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(8)
मन्थरा का विष और कैकेयी का डगमगाता हृदय
अयोध्या के राजमहल में उस दिन उत्सव का वातावरण था। चारों ओर प्रसन्नता की लहरें दौड़ रही थीं, क्योंकि महाराज दशरथ ने अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम के अभिषेक का निर्णय लिया था।
किन्तु इस आनंद के बीच, एक अशुभ छाया धीरे-धीरे बढ़ रही थी—मन्थरा।
जब मन्थरा ने यह समाचार सुना, तो उसके भीतर ईर्ष्या की आग भड़क उठी। वह क्रोध से भरी कैकेयी के पास पहुँची। कैकेयी ने प्रसन्न होकर उसे आभूषण देना चाहा, परंतु मन्थरा ने उन्हें झटककर फेंक दिया। उसके इस व्यवहार में गहरा असंतोष और रोष था—मानो वह कह रही हो कि यह प्रसन्नता व्यर्थ है।
वह कटु स्वर में बोली—“रानी! तुम कितनी नादान हो। जहाँ तुम्हें शोक करना चाहिए, वहाँ तुम हर्ष मना रही हो। तुम तो दुःख के गहरे समुद्र में डूब रही हो, फिर भी तुम्हें अपनी स्थिति का ज्ञान नहीं है।”
उसकी बातों में केवल आलोचना नहीं, बल्कि भय का बीज छिपा था। वह आगे बोली—“जब कोई बड़ा संकट सामने हो, तब प्रसन्नता नहीं, चिंता करनी चाहिए। तुम्हारी यह अवस्था देखकर मुझे स्वयं पीड़ा हो रही है।”
फिर उसने सीधे कैकेयी के मन पर प्रहार किया—“तुम्हारी सबसे बड़ी भूल यह है कि तुम सौतेले संबंधों को समझ नहीं रही हो। सौत का पुत्र शत्रु होता है। जो स्त्री अपने सौतेले पुत्र के उत्थान पर प्रसन्न होती है, वह अपनी ही हानि करती है।”
अब मन्थरा ने राजनीति का तर्क दिया—“यह राज्य राम और भरत दोनों का है। परंतु इसी कारण राम को भरत से भय है। जो आज भयभीत है, वही शक्ति पाकर अपने भय के कारण को नष्ट कर देता है। इसलिए मुझे डर है कि राम राजा बनकर भरत को हटाने का प्रयास करेंगे।”
वह आगे समझाने लगी—“लक्ष्मण पूरी तरह राम के साथ हैं और शत्रुघ्न भरत के। पर अंतर यह है कि लक्ष्मण राम के पास हैं, उनकी शक्ति हैं; जबकि भरत दूर हैं, अकेले हैं।”
उसने जन्मक्रम का तर्क रखते हुए कहा—“राम के बाद भरत का अधिकार है। इसलिए राम के मन में भरत को लेकर भय होना स्वाभाविक है।”
अब उसने राम के गुणों को ही भय का कारण बना दिया—“राम शास्त्रज्ञ हैं, राजनीति में निपुण हैं और समय के अनुसार कार्य करना जानते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने मार्ग की बाधा को हटाने में संकोच नहीं करते।”
इसके बाद उसने भविष्य का एक भयावह चित्र खींचा—“कल जब राम का अभिषेक होगा, तब कौसल्या सबसे अधिक भाग्यशाली होंगी। वे राज्य की स्वामिनी बनेंगी और तुम उनकी दासी बनकर रह जाओगी।”
उसने बात को और तीखा किया—“तुम ही नहीं, तुम्हारा पुत्र भरत भी राम की सेवा करेगा। तुम्हारा पूरा परिवार उनके अधीन हो जाएगा।”
“राम के महल की स्त्रियाँ प्रसन्न होंगी, और भरत की पत्नियाँ दुःख में डूब जाएँगी”—मन्थरा ने यह कहकर कैकेयी के मन को और विचलित कर दिया।
अब तक मन्थरा लगातार भय और भ्रम का जाल बुन रही थी। परंतु कैकेयी का हृदय अभी भी निर्मल था।
उन्होंने शांत स्वर में उत्तर दिया—“राम धर्मज्ञ हैं, सत्यवादी हैं, कृतज्ञ हैं और योग्य हैं। वे ही युवराज बनने के अधिकारी हैं।”
उन्होंने विश्वास से कहा—“वे अपने भाइयों का पालन पिता के समान करेंगे। मुझे उनके अभिषेक से कोई दुःख नहीं है।”
फिर उन्होंने मन्थरा को समझाया—“राम मेरे लिए भरत से भी अधिक प्रिय हैं। वे मेरी सेवा अत्यंत प्रेम से करते हैं।”
“यदि राम को राज्य मिल रहा है, तो समझो भरत को ही मिल रहा है”—उन्होंने दृढ़ता से कहा—“क्योंकि राम अपने भाइयों को अपने समान मानते हैं।”
लेकिन मन्थरा अभी रुकी नहीं।
वह गहरी साँस लेकर बोली—“रानी, तुम मूर्खता में अनर्थ को ही अर्थ समझ रही हो। तुम उस दुःख के महासागर में डूब रही हो, जिसका तुम्हें अभी आभास भी नहीं है।”
अब उसने एक नया तर्क दिया—“जब राम राजा बनेंगे, तो उनके बाद उनका पुत्र ही राज्य पाएगा। भरत का अधिकार सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।”
“राजा के सभी पुत्र सिंहासन पर नहीं बैठते”—उसने कहा—“यदि ऐसा हो, तो राज्य में अराजकता फैल जाएगी। इसलिए केवल एक ही उत्तराधिकारी होता है।”
फिर उसने कैकेयी के मातृत्व को झकझोरा—“तुम्हारा पुत्र राज्य से दूर कर दिया जाएगा। वह अनाथ की तरह जीवन बिताएगा और सभी सुखों से वंचित हो जाएगा।”
अब मन्थरा के शब्द और भी कठोर हो गए—“मैं तुम्हारे हित के लिए कह रही हूँ, पर तुम समझ नहीं रही हो। उलटे तुम मुझे इनाम दे रही हो!”
फिर उसने सबसे बड़ा भय प्रस्तुत किया—“यदि राम को निष्कंटक राज्य मिल गया, तो वे भरत को देश से निकाल देंगे या उसका अंत कर देंगे।”
अब उसने अतीत की ओर संकेत किया—“तुमने भरत को बचपन में ही दूर भेज दिया। यदि वह यहाँ होता, तो राजा का स्नेह उसे भी मिलता और उसे भी राज्य का हिस्सा मिल सकता था।”
“शत्रुघ्न भी भरत के साथ चले गए”—उसने कहा—“यदि वे यहाँ होते, तो स्थिति अलग होती। जैसे लक्ष्मण राम के साथ हैं, वैसे ही शत्रुघ्न भरत के साथ होते।”
फिर मन्थरा ने एक उदाहरण दिया—“जैसे कँटीली झाड़ियाँ किसी वृक्ष को काटे जाने से बचा लेती हैं, वैसे ही पास रहने वाले ही रक्षा करते हैं। भरत दूर है, इसलिए असहाय है।”
उसने राम और लक्ष्मण के प्रेम का उल्लेख किया—“वे एक-दूसरे की रक्षा करते हैं, इसलिए कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
और फिर उसने निष्कर्ष दिया—“राम लक्ष्मण का कभी अनिष्ट नहीं करेंगे, परंतु भरत का अनिष्ट निश्चित है।”
अब मन्थरा ने अपने षड्यंत्र का खुला प्रस्ताव रखा—“इसलिए मेरा विचार है कि राम को महल से सीधे वन भेज दिया जाए—इसी में तुम्हारा और भरत का भला है।”
“यदि भरत को राज्य मिल जाए, तो तुम्हारा और तुम्हारे पक्ष का कल्याण होगा”—उसने जोड़ा।
उसने एक मार्मिक चित्र खींचा—“सोचो, तुम्हारा बालक भरत, जो सुख भोगने योग्य है, वह राम के अधीन होकर कैसे जीवित रहेगा?”
फिर उसने एक उपमा दी—“जैसे सिंह हाथी के समूह पर आक्रमण करता है, वैसे ही राम भरत का तिरस्कार करेंगे। इसलिए अभी से उसकी रक्षा करो।”
उसने कैकेयी के अहंकार को भी छेड़ा—“तुमने कभी कौसल्या का अपमान किया था। अब जब उनका पुत्र राजा बनेगा, तो वे इसका बदला लेंगी।”
अंततः उसने अंतिम और निर्णायक भय दिखाया—“जब राम पूरे पृथ्वी पर राज्य करेंगे, तब तुम और भरत दीन-हीन हो जाओगे।”
और अंत में उसने स्पष्ट शब्दों में कहा—
“यदि तुम अपने पुत्र को बचाना चाहती हो, तो ऐसा उपाय करो कि भरत को राज्य मिले और राम को वनवास।”
अब कैकेयी का हृदय पूरी तरह विचलित हो चुका था।
एक ओर राम का प्रेम…
दूसरी ओर भरत का भविष्य…
मन्थरा के शब्द अब केवल शब्द नहीं रहे थे—वे एक तूफान बन चुके थे, जिसने एक माँ के हृदय को भीतर से हिला दिया।
और यहीं से आरंभ हुई वह कथा… जिसने आगे चलकर रामायण को उसका सबसे मार्मिक मोड़ दिया।