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माँ के आँसू और पुत्र का धर्म—विरह की वह करुण घड़ी

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माँ के आँसू और पुत्र का धर्म—विरह की वह करुण घड़ी

 

जब श्रीराम कैकेयी के महल से बाहर निकलने को होते हैं, तभी अंतःपुर में रहने वाली सभी रानियों का हृदय मानो फट पड़ता है। उनके कंठ से एक साथ करुण क्रंदन फूट पड़ता है। वे विलाप करती हैं कि जो राम बिना कहे ही सबका ध्यान रखते थे, जो सबके सहारे थे, वही आज वन को जा रहे हैं। उनके शब्दों में केवल दुःख नहीं, बल्कि असहायता, भय और गहरी पीड़ा झलकती है।

 

वे याद करती हैं कि राम का व्यवहार कितना मधुर था—वे कभी किसी पर क्रोधित नहीं होते थे, कठोर वचन सुनकर भी शांत रहते थे, और हर रूठे हुए मन को प्रेम से मना लेते थे। ऐसे आदर्श पुत्र और स्नेहिल व्यक्ति का जाना उन्हें असहनीय लगता है। वे राजा दशरथ को दोष देती हैं, मानो उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई हो, क्योंकि वे अपने ही जीवन के आधार राम को त्याग रहे हैं।

 

उनका विलाप इतना गहरा होता है कि वह पूरे महल में गूंज उठता है। उस आर्तनाद को सुनकर स्वयं दशरथ भी लज्जा और शोक से भरकर अपने शयन में छिप जाते हैं। उधर राम, जो स्वयं जितेन्द्रिय हैं, अपने स्वजनों के दुःख से और भी अधिक व्यथित हो उठते हैं। वे गहरी साँस लेते हुए लक्ष्मण के साथ माता कौसल्या के महल की ओर बढ़ते हैं।

 

महल के द्वार पर अनेक लोग उन्हें देखकर प्रसन्न होते हैं, उनका स्वागत करते हैं, उन्हें बधाइयाँ देते हैं—क्योंकि उन्हें अभी तक वनवास का सत्य ज्ञात नहीं है। राम सबको प्रणाम करते हुए आगे बढ़ते हैं। जैसे-जैसे वे भीतर जाते हैं, उन्हें ब्राह्मण, सेवक, और स्त्रियाँ मिलती हैं—सभी उनके प्रति प्रेम और सम्मान से भरे हुए।

 

जब यह समाचार कौसल्या तक पहुँचता है कि राम आए हैं, तो वे उस समय भगवान विष्णु की पूजा में लीन होती हैं। वे पूरी श्रद्धा और नियम से व्रत और हवन कर रही होती हैं, अपने पुत्र के कल्याण की कामना में। चारों ओर पूजा की सामग्री सजी हुई है—मानो पूरा वातावरण पवित्रता और आशा से भरा हो।

 

राम को सामने देखकर कौसल्या का हृदय आनंद से भर उठता है। वे दौड़कर अपने पुत्र को गले लगा लेती हैं, जैसे कोई माँ अपने बिछुड़े हुए बच्चे को पाकर आनंदित हो उठती है। उनका स्नेह उमड़ पड़ता है—वे राम के मस्तक को सूँघती हैं, उन्हें आशीर्वाद देती हैं कि वे दीर्घायु, कीर्तिमान और धर्मपरायण हों।

 

वे प्रसन्न मन से कहती हैं कि आज राजा उन्हें युवराज बनाएँगे। उनके मन में केवल उत्सव और गर्व का भाव है। वे राम को आसन देती हैं और भोजन के लिए कहती हैं। लेकिन राम का मन भारी है। वे केवल आसन को स्पर्श करते हैं और folded hands के साथ माता से बात करने लगते हैं।

 

उनकी वाणी में विनम्रता है, लेकिन भीतर गहरी वेदना छिपी है। वे धीरे-धीरे वह कठोर सत्य बताते हैं कि उन्हें चौदह वर्षों के लिए वन जाना होगा। वे बताते हैं कि अब उन्हें राजसी सुखों का त्याग कर तपस्वी जीवन जीना होगा—फल-मूल खाकर, वल्कल पहनकर, निर्जन वन में रहना होगा।

 

यह सुनते ही कौसल्या का संसार जैसे थम जाता है। वे अचानक मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ती हैं। वह दृश्य अत्यंत करुण होता है—जैसे कोई हरा-भरा वृक्ष अचानक काटकर गिरा दिया गया हो। राम तुरंत उन्हें संभालते हैं, उठाते हैं, उनके शरीर से धूल झाड़ते हैं।

 

होश में आने पर कौसल्या का दुःख शब्दों में फूट पड़ता है। वे अपने जीवन की सारी पीड़ा उँडेल देती हैं। वे कहती हैं कि यदि उनका पुत्र ही न होता, तो इतना बड़ा दुःख भी न सहना पड़ता। वे अपने जीवन की उपेक्षा, सौतों के तिरस्कार, और पति के कठोर व्यवहार का स्मरण करती हैं। उनके शब्दों में वर्षों का दबा हुआ दर्द बाहर आ जाता है।

 

वे कहती हैं कि उन्होंने हमेशा यही आशा की थी कि पुत्र के राज्याभिषेक से उनका जीवन सुधरेगा, लेकिन अब वह आशा भी टूट गई। वे स्वयं को अत्यंत असहाय और अपमानित महसूस करती हैं। उन्हें यह सोचकर भय होता है कि राम के बिना उनका जीवन कैसे बीतेगा।

 

उनका मातृ-हृदय टूट चुका है। वे कहती हैं कि उन्होंने जो व्रत, तप, और प्रार्थनाएँ की थीं, सब व्यर्थ हो गईं। उनका दुःख इतना गहरा है कि वे मृत्यु की कामना करने लगती हैं। वे स्वयं को उस गाय के समान बताती हैं, जो अपने बछड़े के बिना जीवित नहीं रह सकती।

 

जब कौसल्या के हृदय में दुःख अपनी सीमा पार कर जाता है, तब वे अत्यन्त व्याकुल होकर अपने ही मन की कठोरता पर आश्चर्य करने लगती हैं। वे कहती हैं कि यह उनका हृदय अवश्य ही पत्थर या लोहे का बना हुआ है, क्योंकि इतना भयंकर दुःख सुनने के बाद भी यह फटकर चूर-चूर क्यों नहीं हो जाता। जैसे वर्षा ऋतु में प्रचण्ड वेग से बहता जल नदी के किनारों को तोड़ देता है, वैसे ही इस असहनीय पीड़ा से उनका हृदय भी टूट जाना चाहिए था—परंतु ऐसा नहीं हो रहा। यह उन्हें और भी अधिक पीड़ा देता है।

 

फिर वे अत्यन्त निराशा में डूबकर मृत्यु की बात करती हैं। वे सोचती हैं कि शायद उनके लिए मृत्यु भी कहीं उपलब्ध नहीं है, क्योंकि यदि होती, तो यमराज अब तक उन्हें इस दुःख से मुक्त कर चुके होते। वे अपनी स्थिति की तुलना उस असहाय हिरणी से करती हैं, जिसे सिंह जबरदस्ती उठा ले जाता है—परंतु यहाँ तो मृत्यु भी उन्हें लेने नहीं आ रही। इस विचार से उनका मन और भी व्याकुल हो उठता है।

 

वे अपने हृदय को बार-बार कोसती हैं कि यह कितना कठोर है—धरती पर गिरने पर भी यह न टूटता है, न बिखरता है। इतना दुःख सहने के बाद भी उनका शरीर जीवित है, उनके प्राण शेष हैं—यह उन्हें आश्चर्य और पीड़ा दोनों देता है। अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि जब तक मृत्यु का समय नहीं आता, तब तक कोई भी प्राणी मर नहीं सकता, चाहे वह कितना ही दुःख क्यों न सह रहा हो।

 

इसके बाद वे अपने जीवनभर के किए गए तप, व्रत, दान और संयम को याद करती हैं। वे कहती हैं कि उन्होंने अपने पुत्र के सुख और कल्याण के लिए जो कुछ भी किया था, वह सब अब व्यर्थ हो गया है। उनकी सारी साधनाएँ उस बीज के समान हो गई हैं, जो ऊसर भूमि में बोया गया हो और कभी फल न दे सके। यह भावना उनके हृदय को और अधिक तोड़ देती है।

 

वे आगे कहती हैं कि यदि किसी मनुष्य को अपने दुःख के कारण अपनी इच्छा से मृत्यु मिल सकती, तो वे आज ही इस संसार को छोड़ देतीं। वे स्वयं को उस गाय के समान बताती हैं, जो अपने बछड़े से बिछुड़कर तड़पती हुई प्राण त्याग देती है। उनके लिए राम के बिना जीवन असहनीय हो गया है।

 

फिर वे राम के मुख की तुलना पूर्णिमा के चन्द्रमा से करती हैं और कहती हैं कि उस सुंदर, शीतल और प्रिय मुख को देखे बिना वे कैसे जीवित रह पाएँगी। उनका जीवन उन्हें अब निरर्थक और दुःखमय प्रतीत होता है।

 

अंत में, अपने स्नेह और मोह से अभिभूत होकर वे कहती हैं कि यदि राम को वन जाना ही है, तो वे भी उनके साथ जाएँगी। जैसे कोई दुर्बल गाय भी अपने बछड़े के पीछे-पीछे चल देती है, वैसे ही वे भी अपने पुत्र का साथ नहीं छोड़ेंगी। उनके लिए राम से बढ़कर इस संसार में कुछ भी नहीं है।

 

इस प्रकार, अत्यन्त दुःख और आने वाले संकट की कल्पना से विचलित होकर कौसल्या विलाप करने लगती हैं। उनका रुदन इतना करुण होता है कि मानो कोई दिव्य किन्नरी अपने प्रिय पुत्र को बंधन में देखकर रो रही हो। उस क्षण उनका मातृ-हृदय पूरी तरह टूट चुका होता है—और उनके आँसू उस असीम प्रेम और पीड़ा के साक्षी बन जाते हैं, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं।