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मंगलाचरण — श्रद्धा, ज्ञान और आदर्शों का वंदन
हे अन्तर्यामी श्रीहरि, तुमको शत-शत वन्दन है,
कण-कण में जो व्याप्त सदा, तुम ही जीवन-चन्दन हो।
तुमसे ही यह सृष्टि सजे, तुमसे जग का पालन है,
तुमसे ही हर प्राण प्रकाशित, तुमसे ही स्पंदन है।
लोकमंगल के पथप्रदर्शक, श्री अग्रसेन महान को,
त्याग, समता, सेवा-भाव के अमर दिव्य वरदान को।
जिनके जीवन की गाथाएँ, मानवता का मान बनीं,
परहित को ही स्वहित मानें, ऐसी उज्ज्वल शान बनीं।
वीणापाणि माँ सरस्वती को श्रद्धा से नमन करते हैं,
ज्ञान, विवेक और मधुर वाणी का पावन वर धरते हैं।
महर्षि व्यास को वन्दन है, जिनसे ज्ञान-प्रवाह बहा,
महर्षि जैमिनी को नमन, जिनसे इतिहास अमर रहा।
पूज्य महर्षि राम गोपाल बेदिल को कोटि प्रणाम करें,
“अग्र भागवत” जैसे ग्रंथ से जन-जन का कल्याण करें।
जिनकी लेखनी ने फिर से, आदर्शों को स्वर प्रदान किया,
अग्रसेन के दिव्य चरित को युग-युग तक सम्मान दिया।
श्रद्धा, विनय और भक्ति लिये, हम यह मंगल गान करें,
महापुरुषों के पावन पदचिह्नों का अनुसरण करें।
किसी भी पवित्र कथा का आरम्भ विनम्रता, श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ होता है। सर्वप्रथम हम भगवान् श्रीहरि को प्रणाम करते हैं, जो समस्त प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से विराजमान हैं और सम्पूर्ण सृष्टि के पालनकर्ता हैं।
इसके पश्चात् हम उन महान पुरुषों को नमन करते हैं, जिनका जीवन सम्पूर्ण मानव समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनमें महाराजा श्री अग्रसेन का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उनका जीवन त्याग, परोपकार, समता और लोकमंगल का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है।
हम ज्ञान, विवेक और वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को श्रद्धापूर्वक वंदन करते हैं, जिनकी कृपा से मनुष्य सत्य को समझने और उसे प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त करने की क्षमता प्राप्त करता है।
हम महर्षि व्यास और उनके परम शिष्य महर्षि जैमिनी को सादर नमस्कार करते हैं, जिन्होंने धर्म, इतिहास और जीवन-मूल्यों को अपनी अमूल्य वाणी और ज्ञान के माध्यम से युगों-युगों तक सुरक्षित रखा।
साथ ही, हम पूज्य महर्षि राम गोपाल बेदिलजी को भी श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं, जिन्होंने “अग्र भागवत” जैसे पावन, प्रेरणादायी और लोककल्याणकारी ग्रंथ की रचना करके महाराजा श्री अग्रसेन के दिव्य जीवन, आदर्शों और मानवता के लिए उनके अनुपम योगदान को जन-जन तक पहुँचाया।
यह मंगलाचरण हमें सिखाता है कि किसी भी ज्ञानयात्रा का आरम्भ अहंकार से नहीं, बल्कि श्रद्धा, विनम्रता, गुरु-परंपरा के सम्मान और महापुरुषों के आदर्शों के स्मरण से करना चाहिए।