Best Historical and Knowledgeable Content here... Know More.

  • +91 8005792734

    Contact Us

  • amita2903.aa@gmail.com

    Support Email

  • Jhunjhunu, Rajasthan

    Address

श्री महालक्ष्मी कृपामृत 

महाराजा अग्रसेन मंगलपाठ

 

प्रथम स्कंध

 

गणेश वंदना 

गजानन भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जम्बूफलचारू भक्षणम् 

उमासुतं शोक विनाशकारकं, नमामि विघ्नेश्वर पादप‌ङ्कजम्

 

श्री गुरु वंदना 

गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देवो महेश्वरः 

गुरुर साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवै नमः

 

श्री सरस्वती वंदना 

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता 

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना 

या ब्रह्माच्युतशङ्‌करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता 

सा माम पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा

 

श्री राम वंदन 

नीलाम्बुज श्यामल कोमलांगम सीतासमारोपित वामभागम्

पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्

 

श्री हनुमान वंदना 

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् 

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये

 

—दोहा—

 

गजानंद गणपति सुमिर, धरूं रिद्धि सिद्धि का ध्यान

मेरे हृदय विराजिए, अपना पायक जान

वीणापाणि हंसवाहिनी, सकल गुणों की खान 

पद पंकज में राखिए, विद्या का दे दान 

भवानी शंकर का वंदन, नित्य करूं धर ध्यान 

श्रद्धा भक्ति बढ़ाय के, करहूं सदा कल्याण 

रघुपति के प्रियदास सा, वीर नहीं जग माय 

सबके काज संवारसी, महावीर हनुमान 

श्रीमहालक्ष्मी वंदन करूं, चरण नवाऊं माथ 

श्रीपीठ में बिराज के, धरियो सिर पर हाथ 

श्री अग्रसेन स्वामी सबल, सकल शुद्ध सुविचार 

मानवता के रक्षक को, हम कर रहे नमस्कार 

 

-चौपाई-

 

जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी 

महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी 

बंदऊ मातृ चरण सिरनाई, जिसने यह संसार दिखाई 

पिता चरण को शीश नवाऊं, उर के तम को दूर भगाऊं 

बंदऊं गुरुपद पदम परागा, दूर करो मन के संतापा 

गणपति कृपा तुम्हारी चाहूं, सकल मनोरथ पूरा पाऊं

 

-दोहा-

 

महालक्ष्मी के पद कमल, सुमिरि धरूं मैं ध्यान 

अग्रसेन महाराज का, चरित करूं गुणगान —1

 

-चौपाई-

 

जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी 

महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी 

अग्रसेन की कथा निराली, है भव भेषज अमृत थाली 

कथा बहुत पुरानी सुनाऊं, श्री कृष्ण को मन से ध्याऊं 

द्वापर युग की बात पुरानी, कौरव पाण्डव की है कहानी 

कौरव संख्या में थे भारी, पांडवों से द्वेष था धारी 

श्रीकृष्ण ने बहुत समझाया, पर कौरव के समझ न आया 

आखिर युद्ध हुआ भयंकारी, सकल पृथ्वी पर विपदा भारी 

आतातायी कौरव हारे, अधर्मी राजा गए मारे

 

-दोहा-

 

कथा युद्ध से पूर्व की, त्रिभुवन में विख्यात 

मानव धर्म को है यह अर्पित, मिटे पाप संताप —2

 

-चौपाई-

 

जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी 

महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी 

व्यासमुनि चरणं उर धरहूं, जैमिनी ऋषि का सुमिरण करहूं 

जनमे जय को कथा सुनाई, मिटे सभी भ्रम शांति आई 

इश्वाकु कुल की यह कहानी, सत्य धर्म विश्वास बढ़ानी 

इस कुल का विस्तार बड़ा है, वेद शास्त्र में भरा पड़ा है 

दिलीप भागीरथ रघुकुल राम, प्रगटे यहीं बने सुखधाम 

बज्रनाभ वृहद बलधारी, राज किया पृथ्वी पर भारी

 

-दोहा-

 

बृहद सेन राजा हुए, बड़े प्रतापी महान 

उनके पुत्र थे बल्लभ सेन, शांति प्रिय सुखधाम —3

 

-चौपाई-

 

जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति धारी 

महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी 

बल्लभ सेन थे बड़े प्रतापी, सत्य संकल्प सफल व्रतधारी 

प्रतापपुर उनकी रजधानी, सुन्दर नगरी पुराण बखानी 

ऊंचे टीले सुन्दर बाग, परकोटे में बनी दीवार 

तीन दिशा में नदी सुहाई, जिसे लांगना अति दुखदाई 

प्रजा सदा आनंदित रहती, राजा के मन में थी बसती 

विदर्भ देश की राजकुमारी, नाम भगवती सुन्दरनारी 

बल्लभसेन की पत्नी प्यारी, सदाचार का व्रत था धारी

 

-दोहा-

 

राजा रानी प्रेम से, मन में करे विचार 

प्रजा हमारी सुखी रहे, ऐसा करो व्यवहार —4

 

-चौपाई-

 

जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति धारी 

महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी 

सूर्यवंश के राजा रानी, शुभ संकल्प सकल गुण खानी 

नित उठ विप्र करहिं सेवकाई, शुभ आशीष सदा ही पाई 

यज्ञ होम सदा ही करहिं, विप्रन दान देत हरसतहिं 

प्रजावत्स थे राजा रानी, संतन को करते सन्मानी 

प्रजा सदा सुखी थी सारी, धर्मशील सुंदर व्रतधारी 

सचिव धर्म प्रिय वचन थे कहते, पाप मार्ग पर कभी न बढ़ते 

गुरु सुर पितर संत महि देवा, राजा सबकी करता सेवा 

वेद शास्त्र जो धरम बखाने, राजा करहिं सकल सुखमाने

 

-दोहा-

 

ऐसा सुन्दर राज भवन, देख देव हरषाय 

राजा रानी नित प्रति, मंगलगान कराय —5

 

-चौपाई-

 

जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी 

महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी 

प्रतापपुर सुंदर रजधानी, महिमा है पुराण बखानी 

नाना वापी कूप तडागा, सुमन वाटिका सुन्दर बागा 

विप्र वंश खुशहाल था भारी, यज्ञ हवन करते ब्रह्मचारी 

राजा देत विविध विधि दाना, कथा श्रवण कर अति सुखमाना 

वेद शास्त्र की महिमा भारी, सुन सुन राजा होत सुखारी 

पृथ्वी थी अति शुभकारी, वेद वाणी लगती हितकारी 

नहीं कहीं खल चोर जुआरी, अनीति की सब बात बिसारी

 

-दोहा-

 

निष्कंटक वह राज था, धर्म कर्म आधार 

होत सुमंगल नित नए, बल्लभसेन के द्वार —6 

बोलिए महालक्ष्मी मैया की जय, अग्रसेन जी महाराज की जय

 

- प्रथम स्कंध सम्पूर्ण -