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“भागीरथ का तप और गंगा का अमर वरदान”
समुद्र की ओर बहती गंगा की पवित्र धारा के साथ-साथ एक राजऋषि समान तेजस्वी पुरुष आगे बढ़ रहे थे—राजा भगीरथ। वर्षों की तपस्या, अनगिनत कष्ट और अटूट संकल्प के बाद वे उस स्थान की ओर जा रहे थे जहाँ उनके पूर्वजों की भस्म पड़ी थी। उनके हृदय में एक ही भाव था—अपने पितरों का उद्धार।
गंगा की दिव्य धारा उनके रथ के पीछे-पीछे बहती हुई समुद्र तक पहुँची और वहाँ से पाताल के उस स्थान में प्रविष्ट हुई जहाँ राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की राख पड़ी थी। जैसे ही गंगा का पवित्र जल उस भस्म को स्पर्श करता है, मानो सदियों का अंधकार एक ही क्षण में मिट गया। वह स्थान, जो अब तक शोक और अधूरी प्रतिज्ञा का प्रतीक था, अचानक दिव्य प्रकाश से भर उठा।
उसी समय आकाश से एक अद्भुत प्रकाश प्रकट हुआ। देवताओं के स्वामी, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा स्वयं वहाँ पधारे। उनका तेज चारों ओर फैल गया। उन्होंने स्नेह और गर्व से भरे स्वर में भगीरथ से कहा—
“नरश्रेष्ठ! आज तुम्हारे प्रयास से वह कार्य पूर्ण हुआ है जो असम्भव प्रतीत होता था। महात्मा राजा सगर के साठ हजार पुत्र, जो अब तक भस्म होकर पड़े थे, तुम्हारी तपस्या और गंगा के पवित्र जल से मुक्त हो गए हैं। अब वे देवताओं के समान स्वर्गलोक में पहुँच चुके हैं।”
ब्रह्मा जी आगे बोले—
“भूपाल! जब तक इस पृथ्वी पर समुद्र का जल रहेगा, तब तक सगर के ये सभी पुत्र स्वर्ग में देवताओं के समान प्रतिष्ठित रहेंगे। तुम्हारा यह कार्य अनन्त काल तक स्मरण किया जाएगा।”
फिर उन्होंने गंगा की ओर देखकर कहा—
“हे राजन्! यह गंगा अब केवल स्वर्ग की नदी नहीं रही। यह तुम्हारी ज्येष्ठ पुत्री के समान मानी जाएगी। संसार इसे तुम्हारे नाम से ‘भागीरथी’ कहकर पुकारेगा। तुम्हारे संकल्प और तप ने इसे पृथ्वी पर लाया है, इसलिए तुम्हारा नाम सदैव इसके साथ जुड़ा रहेगा।”
ब्रह्मा जी ने गंगा के दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा—
“इस महान नदी के तीन नाम होंगे—त्रिपथगा, दिव्या और भागीरथी। यह आकाश, पृथ्वी और पाताल—तीनों मार्गों से होकर बहती है। जहाँ-जहाँ यह प्रवाहित होती है, वहाँ-वहाँ पवित्रता और जीवन का संचार करती है। इसी कारण इसे त्रिपथगा कहा जाएगा।”
फिर उन्होंने प्रेमपूर्वक भगीरथ को आदेश दिया—
“राजन्! अब इस पवित्र जल से अपने सभी पितामहों का तर्पण करो। जिस प्रतिज्ञा के लिए तुमने इतना कठोर तप किया, आज वह पूर्ण हो चुकी है। तुम्हारे पूर्वजों की आत्माएँ तुम्हारे इस कार्य से संतुष्ट और प्रसन्न होंगी।”
इसके बाद ब्रह्मा जी ने अतीत की स्मृति दिलाई—
“तुम्हारे महान पूर्वज, धर्मात्मा और यशस्वी राजा सगर भी चाहते थे कि गंगा पृथ्वी पर आए और उनके पुत्रों का उद्धार करे। परंतु उनका यह स्वप्न अधूरा रह गया।”
उन्होंने आगे कहा—
“तुम्हारे पितामह अंशुमान भी असाधारण तेजस्वी, धर्मपरायण और महान तपस्वी थे। उन्होंने भी यही इच्छा की थी कि गंगा पृथ्वी पर आए। उन्होंने भी प्रयास किया, परंतु वे इस प्रतिज्ञा को पूर्ण नहीं कर सके।”
ब्रह्मा जी ने भगीरथ के पिता को याद करते हुए कहा—
“तुम्हारे पिता दिलीप भी अत्यंत तेजस्वी और पुण्यात्मा थे। उन्होंने भी गंगा को पृथ्वी पर लाने का निश्चय किया था, परन्तु भाग्य ने उन्हें वह अवसर नहीं दिया। उनका भी यह संकल्प अधूरा ही रह गया।”
फिर उन्होंने गर्व से भरे स्वर में कहा—
“लेकिन आज तुमने वह असम्भव कार्य कर दिखाया है। गंगा को पृथ्वी पर लाकर तुमने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दी है। इस महान कार्य से तुम्हें संसार में अमर यश प्राप्त होगा।”
ब्रह्मा जी ने भगीरथ को एक और महान आशीर्वाद दिया—
“तुमने जो कार्य किया है, उससे तुम उस महान ब्रह्मलोक के अधिकारी बन गए हो जो धर्म का परम आश्रय है। यह उपलब्धि बहुत दुर्लभ है।”
उन्होंने आगे कहा—
“गंगा का यह जल सदा ही पवित्र और स्नान के योग्य है। तुम भी इसमें स्नान करो और स्वयं को पवित्र करके महान पुण्य प्राप्त करो।”
फिर ब्रह्मा जी ने स्नेहपूर्वक कहा—
“अब तुम अपने पितरों का विधिपूर्वक तर्पण करो। तुम्हारा कल्याण हो। मैं अब अपने लोक को लौटता हूँ और तुम भी अपनी राजधानी में लौटकर अपने राज्य का संचालन करो।”
इतना कहकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जैसे आए थे, वैसे ही दिव्य प्रकाश के साथ देवलोक को लौट गए।
राजा भगीरथ ने अत्यंत श्रद्धा और भाव से गंगा के पवित्र जल से अपने सभी पूर्वजों का तर्पण किया। उनके हृदय में अपार शांति और संतोष था। वर्षों का संकल्प आज पूर्ण हो चुका था। अपने पितरों को मुक्त देखकर उनका मन कृतज्ञता से भर उठा।
तर्पण के बाद वे अपने नगर की ओर लौटे। जब प्रजाजनों ने अपने प्रिय राजा को फिर से सामने देखा तो पूरे राज्य में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। जो शोक और चिंता इतने दिनों से छायी हुई थी, वह पलभर में समाप्त हो गई। लोगों के मन में यह विश्वास जाग उठा कि उनका राजा केवल शक्तिशाली ही नहीं, बल्कि धर्म और संकल्प का सच्चा प्रतीक है।
तब महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम से प्रेमपूर्वक कहा—
“हे राम! यह गंगा के अवतरण की पवित्र कथा मैंने तुम्हें विस्तार से सुनाई। अब संध्याकाल हो चला है। जाओ और अपने संध्यावन्दन जैसे मंगलमय कार्यों का पालन करो।”
फिर उन्होंने इस कथा की महिमा बताते हुए कहा—
“यह गंगावतरण का पवित्र उपाख्यान अत्यंत मंगलमय है। इसे सुनने और सुनाने से आयु बढ़ती है, धन और यश की प्राप्ति होती है, संतान का सुख मिलता है और अंत में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इसे श्रद्धा से सुनाता है, उस पर देवता और पितर दोनों प्रसन्न होते हैं।”
अंत में उन्होंने कहा—
“जो मनुष्य श्रद्धा से इस कथा का श्रवण करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। उसके पाप नष्ट हो जाते हैं, उसकी आयु बढ़ती है और उसका यश संसार में फैलता है।”
इस प्रकार भगीरथ का तप, गंगा का अवतरण और पूर्वजों का उद्धार—यह कथा केवल एक राजा की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस अटूट संकल्प की अमर गाथा है जो मानव को देवताओं के समान महान बना देती है।