, उसका आश्रम उनकी आँखों के सामने था। श्रीराम से मिलने में अब केवल कुछ ही क्षणों की दूरी रह गई थी।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. भरत ने सेना को किस प्रकार व्यवस्थित किया?
उत्तर: भरत ने विशाल सेना को एक स्थान पर ठहराया और शत्रुघ्न, निषादराज गुह तथा स्वयं अलग-अलग लोगों के साथ श्रीराम की खोज करने का निश्चय किया।
प्रश्न 2. भरत ने शत्रुघ्न को क्या आदेश दिया?
उत्तर: भरत ने शत्रुघ्न से कहा कि वे अनेक मनुष्यों और निषादों को साथ लेकर वन के चारों ओर जाकर श्रीराम को शीघ्र खोजें।
प्रश्न 3. निषादराज गुह को भरत ने क्या कार्य सौंपा?
उत्तर: भरत ने गुह से अपने धनुर्धारी और तलवारधारी साथियों के साथ वन में जाकर श्रीराम और लक्ष्मण का पता लगाने को कहा।
प्रश्न 4. भरत स्वयं किस प्रकार श्रीराम की खोज करना चाहते थे?
उत्तर: भरत मंत्रियों, नगरवासियों, गुरुजनों और ब्राह्मणों के साथ पैदल पूरे वन में घूमकर श्रीराम की खोज करना चाहते थे।
प्रश्न 5. भरत को कब तक शांति मिलने वाली नहीं थी?
उत्तर: जब तक भरत श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के दर्शन नहीं कर लेते, तब तक उनके व्याकुल मन को शांति मिलने वाली नहीं थी।
प्रश्न 6. भरत श्रीराम के मुख का दर्शन क्यों करना चाहते थे?
उत्तर: भरत श्रीराम के कमल जैसे विशाल नेत्रों और सुंदर, शांत मुख के दर्शन के लिए अत्यंत व्याकुल थे और उन्हें देखकर मन की पीड़ा मिटाना चाहते थे।
प्रश्न 7. भरत ने लक्ष्मण को भाग्यशाली क्यों माना?
उत्तर: भरत ने लक्ष्मण को भाग्यशाली माना क्योंकि वे निरंतर श्रीराम के साथ रहते और उनके तेजस्वी, निर्मल तथा प्रसन्न मुख का दर्शन करते थे।
प्रश्न 8. भरत की सबसे बड़ी इच्छा क्या थी?
उत्तर: भरत की इच्छा थी कि वे श्रीराम के चरणकमलों को अपने सिर पर रखें और उन्हें अयोध्या के सिंहासन पर प्रतिष्ठित करें।
प्रश्न 9. भरत श्रीराम का राज्याभिषेक क्यों चाहते थे?
उत्तर: भरत जानते थे कि श्रीराम राज्य के सच्चे अधिकारी हैं। इसलिए वे चाहते थे कि उनका विधिपूर्वक अभिषेक हो और वे राजा बनें।
प्रश्न 10. भरत ने सीता को कृतार्थ क्यों माना?
उत्तर: भरत ने सीता को कृतार्थ माना क्योंकि उन्होंने राजमहल के सुख छोड़कर अपने पति श्रीराम का अनुसरण करते हुए वनवास स्वीकार किया था।
प्रश्न 11. भरत ने चित्रकूट की प्रशंसा किस प्रकार की?
उत्तर: भरत ने कहा कि श्रीराम के निवास के कारण चित्रकूट अत्यंत पवित्र और मंगलकारी हो गया है, जैसे देवताओं का नन्दनवन।
प्रश्न 12. भरत ने वन को भी धन्य क्यों माना?
उत्तर: भरत ने वन को धन्य माना क्योंकि वहाँ शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, धर्मात्मा और महान श्रीराम निवास कर रहे थे।
प्रश्न 13. भरत ने शाल-वृक्ष पर चढ़कर क्या देखा?
उत्तर: भरत एक ऊँचे शाल-वृक्ष पर चढ़े और वहाँ से श्रीराम के आश्रम की दिशा में ऊपर उठता हुआ धुआँ देखा।
प्रश्न 14. धुआँ देखकर भरत और शत्रुघ्न को कैसा अनुभव हुआ?
उत्तर: धुआँ देखकर दोनों अत्यंत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें विश्वास हो गया कि श्रीराम का आश्रम पास ही है और अब शीघ्र उनके दर्शन होंगे।
प्रश्न 15. धुआँ देखकर भरत को किस प्रकार का संतोष मिला?
उत्तर: धुआँ देखकर भरत को ऐसा संतोष मिला जैसे कोई व्यक्ति अथाह जलराशि को पार करके सुरक्षित किनारे पहुँच गया हो।
प्रश्न 16. आश्रम दिखाई देने के बाद भरत ने सेना को कहाँ रोका?
उत्तर: आश्रम दिखाई देने के बाद भरत ने खोजने के लिए आई विशाल सेना को वहीं पहले के स्थान पर रोक दिया और स्वयं आगे बढ़े।
प्रश्न 17. भरत आश्रम की ओर किनके साथ गए?
उत्तर: भरत निषादराज गुह के साथ शीघ्रता से श्रीराम के आश्रम की ओर चल पड़े, क्योंकि उनके हृदय में मिलने की तीव्र उत्कंठा थी।
प्रश्न 18. भरत के हृदय में उस समय कौन-कौन से भाव थे?
उत्तर: भरत के हृदय में श्रीराम से मिलने की खुशी, लंबे विरह की पीड़ा, प्रेम, उत्सुकता और उन्हें अयोध्या वापस लाने की आशा उमड़ रही थी।