Best Historical and Knowledgeable Content here... Know More.

  • +91 8005792734

    Contact Us

  • amita2903.aa@gmail.com

    Support Email

  • Jhunjhunu, Rajasthan

    Address

भरत पर टूटा वज्र — पिता के वियोग का असहनीय समाचार

(72A)

भरत पर टूटा वज्र — पिता के वियोग का असहनीय समाचार

अयोध्या लौटने के बाद भरत के मन में सबसे पहले अपने पिता महाराज दशरथ से मिलने की तीव्र इच्छा जागी। उन्होंने राजमहल के अनेक कक्षों में दृष्टि दौड़ाई, परन्तु कहीं भी महाराज दिखाई नहीं दिए। उन्हें यह बात अत्यन्त विचित्र लगी। वे सीधे अपनी माता कैकेयी के महल की ओर चल पड़े, यह सोचकर कि संभवतः महाराज वहीं होंगे।

उधर कैकेयी अपने पुत्र के आगमन का समाचार सुनते ही प्रसन्नता से भर उठी। अनेक दिनों बाद अपने प्रिय पुत्र को सामने देखकर वह स्वर्णमय सिंहासन से तुरंत उठ खड़ी हुई। उसके चेहरे पर उत्साह और संतोष स्पष्ट झलक रहा था। उसे विश्वास था कि अब उसकी सारी योजनाएँ सफल हो चुकी हैं और भरत उसके निर्णयों की प्रशंसा करेगा।

भरत ने महल में प्रवेश किया तो उनके मन में एक अनजाना भय जाग उठा। महल में वह रौनक नहीं थी जो पहले हुआ करती थी। न कहीं वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि थी, न सेवकों के प्रसन्न मुख दिखाई दे रहे थे। वातावरण में एक अजीब-सी उदासी और शून्यता फैली हुई थी। फिर भी उन्होंने आदरपूर्वक अपनी माता के चरण स्पर्श किए।

कैकेयी ने बड़े स्नेह से भरत को अपनी बाँहों में भर लिया। उसने उनके मस्तक को सूँघकर मातृस्नेह प्रकट किया और उन्हें अपने पास बैठा लिया। उसके स्वर में अपार प्रेम था। उसने मुस्कराकर पूछा, “बेटा, तुम्हें ननिहाल से चले कितने दिन हो गए? तुम तो बहुत शीघ्र आ गए। कहीं यात्रा में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ? तुम्हारे नानाजी कुशल से हैं न? तुम्हारे मामा युधाजित स्वस्थ हैं? वहाँ सब लोग सुखी हैं न? मुझे सब विस्तार से बताओ।”

भरत ने विनम्रता से माता के सभी प्रश्नों का उत्तर दिया। उन्होंने बताया कि ननिहाल से चले उन्हें सात रातें बीत चुकी हैं। नाना और मामा दोनों पूर्णतः स्वस्थ हैं। उन्होंने यह भी कहा कि केकय-नरेश ने उन्हें बहुत-से बहुमूल्य रत्न, धन और उपहार दिए थे। उन उपहारों का भार इतना अधिक था कि साथ चलने वाले रथ और वाहन धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। किंतु अयोध्या से आए राजदूत अत्यन्त शीघ्र लौटने का आग्रह कर रहे थे, इसलिए वे उन सबसे पहले ही निकल आए।

अपनी बातें समाप्त करने के बाद भरत ने चारों ओर दृष्टि डाली। उनके मन की शंका अब और गहरी हो चुकी थी। उन्होंने देखा कि जिस सुवर्णमय शय्या पर प्रायः महाराज दशरथ विश्राम करते थे, वह आज पूरी तरह खाली पड़ी है। उसके चारों ओर भी एक अजीब-सी वीरानी छाई हुई थी।

भरत ने आश्चर्य से पूछा, “माँ, आज यह शय्या सूनी क्यों है? पिताजी कहाँ हैं? महल के सेवकों और परिजनों के चेहरे इतने उदास क्यों हैं? वे तो अधिकतर यहीं रहते थे। मैं तो विशेष रूप से उनके दर्शन करने आया हूँ। कृपया बताइए, वे कहाँ हैं? क्या वे बड़ी माता कौसल्या के महल में हैं? मैं तुरंत जाकर उनके चरण स्पर्श करना चाहता हूँ।”

भरत के इन सरल और प्रेमभरे प्रश्नों को सुनकर भी कैकेयी का हृदय नहीं पिघला। राज्य प्राप्ति की इच्छा ने उसकी करुणा को ढक लिया था। उसे यह भी आभास नहीं था कि अगले ही क्षण उसके शब्द उसके पुत्र के जीवन का सबसे बड़ा आघात बन जाएँगे।

वह बिना किसी भूमिका के शांत स्वर में बोली, “बेटा, तुम्हारे पिता महान् राजा थे। वे धर्मात्मा, तेजस्वी, यज्ञ करने वाले और समस्त प्राणियों के हितैषी थे। किंतु इस संसार में जो गति सभी जीवों की होती है, वही गति उन्हें भी प्राप्त हो गई। अब वे इस संसार में नहीं रहे।”

यह सुनते ही भरत के पैरों तले की धरती खिसक गई। ऐसा लगा मानो किसी ने उनके हृदय पर वज्र प्रहार कर दिया हो। उनकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। वे संतुलन खो बैठे और जोर से भूमि पर गिर पड़े। उनके मुख से केवल एक ही करुण पुकार निकली—“हाय! मैं नष्ट हो गया…!”

वे बार-बार अपनी भुजाएँ भूमि पर पटकने लगे। उनका शरीर काँप रहा था। वे कभी धरती पर लोटते, कभी छाती पीटते, तो कभी दोनों हाथों से सिर पकड़कर फूट-फूटकर रो पड़ते। उनका धैर्य, उनका साहस और उनका संयम सब एक ही क्षण में टूट गया।

उनकी चेतना मानो शोक के अथाह सागर में डूब गई। उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। उनके मन में केवल अपने पिता की स्मृतियाँ उमड़ रही थीं। वे बार-बार विलाप करते हुए कहने लगे, “पिताजी… आपने मुझे अंतिम बार भी नहीं बुलाया… मैं आपके चरणों में उपस्थित भी न हो सका…”

कुछ देर बाद उन्होंने उस शय्या की ओर देखा जहाँ कभी महाराज दशरथ विश्राम किया करते थे। उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। वे करुण स्वर में बोले, “यही शय्या पहले ऐसी शोभा देती थी जैसे शरद पूर्णिमा की चाँदनी से आलोकित निर्मल आकाश। पिताजी के तेज और उनकी उपस्थिति से यह स्थान जीवंत रहता था। पर आज यही शय्या ऐसे लग रही है जैसे चन्द्रमा के बिना आकाश और जल के बिना समुद्र। इसकी सारी शोभा समाप्त हो गई है।”

भरत ने अपने वस्त्र से अपना मुख ढक लिया। वे चाहते थे कि कोई उनके हृदय की टूटन न देख सके, किंतु आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उनके कंठ से सिसकियाँ निकल रही थीं। वे असहाय होकर भूमि पर पड़े रहे और मन ही मन अपने पिता की स्मृतियों में डूबकर विलाप करते रहे।

उनकी दशा ऐसी थी जैसे किसी विशाल साखू वृक्ष को तेज कुल्हाड़ी से काट दिया गया हो। जो राजकुमार सदैव पराक्रम, तेज और धैर्य का प्रतीक था, वही आज शोक के भार से धरती पर निढाल पड़ा था। उनका तेजस्वी मुख आँसुओं से भीग चुका था और उनका हृदय असहनीय वेदना से भर गया था।

यह दृश्य देखकर भी कैकेयी का मन नहीं बदला। उसने भरत को उठाने का प्रयास करते हुए कहा, “उठो पुत्र! तुम महान् कुल के राजकुमार हो। इस प्रकार धरती पर पड़े रहना तुम्हें शोभा नहीं देता। बुद्धिमान और वीर पुरुष अधिक समय तक शोक में नहीं डूबते। तुम्हारी बुद्धि स्थिर है। तुम धर्म, दान और यज्ञ के अधिकारी हो। अपने धैर्य को मत खोओ।”

परन्तु उस समय भरत के लिए ये शब्द किसी सांत्वना की तरह नहीं थे। वे अपने पिता के वियोग की पीड़ा में इतने डूब चुके थे कि संसार की कोई भी बात उनके हृदय को शांत नहीं कर सकती थी। वे बहुत देर तक भूमि पर पड़े रोते रहे। प्रत्येक आँसू उनके हृदय की असहनीय वेदना का साक्षी था।

धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं को सँभालने का प्रयास किया। उनके नेत्र लाल हो चुके थे, कंठ भर आया था और हृदय में असंख्य प्रश्न उमड़ रहे थे। अत्यन्त व्याकुल होकर उन्होंने अपनी माता की ओर देखा। अब वे केवल एक ही बात जानना चाहते थे—ऐसा कौन-सा अनर्थ हुआ जिसने उनके पिता के प्राण ले लिए और अयोध्या के इस आनंदमय राजमहल को शोक के अथाह सागर में डुबो दिया।