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“महर्षि वसिष्ठ का दिव्य आतिथ्य और विश्वामित्र का आदर”

 

घने वन के मध्य स्थित शांत और पवित्र आश्रम में महान तपस्वी वसिष्ठ अपने शिष्यों के साथ तप, जप और यज्ञ में लगे रहते थे। उस आश्रम का वातावरण अत्यन्त दिव्य और शांत था। चारों ओर हरे-भरे वृक्ष, लताओं से सजे हुए कुंज, मधुर पक्षियों की चहचहाहट और यज्ञकुण्ड से उठती हुई पवित्र धूम्र-रेखाएँ उस स्थान को मानो स्वर्ग जैसा बना देती थीं।

 

इसी समय एक दिन महान पराक्रमी राजा विश्वामित्र अपनी विशाल सेना और सेवकों के साथ वन में विचरण करते हुए उसी आश्रम के समीप पहुँचे। जब उन्होंने दूर से ही तप में लीन महर्षि वसिष्ठ का तेजस्वी स्वरूप देखा, तो उनका हृदय श्रद्धा और सम्मान से भर उठा। यद्यपि वे स्वयं एक महान राजा और अत्यन्त पराक्रमी थे, फिर भी ऋषियों के प्रति उनके मन में गहरी विनम्रता थी।

 

विश्वामित्र तुरंत अपने रथ से उतर पड़े। उनके मन में ऐसा लगा जैसे वे किसी दिव्य शक्ति के सामने खड़े हों। वे धीरे-धीरे आगे बढ़े और अत्यन्त विनय और आदर के साथ महर्षि वसिष्ठ के चरणों में झुककर प्रणाम किया। उनका यह विनम्र व्यवहार देखकर वहाँ उपस्थित सभी ऋषि और शिष्य भी प्रसन्न हो उठे।

 

महर्षि वसिष्ठ ने जब राजा विश्वामित्र को अपने चरणों में झुका हुआ देखा, तो उनके चेहरे पर करुणा और स्नेह से भरी मुस्कान फैल गई। उन्होंने बड़े प्रेम से कहा—

“राजन्! तुम्हारा यहाँ स्वागत है।”

 

उनकी वाणी में इतना स्नेह और आत्मीयता थी कि विश्वामित्र का मन प्रसन्न हो उठा। वसिष्ठ ने तुरंत अपने शिष्यों को संकेत किया और राजा के लिए आदरपूर्वक एक आसन बिछवाया। यह कोई साधारण आसन नहीं था, बल्कि आश्रम की मर्यादा के अनुसार अत्यन्त पवित्र और सम्मानजनक स्थान था।

 

राजा विश्वामित्र उस आसन पर बैठ गये। उनके मन में आश्चर्य भी था और आनंद भी। एक महान तपस्वी का यह विनम्र आतिथ्य उन्हें बहुत प्रिय लग रहा था। तब महर्षि वसिष्ठ ने अपने हाथों से उन्हें फल और मूल का उपहार दिया। आश्रम में जो कुछ भी उपलब्ध था, वही अत्यन्त प्रेम से उन्होंने राजा के सामने प्रस्तुत किया।

 

राजा विश्वामित्र ने उन फल-मूलों को बड़े आदर से स्वीकार किया। उनके मन में यह भाव आया कि सच्चा सत्कार वैभव से नहीं, बल्कि हृदय के प्रेम से होता है।

 

कुछ समय बाद विश्वामित्र ने महर्षि वसिष्ठ से आश्रम की कुशलता पूछी। उन्होंने बड़े आदर के साथ कहा—

“भगवन्! आपके तप, आपके अग्निहोत्र, आपके शिष्यों तथा इस सुंदर आश्रम के वृक्ष-लताओं का सब कुशल है न?”

 

राजा की यह विनम्र जिज्ञासा सुनकर वसिष्ठ अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने मुस्कराकर उत्तर दिया कि सब कुछ ठीक है और आश्रम में सब लोग सुखपूर्वक रह रहे हैं।

 

इसके बाद महर्षि वसिष्ठ ने भी राजा विश्वामित्र की कुशलता पूछनी प्रारम्भ की। वे बोले—

“राजन्! क्या तुम स्वस्थ और प्रसन्न हो? क्या तुम धर्म के अनुसार अपनी प्रजा का पालन करते हो? क्या तुम्हारी प्रजा तुम्हारे राज्य में सुखी है?”

 

उनकी वाणी में केवल औपचारिकता नहीं थी, बल्कि एक ऋषि का सच्चा स्नेह और चिंता थी।

 

फिर उन्होंने आगे पूछा—

“क्या तुम्हारे सेवक तुम्हारी आज्ञा का पालन करते हैं? क्या उनका उचित भरण-पोषण हो रहा है? क्या तुमने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली है?”

 

वसिष्ठ की यह पूछताछ एक गुरु की तरह थी, जो केवल बाहरी वैभव नहीं बल्कि राज्य के धर्म और व्यवस्था की भी चिंता करता है।

 

उन्होंने फिर कहा—

“हे वीर नरेश! तुम्हारी सेना, तुम्हारा खजाना, तुम्हारे मित्र और तुम्हारे पुत्र-पौत्र—क्या सब कुशल हैं?”

 

इन प्रश्नों में एक गहरा भाव था। वे यह जानना चाहते थे कि राजा अपने कर्तव्यों का पालन ठीक प्रकार से कर रहा है या नहीं।

 

राजा विश्वामित्र ने अत्यन्त विनम्रता से उत्तर दिया—

“भगवन्! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुछ कुशल है। सब लोग सुखी हैं और राज्य में शांति है।”

 

इसके बाद दोनों महान पुरुष—एक महान राजा और एक महान ऋषि—बहुत देर तक आपस में प्रेमपूर्वक बातचीत करते रहे। उनके बीच का संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि दो महान आत्माओं का मिलन था। धीरे-धीरे उनके बीच गहरा स्नेह और सम्मान उत्पन्न हो गया।

 

कुछ समय बाद महर्षि वसिष्ठ ने हँसते हुए बड़े प्रेम से कहा—

“महाबली नरेश! तुम्हारा प्रभाव बहुत महान है। तुम अपनी पूरी सेना के साथ यहाँ आये हो। मैं तुम्हारा और तुम्हारी सेना का उचित आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ। कृपया मेरे इस निवेदन को स्वीकार करो।”

 

उन्होंने आगे कहा—

“राजन्! अतिथि का सत्कार करना हमारा कर्तव्य है, और तुम तो महान अतिथि हो। इसलिए कृपया मेरे द्वारा किया गया यह सत्कार स्वीकार करो।”

 

राजा विश्वामित्र यह सुनकर थोड़ा संकोच में पड़ गये। उन्होंने विनम्रता से उत्तर दिया—

“मुने! आपके मधुर और सम्मानपूर्ण वचनों से ही मेरा पूर्ण सत्कार हो गया। इससे अधिक मुझे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है।”

 

उन्होंने आगे कहा—

“आपके आश्रम में जो फल-मूल, पाद्य और आचमन का जल मिला, उससे मेरा पूरा सम्मान हो चुका है। और सबसे बड़ा सम्मान तो आपका दर्शन ही है। आपके दर्शन से ही मेरी पूजा हो गयी।”

 

विश्वामित्र के ये शब्द अत्यन्त विनम्र और श्रद्धा से भरे हुए थे।

 

उन्होंने आगे कहा—

“महाज्ञानी महर्षे! आप मेरे पूजनीय हैं। फिर भी आपने मेरा इतना आदर किया—इसके लिए मैं आपको प्रणाम करता हूँ। अब मैं यहाँ से प्रस्थान करना चाहता हूँ।”

 

लेकिन महर्षि वसिष्ठ इतने सरल और उदार हृदय के थे कि उन्होंने बार-बार आग्रह किया कि राजा उनका आतिथ्य अवश्य स्वीकार करें। उनके मन में यह दृढ़ निश्चय था कि वे अपने अतिथि को बिना पूर्ण सत्कार के नहीं जाने देंगे।

 

अन्ततः विश्वामित्र ने मुस्कराकर कहा—

“ठीक है मुनिवर! मैं आपकी आज्ञा स्वीकार करता हूँ। आप जो उचित समझें और जो आपको प्रिय लगे, वही करें।”

 

यह सुनकर महर्षि वसिष्ठ बहुत प्रसन्न हुए। उनके चेहरे पर आनंद की चमक आ गयी। उन्होंने तुरंत अपनी दिव्य गौ को बुलाया। वह कोई साधारण गाय नहीं थी—वह थी दिव्य कामधेनु, जिसे शबला भी कहा जाता था।

 

महर्षि वसिष्ठ ने उसे पुकारकर कहा—

“हे शबले! शीघ्र आओ। सुनो, आज हमारे आश्रम में राजा विश्वामित्र अपनी सेना के साथ अतिथि बनकर आये हैं। मैं उनका उत्तम भोजन और सत्कार करना चाहता हूँ। इसलिए तुम मेरे इस संकल्प को सफल करो।”

 

फिर उन्होंने आदेश दिया—

“षड्रस से युक्त सभी प्रकार के स्वादिष्ट भोजन तैयार करो। जिसको जो पसंद हो, वही वस्तु उसे प्राप्त हो। हे दिव्य कामधेनु! आज इन अतिथियों के लिए इच्छित वस्तुओं की वर्षा कर दो।”

 

महर्षि वसिष्ठ की वाणी सुनते ही शबला मानो चमत्कार करने लगी। उन्होंने आगे कहा—

“सरस अन्न, पेय पदार्थ, चटनी, मिठाइयाँ और चूसने योग्य स्वादिष्ट वस्तुएँ—सबकी भरपूर व्यवस्था कर दो। भाँति-भाँति के व्यंजन बनाकर यहाँ ढेर लगा दो। जो भी आवश्यक वस्तु हो, सब उत्पन्न कर दो। शीघ्र करो, विलम्ब न होने पाए।”

 

इस प्रकार उस शांत आश्रम में एक अद्भुत और दिव्य अतिथि-सत्कार की तैयारी आरम्भ हो गई, जिसे देखकर शीघ्र ही राजा विश्वामित्र और उनकी सेना आश्चर्य से भर उठने वाली थी।