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माँ कौसल्या का हृदयविदारक विदा-संस्कार

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माँ कौसल्या का हृदयविदारक विदा-संस्कार

अयोध्या का राजमहल उस समय शोक की गहन छाया में डूबा हुआ था। हर ओर मौन पसरा था, मानो स्वयं समय भी ठहर गया हो। महलों की दीवारें, सोने से जड़े स्तम्भ, राजपथ और प्रांगण—सब जैसे किसी अदृश्य वेदना से भर उठे थे। महारानी कौसल्या का हृदय तो मानो टूट चुका था। उनका प्रिय पुत्र, अयोध्या का प्राण, धर्म और मर्यादा का मूर्त स्वरूप श्रीराम, चौदह वर्षों के वनवास के लिये जाने वाले थे।

कुछ समय पहले तक वे विलाप कर रही थीं। उनके नेत्र अश्रुओं से भरे थे और कंठ बार-बार रुद्ध हो रहा था। परंतु फिर उन्होंने अपने मन को बड़ी कठिनाई से सँभाला। उन्होंने सोचा—“यदि मैं ही टूट जाऊँगी, तो मेरे राम को कौन धैर्य देगा?” यही विचार करके उन्होंने अपने आँसू पोंछे, पवित्र जल से आचमन किया और अपने पुत्र के मंगल के लिए स्वयं को स्थिर किया।

अब वे केवल एक दुःखी माँ नहीं थीं; वे उस क्षण एक ऐसी धर्मनिष्ठ माता थीं जो अपने पुत्र को धर्ममार्ग पर भेज रही थी। काँपते हुए हाथों और भारी हृदय के साथ वे श्रीराम के समीप आयीं। उनके नेत्र राम के मुखकमल पर टिक गये। उन्हें ऐसा लग रहा था मानो वे इस रूप को अपनी आँखों में सदा के लिये बसाना चाहती हों।

धीमे, किंतु दृढ़ स्वर में उन्होंने कहा—
“वत्स राम! अब मैं तुम्हें रोक नहीं सकती। तुम्हारे चरण धर्म के मार्ग पर बढ़ चुके हैं। जाओ पुत्र, उसी सत्य और मर्यादा का पालन करते हुए वन की ओर जाओ, जिसके लिए तुम जन्मे हो। परंतु शीघ्र लौट आना। यह अयोध्या तुम्हारे बिना सूनी हो जाएगी।”

उनके शब्दों में आशीर्वाद था, किंतु भीतर छिपा हुआ असहनीय दर्द भी था। वे जानती थीं कि वन का जीवन अत्यंत कठिन होगा—घने अरण्य, हिंसक पशु, राक्षस, अनजान मार्ग और कठोर तपस्या। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र की रक्षा के लिए समस्त देवताओं, ऋषियों, प्रकृति और काल तक को पुकारना आरम्भ किया।

वे बार-बार राम को निहारतीं और प्रार्थना करतीं—
“पुत्र! तुमने सदैव धर्म का पालन किया है। वही धर्म तुम्हारी रक्षा करे। जिन देवताओं के सम्मुख तुमने सिर झुकाया है, वे सब वन में तुम्हारे साथ रहें। महर्षि विश्वामित्र ने जो दिव्य अस्त्र तुम्हें दिए हैं, वे हर दिशा से तुम्हारी रक्षा करें।”

उनका हृदय मातृस्नेह से भर उठा। उन्होंने राम के मस्तक को स्पर्श किया और बोलीं—
“तुमने सदैव पिता की सेवा की, माता का सम्मान किया और सत्य का पालन किया। इन्हीं पुण्यों के प्रभाव से तुम दीर्घायु और सुरक्षित रहो।”

इसके बाद उनकी प्रार्थनाएँ और भी विस्तृत होती चली गईं। वे केवल देवताओं को ही नहीं, बल्कि वन के प्रत्येक तत्त्व को संबोधित करने लगीं।
उन्होंने पर्वतों, नदियों, वृक्षों, कुश, समिधा, वेदियों, मन्दिरों, पक्षियों, सर्पों और सिंहों तक से कहा—
“तुम सब मेरे राम की रक्षा करना।”

उनकी आँखों के सामने वन का भयावह चित्र घूम रहा था। उन्हें विशाल हाथियों की चिंघाड़, सिंहों की गर्जना, रात्रि के अंधकार में घूमते राक्षस, विषैले सर्प, बिच्छू और कीट दिखाई दे रहे थे। एक माँ का हृदय काँप उठा। वे बोलीं—
“मेरे पुत्र को किसी राक्षस, पिशाच, हिंसक पशु या विषैले जीव से कभी भय न हो। वन के प्रत्येक जीव उसके लिए शांत और मंगलकारी बन जाएँ।”

उन्होंने दिशाओं, ऋतुओं, महीनों, दिन-रात, संध्याओं, ग्रहों और नक्षत्रों तक को पुकारा। ऐसा लग रहा था मानो सम्पूर्ण सृष्टि को वे अपने पुत्र की रक्षा का दायित्व सौंप रही हों।
“सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम, स्कन्द, सोम, बृहस्पति, सप्तर्षि, नारद—तुम सब मेरे राम के साथ रहना।”

उनका स्वर बार-बार भर आता था। पर वे स्वयं को रोकतीं और फिर मंत्रोच्चार करने लगतीं। उनके भीतर एक ही भावना थी—“मेरा पुत्र सकुशल लौट आए।”

इसके बाद महारानी कौसल्या ने विधिपूर्वक देवताओं का पूजन आरम्भ किया। उन्होंने पुष्पमालाएँ अर्पित कीं, चन्दन और सुगंधित द्रव्यों से देवमूर्तियों का अभिषेक किया। महल के भीतर यज्ञाग्नि प्रज्वलित की गई। एक विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर उन्होंने श्रीराम के मंगल के लिए हवन करवाया।

घी, श्वेत पुष्प, समिधा, सरसों और अनेक शुभ सामग्री अग्नि के समीप रखी गई। मंत्रों की पवित्र ध्वनि वातावरण में गूँजने लगी। हवन की अग्नि ऊपर उठती तो ऐसा प्रतीत होता मानो देवता स्वयं उस माँ की व्याकुल पुकार सुन रहे हों।

पुरोहित ने विधिपूर्वक आहुति दी और फिर दसों दिशाओं के लोकपालों के लिए बलि अर्पित की। इसके बाद ब्राह्मणों को मधु, दही, अक्षत और घृत देकर स्वस्तिवाचन कराया गया। समस्त महल “श्रीराम का मंगल हो” की कामना से भर उठा।

हवन समाप्त होने पर कौसल्या ने पुरोहितों को दक्षिणा दी। फिर वे पुनः अपने पुत्र के पास आयीं। अब उनके शब्दों में केवल प्रार्थना ही नहीं, बल्कि महान उदाहरणों का स्मरण भी था।

उन्होंने कहा—
“जैसा मंगल देवताओं ने वृत्रासुर-विजेता इन्द्र के लिए किया था, वैसा ही मंगल तुम्हारे लिए हो। जिस प्रकार माता विनता ने गरुड़ के लिए मंगलकामना की थी, उसी प्रकार देवता तुम्हारा कल्याण करें। जैसे माता अदिति ने इन्द्र को विजय का आशीर्वाद दिया था, वैसे ही तुम भी विजयी होकर लौटो। जिस प्रकार भगवान विष्णु ने तीनों लोकों को नापा था, वैसा ही तेज और यश तुम्हें प्राप्त हो।”

इसके बाद उन्होंने अक्षत लेकर राम के मस्तक पर रखे। चन्दन और रोली का तिलक लगाया। फिर उन्होंने विशल्यकरणी नामक दिव्य औषधि मंत्र पढ़कर राम के हाथ में बाँधी, मानो अपनी समस्त शक्ति और आशीर्वाद उसी रक्षा-सूत्र में भर देना चाहती हों।

परंतु अब उनका धैर्य टूटने लगा। वे मंत्र तो पढ़ रही थीं, किंतु कंठ बार-बार काँप जाता। शब्द लड़खड़ाने लगे। हृदय शोक से इतना भरा था कि वे केवल वाणी से मंत्र बोल पा रही थीं; मन तो पहले ही पुत्र-वियोग की वेदना में डूब चुका था।

अंततः वे स्वयं को रोक न सकीं। उन्होंने झुककर राम के मस्तक को सूँघा—जैसे कोई माँ अपने पुत्र के स्नेह को अंतिम बार आत्मा में भर लेना चाहती हो। फिर उन्हें अपनी छाती से लगा लिया।

कंपित स्वर में वे बोलीं—
“वत्स राम! सफल होकर लौटना। जिस दिन तुम वन से वापस आओगे और मैं तुम्हें राजमार्ग पर देखूँगी, उसी दिन मेरे सारे दुःख समाप्त हो जाएँगे। उस समय तुम्हारा मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान दमकेगा और मेरा हृदय आनंद से भर उठेगा।”

उनकी आँखों में एक सुंदर भविष्य की झलक थी। वे कल्पना करने लगीं—
“जब तुम पिता की प्रतिज्ञा पूर्ण करके लौटोगे और राजसिंहासन पर बैठोगे, तब मैं पुनः तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक देखूँगी। तुम राजसी वस्त्र और आभूषण धारण करोगे, और सीता की सभी इच्छाएँ पूर्ण करोगे।”

वे फिर बोलीं—
“मैंने जिन देवताओं की सदैव पूजा की है, वे सब वन में तुम्हारा कल्याण करें।”

अब उनके आँसू रुक नहीं रहे थे। उन्होंने स्वस्तिवाचन की विधि पूर्ण की और बार-बार राम की परिक्रमा करने लगीं। हर बार उन्हें अपने हृदय से लगा लेतीं, मानो उनसे अलग होना असंभव हो।

श्रीराम भी मौन खड़े थे। उनकी आँखें भी नम थीं। वे बार-बार झुककर अपनी माता के चरण दबाते और प्रणाम करते। उस क्षण वहाँ केवल राजा का पुत्र और महारानी नहीं थे—वहाँ केवल एक माँ और उसका प्रिय पुत्र था, जिन्हें धर्म ने एक-दूसरे से अलग करने का निश्चय कर लिया था।

अंततः समय आ पहुँचा।
श्रीराम ने एक बार फिर माता के चरणों में सिर झुकाया। कौसल्या उन्हें दूर तक निहारती रहीं। उनके नेत्रों में आँसू थे, पर उन आँसुओं के भीतर गर्व भी था—इस बात का गर्व कि उनका पुत्र धर्म के लिए सब कुछ त्यागने जा रहा था।

और फिर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम धीरे-धीरे सीताजी के महल की ओर बढ़ गये, जबकि पीछे खड़ी माँ कौसल्या का हृदय उनके साथ वन की ओर चला गया।