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द्वितीय स्कंध
-श्लोक-
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः
-भावार्थ-
कृष्ण वासुदेव हरि परमात्मा जिनके नाम है प्रणाम करने से जो समस्त दुःखों का नाश करने वाले हैं उन गोविन्द को मैं नमस्कार करता हूँ
-दोहा-
बंदऊं रामपद पदकमल, हृदय में धर कर ध्यान
सूर्यवंशी अग्रसेन का, चरित करूं गुणगान —7
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
बल्लभसेन सकल गुणकारी, सकल पृथ्वी पर कीर्ति भारी
राजसभा में बड़ा था मान, सब झुक झुक कर करे प्रणाम
जय जयकार करहिं सब कोई, आदर मान बहुत नृप सोहहिं
एक दिवस राजा मन माहि, भई गिलानी मोरै सुत नाहिं
संतन को घर में बुलवाया, आदर मान देत सिर नाया
आये बड़े बड़े नर ज्ञानी, आशीर्वाद दिया मही दानी
संतन को ऊपर बैठाया, पाय धोय जल शीश चढ़ाया
फलाहार निज हाथ कराई, चंवर ढुलाई राज गोसाईं
हाथ जोड़ संतन के आगे, राजा बोले रानी सागे
-दोहा-
महाराज विनती करहूं, हाथ जोड़ सन्मान
मोरे मनोरथ पूर्ण करो, आप हैं सकल निधान —8
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
राजा की सुन सुन्दर वाणी, बोले संत त्रिकाल के ज्ञानी
राजन मन में हर्ष बढ़ाओ, हमरी बात ध्यान में लाओ
ईश्वर की कृपा है भारी, सब ओर कीर्ति बढे तुम्हारी
ऐसा पुत्र तुम्हारे होगा, जग में नाम अमर कर देगा
सब विधि सुन्दर सब विधि लायक, महालक्ष्मी का परम हो पायक
सत्यवचन प्रण धारण वाला, तुमरे कुल को तारण वाला
-दोहा-
ऐसा आशीर्वाद देय, ब्राह्मण हुए विदाय
राजा रानी हर्ष से, करें ईश सेवकाय—9
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
राजा रानी प्रसन्न हो गए, सुन्दर सपनों में वे खो गये
घर में एक नन्हा आएगा, किलकारी से गूंजाएगा
हरजन का वो प्यारा होगा, सुन्दर सलौना न्यारा होगा
कुल का नाम उजागर होगा, सूर्यवंश का तारा होगा
सत्य व्रत का पालन हारा, ऐसा राज दुलारा होगा
राजा रानी को समुझावे, नेम धर्म की बात बतावे
अपने कुल की रीत समुझावे, पुरखों की बातां बतलावे
-दोहा-
समय बीत रहा नित प्रति, होवे शगुन महान
एक दिन दासी आय कर, सुन्दर वचन सुनाय—10 क
-सोरठा-
सुनकर सुन्दर बैन, रानी गर्भ की बात सुन
हृदय हर्ष अति छाय, राज प्रजा हर्षित भये—10 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
समाचार सुन प्रसन्न हो गए, बल्लभसेन विचार में खो गये
मन ही मन बिचारण लागे, पितृकृपा से भाग हैं जागे
दान दक्षिणा देते भारी, मन में रहते राम बिहारी
रानी भगवती अति हर्षाई, नेम व्रत में ध्यान लगाई
सीताराम को सदा मनावे, हनुमत को वह भोग लगावे
है यह सब विष्णु की माया, उनकी कृपा से ही सुख आया
-दोहा-
रानी यह विचार कर, पूर्ण आस विश्वास
करे हरी की आरती, मुख छाया उल्लास —11
-श्लोक-
कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानीसहितं नमामि
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे।।
जो ध्यावै फल पावर, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का।। ॐ जय।।
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी।। ॐ जय।।
तुम पूरन परमात्मा, तुम अन्तरयामी।।
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी।। ॐ जय ।।
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता।। ॐ जय।।
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय। तुमको मैं कुमति ।। ॐ जय।।
दीनबंधु दुहराता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे ।। ॐ जय ।।
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा ।। ॐ जय।।
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा ।। ॐ जय।।
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे ।। ॐ जय।।
-दोहा-
विनती सुनकर हुए प्रसन्न, जगत स्वामी स्वप्रकाश
मनवांछित वर दे दिया, हृदय में हुआ विश्वास —12
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
मन प्रसन्न तन तेज बिराजा, रानी का मुख मंडल साजा
होने लगे शगुन शुभ नाना, प्रकृति प्रसन्न राजा ने माना
महि देवन को तुरत बुलाया, भांति भांति का दान दिलाया
नौ महीने का समय बीत गया, राजा का धीरज भी छूट गया
दिन प्रति मन में ज्योति जगाई, कब प्रसन्न होंगे रघुराई
-दोहा-
आश्विन मास का शुक्ल पक्ष, प्रथम तिथि जब आय
रविवार का दिवस था, श्रेष्ठ काल सकलाय —13 क
-दोहा-
शुभ घड़ी नक्षत्र शुभ, हो रहे मंगलाचार
मातु गोद में आ गये, अग्रसेन सरकार —13 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपा दृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
कन्या लगन बना तेहि काला, उस पर सूर्य चंद्र उजियाला
हस्त बना नक्षत्र महान, गुरु पुष्य बोले विद्वान
बंदीजन गुणगान कर रहे, मागध कुल का गान कर रहे
हर्षित हो गए नर और नारी, माता ने भी छवि निहारी
-छंद-
भये प्रकट कृपाला दीन दयाला सत्य व्रत के धारी
हर्षित महतारी छवि निहारी जय जय लक्ष्मी पुजारी
महीजन में अग्रज, शुभ पद पंकज, जन जन के शुभकारी
भगवती के नंदन कोटि है वंदन तम को हरो सुखकारी
सत्य स्वरूप परम अनुपम सकल दिव्य गुणधारी
छवि निहारे सभी पुकारे तम को हरो शुभकारी
-दोहा-
ऋषिगण सब कहने लगे, बालक है यह महान
महालक्ष्मी की कृपा से, होगा कीर्तिवान —14 क
-दोहा-
दानशील व क्षमाशील, होगा अति धनवान
सत्य व्रत का पालनहारा, योद्धा होगा महान —14 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
राजा मन उमंग है भारी, दान मान की तुरत विचारी
ऋषि मुनि महीदेव बुलाए, पांव धोय ऊंचा बैठाये
आदर मान दिया बहुतेरा, सब मिलकर कर रहे हैं सेवा
रत्न आभूषण सोना चांदी, जो इच्छा दिया बहु भांति
नामकरण की रस्म कराई, पुरोहित की करी सेवकाई
अग्रसेन शुभ नाम बताया, जग प्रसिद्ध होगा समझाया
अग्र होगा शस्त्र-शास्त्र में, विद्वानों ने यह बतलाया
-दोहा-
विद्वानों के वचन सुन, हरषा राज समाज
सब मिलकर गाने लगे, हो बधाई महाराज —15
बधाई गीत
घर घर खुशियां छायी आज सब बांटो बधाई
प्रतापपुर में आनंद भयो है नाचे लोग लुगाई
आज सब बांटो बधाई....
सारे नगर में खुशियां छाई, बांटे सभी बधाई
आज सब बांटो बधाई....
बल्लभसेन जी के आनंद घणेरो मोतियन हार लुटाई
आज सब बांटो बधाई....
जूथ जूथ मिल चली नारियां सुन्दर गीत सुहाई
आज सब बांटो बधाई...
अग्रसेनजी के जन्मोत्सव पर प्रभू शरण यश गाई
आज सब बांटो बधाई....
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
आनंद कंद सकल गुणराशि, ज्ञान प्रकाश सकल सुखराशि
तेज पूंज मुख सुन्दर सोहा, राजा रानी सदा मन मोहा
बाललीला अनेक विधि करहिं, देख देख सब जन हरसतहिं
एहि भांति बीता एक साला, बहुत क्रीड़ा किन्हिं नृप लाला
समस्त प्रजा प्रसन्न बहु भांति, देख देख बालक हरषाती
जेहिं विधि सुखी होत सब लोगा, अग्रसेन वही करहिं संजोगा
देख देख प्रजा मन हरषहिं, अग्रसेन के दर्शन तरसहिं
अनेक बाल लीला दिखलाई, मात पिता के हर्ष उछाहिं
प्रतापपुर की महिमा भारी, सुन्दर नगरी अति सुखारी
पावन मंदिर सुन्दर धाम, नर नारी सब अति विद्वान
अग्रसेन सबका मन हरषहिं, सारी जनता दर्शन तरसहिं
सहज सौम्य सुन्दर सुखदायी, अग्रसेन सबके मन भायी
रंग सुनहरा तनिक ललाई, कैसे कहूं मनोहर ताई
-दोहा-
दिन बीते महीने गए, बीत गए हैं साल
पांच बरस के हो गए, अग्रसेन जी बाल —16
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
पांच बरस की अवस्था आयी, गुरु गृह जाने की मनलाई
महर्षि तांड्य अति विद्वान, ऋषियों में उनका सम्मान
उनका आश्रम अति सुखारी, रहते वहां अनेक ब्रह्मचारी
अग्रसेन जी पढ़ने लागे, वेद शास्त्र को रटने लागे
ज्ञानमयी उपदेश थे भारी, तांड्य ऋषि ज्ञान भंडारी
अग्रसेन गुरु सेवा में लागे, अहंकार से दूर वे भागे
शास्त्र अध्ययन किया मन लायी, शिक्षा से सिद्धि सब पाई
शस्त्र शास्त्र तलवार चलाना, उत्तम विद्या का पैमाना
-दोहा-
अग्रसेन थे अग्रगण्य, उनकी बुद्धि महान
एक बार गुरु जो बतलावे, करें हृदय में ध्यान —17 क
-दोहा-
बुद्धि बल एकाग्रता, गुरु चरणों में ध्यान
थोड़े समय में सब विद्या के, पंडित बने सुजान —17 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
चौदह वर्ष अवस्था आयी, वर्धापन दिवस मनाई
स्वस्तिवाचन होने लगे हैं, अग्रसेन मन मोह ने लगे हैं
एक दिन हुई अजब कहानी, सत्य धर्म विपरीत निशानी
कन्या एक तपस्विनी नारी, शीलव्रत आचार था धारी
विचरण कर रहीं वन के माहि, आश्रम निकट वह युवती सयानी
अचानक एक राजा आया, सुन्दर युवती देख ललचाया
तपस्विनी के निकट वह आया, दूषित भाव अपने मन लाया
समझ गयी वह ऋषि कुमारी, राजा है यह दुर्गुण धारी
ऋषि कन्या शुभा घबरायी, भय क्रोश से वह तमतमाई
राजा को सुविचार है दीन्हा, पर कामी के जरा न चिन्हा
खबरदार कह कर चिल्लाई, पर राजा को दया न आयी
-दोहा-
जबरन रथ बैठाय कर, दौड़ चला कुटिलाय
ऋषि कन्या का शोर सुन, अग्रसेन वहां आय —18
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल सुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अग्रसेन संग ऋषिकुमारा, क्रोध संतप्त बने भयंकारा
उन्हें देख राजा घबराया, मृत्यु निकट देख भय खाया
अग्रसेन ने उसे पछाड़ा, थप्पड़ घूंसों से हड़काया
लेकर गए गुरु के पास, मुख छाया था आत्म प्रकाश
कथनी अग्रसेन ने बरणी, नर पिशाच की बांह थी पकड़ी
धिक्कारा गुरु ने राजा को, कहा छोड़ दे इस नराधम को
वाक् दंड दे उसे भगाया, लज्जा से गर्दन को झुकाया
चला गया वह महाखलकामी, नीच कर्म से हुई बदनामी
-दोहा-
गुरु ने देखा अग्रसेन, पारंगत सब भांति
हो प्रसन्न कहने लगे, तात सुनो मेरी बात —19 क
-दोहा-
काम क्रोध मद लोभ, पुत्र सभी हैं मंद
सत्य को हृदय में धार के, सदा चलो सतपंथ —19 ख
-दोहा-
दक्ष हुए सब विद्या में, उत्तम करो व्यवहार
मात पिता की सेवा कर, सदा बनो दातार —19 ग
-दोहा-
गुरु को देकर दक्षिणा, सदाचार मन लाय
बल्लभसेन के लाडले, सत्य धर्म अपनाय —19 घ
बोलिये महालक्ष्मी मैया की जय, अग्रसेन महाराज की जय
-द्वितीय स्कंध सम्पूर्ण-