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(24)
माता कौसल्या का विलाप और श्रीराम का धर्मनिष्ठ संकल्प
अयोध्या का राजमहल उस समय मानो शोक का समुद्र बन चुका था। कुछ ही समय पहले तक जहाँ उत्सव की तैयारी थी, जहाँ राजमहल के आँगनों में मंगलगीत गूँज रहे थे, वहीं अब हर ओर मौन, करुणा और आँसुओं का वातावरण फैल गया था। दीपक जल रहे थे, पर उनके प्रकाश में भी उदासी ही दिखाई देती थी।
माता कौसल्या के सामने उनके प्रिय पुत्र श्रीराम खड़े थे—वही राम, जिनके राज्याभिषेक के लिए पूरी अयोध्या उत्साहित थी। किंतु अब वे वन जाने के लिए तैयार थे। उनके मुख पर अद्भुत शांति थी, पर माता के हृदय में तूफान उठ रहा था।
जब माता कौसल्या ने देखा कि श्रीराम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने का अटल निश्चय कर लिया है और अब उन्हें कोई रोक नहीं सकता, तब उनका धैर्य टूट गया। आँसुओं से भरी आँखें, काँपते हुए होंठ और गले में अटकती हुई वाणी के साथ वे अत्यन्त दुःखी होकर बोल उठीं।
उन्होंने कहा—
“हाय राम! तुमने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा। तुमने सदा सबके साथ मधुर व्यवहार किया है। अयोध्या का प्रत्येक व्यक्ति तुमसे प्रेम करता है। तुम महाराज दशरथ के पुत्र हो, राजमहल में पले-बढ़े हो। फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम वन में जाकर खेतों में गिरे हुए दानों को बीन-बीनकर अपना जीवन बिताओगे?”
कौसल्या की आँखों के सामने वह दृश्य घूमने लगा—राजमहल का राजकुमार, जो कभी स्वर्ण थालों में भोजन करता था, अब वन में भटककर सूखे फल और कंद-मूल खाएगा। यह कल्पना ही उनके हृदय को चीर रही थी।
वे आगे बोलीं—
“राम! जिनके सेवक और दास तक उत्तम और स्वादिष्ट भोजन करते हैं, वही तुम वन में कठोर जीवन कैसे सहोगे? क्या यह उचित है कि ऐसा गुणवान, धर्मात्मा और सबका प्रिय पुत्र वनवास पाए?”
उनके स्वर में पीड़ा के साथ-साथ आश्चर्य भी था। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि संसार इतना निर्दयी हो सकता है। वे सोच रही थीं कि यदि कोई यह बात सुनेगा कि महाराज दशरथ के सबसे प्रिय और श्रेष्ठ पुत्र को वन भेजा जा रहा है, तो वह भय और दुःख से काँप उठेगा।
फिर वे गहरी साँस लेकर बोलीं—
“निश्चय ही इस संसार में दैव—भाग्य—सबसे अधिक बलवान है। मनुष्य चाहे कितना भी महान क्यों न हो, अंततः भाग्य की इच्छा के सामने विवश हो जाता है। तभी तो तुम्हारे जैसे लोकप्रिय और धर्मात्मा पुत्र को भी वन जाना पड़ रहा है।”
इतना कहते-कहते उनका दुःख और अधिक बढ़ गया। अब वे अपने हृदय की जलती हुई पीड़ा को शब्दों में व्यक्त करने लगीं।
उन्होंने कहा—
“राम! तुम्हारे बिना मेरा हृदय शोक की आग में जल जाएगा। जैसे गर्मियों में दावानल सूखी घास और लकड़ियों को भस्म कर देता है, वैसे ही यह दुःख मुझे समाप्त कर देगा।”
फिर उन्होंने उस शोक को मानो एक जीवित अग्नि के रूप में चित्रित किया—
“तुम्हें न देख पाने की कल्पना ही उस अग्नि की हवा बन गई है। मेरा विलाप उसका ईंधन है। मेरी आँखों से बहते आँसू उसी अग्नि में डाली जाने वाली घी की आहुति जैसे हैं। चिंता के कारण जो गरम साँसें निकल रही हैं, वही उसका धुआँ हैं। यह सोचकर कि तुम दूर वन में कैसे रहोगे और कब लौटोगे—यह आग और अधिक भड़क उठती है।”
कौसल्या की प्रत्येक बात उनके टूटते हुए हृदय की आवाज थी। वे बोलीं—
“राम! इस आग को बुझाने वाले केवल तुम हो। यदि तुम चले गए, तो यह शोक मुझे भीतर ही भीतर जला डालेगा।”
फिर उनका मातृत्व उमड़ पड़ा। उन्होंने कहा—
“जैसे गाय अपने बछड़े के पीछे-पीछे चलती है, वैसे ही मैं भी तुम्हारे पीछे वन तक चलूँगी। मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ सकती।”
माता की ऐसी करुण दशा देखकर स्वयं श्रीराम की आँखें भी नम हो गईं। वे अपनी माँ के पास बैठे और अत्यन्त विनम्र तथा शांत स्वर में बोले—
“माँ! कैकेयी ने पिताजी से छल किया है, यह सत्य है। मैं वन जा रहा हूँ। यदि इस समय आप भी पिताजी का साथ छोड़ देंगी, तो वे जीवित नहीं रह पाएँगे।”
राम जानते थे कि महाराज दशरथ पहले ही अत्यन्त दुःखी हैं। यदि कौसल्या भी उनसे विमुख हो जाएँगी, तो उनका हृदय टूट जाएगा।
राम ने आगे कहा—
“पति का त्याग करना स्त्री के लिए अत्यन्त कठोर और अधर्मपूर्ण माना गया है। सत्पुरुष इसकी निंदा करते हैं। इसलिए आपको ऐसा विचार भी नहीं करना चाहिए।”
फिर उन्होंने बहुत आदर से कहा—
“जब तक पिताजी जीवित हैं, तब तक आपकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनकी सेवा करना है। पति की सेवा ही स्त्री का सनातन धर्म है।”
राम के मुख से धर्म की ऐसी गंभीर बातें सुनकर कौसल्या का हृदय भर आया। वे समझ गईं कि उनका पुत्र केवल उनका बेटा नहीं, बल्कि धर्म की साक्षात मूर्ति है। उन्होंने भारी मन से कहा—
“ठीक है बेटा, मैं तुम्हारी बात मानूँगी।”
लेकिन राम यहीं नहीं रुके। उन्होंने फिर कहा—
“माँ! पिता की आज्ञा का पालन करना हम दोनों का कर्तव्य है। राजा केवल पिता ही नहीं, बल्कि गुरु, स्वामी और प्रभु भी होते हैं।”
फिर उन्होंने अपनी माता को सांत्वना देते हुए कहा—
“ये चौदह वर्ष शीघ्र बीत जाएँगे। मैं वन में रहकर फिर लौट आऊँगा और पहले की तरह आपकी सेवा करूँगा।”
परंतु यह सुनते ही कौसल्या का दुःख फिर उमड़ पड़ा। आँसू बहाते हुए वे बोलीं—
“राम! अब मैं इन सौतों के बीच कैसे रहूँगी? यदि तुम वन जाने का निश्चय कर चुके हो, तो मुझे भी अपने साथ ले चलो। मैं वन में हरिणी की तरह तुम्हारे साथ रहूँगी।”
इतना कहकर वे फूट-फूटकर रोने लगीं। उनका विलाप सुनकर स्वयं श्रीराम भी भावुक हो उठे। वे माँ को समझाते हुए बोले—
“माँ! स्त्री के लिए उसका पति ही देवता के समान होता है। महाराज हमारे स्वामी हैं। जब तक वे जीवित हैं, हमें स्वयं को अनाथ नहीं समझना चाहिए।”
राम ने भरत के बारे में भी अत्यन्त आदरपूर्वक कहा—
“भरत धर्मात्मा हैं। वे सबके साथ प्रेम से बोलते हैं। वे अवश्य आपकी सेवा करेंगे।”
फिर राम ने माँ को एक और महत्वपूर्ण बात समझाई—
“मेरे जाने के बाद आप इस बात का ध्यान रखें कि पिताजी को पुत्र-वियोग का दुःख अधिक कष्ट न दे। कहीं ऐसा न हो कि यह शोक उनके प्राण ही ले ले।”
राम के शब्दों में अपने पिता के प्रति गहरी करुणा थी। वे चाहते थे कि उनके वन जाने के बाद कौसल्या महाराज दशरथ का सहारा बनें।
इसके बाद राम ने स्त्रीधर्म का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा—
“यदि कोई स्त्री उत्तम कुल में जन्म लेकर भी अपने पति की सेवा नहीं करती, तो उसे दुःखद गति प्राप्त होती है। लेकिन जो स्त्री केवल अपने पति की सेवा करती है, वह बिना अन्य देवताओं की पूजा किए भी स्वर्ग प्राप्त कर लेती है।”
राम ने स्पष्ट कहा—
“पति की सेवा करना ही स्त्री का सनातन धर्म है। वेद और शास्त्र भी यही कहते हैं।”
फिर उन्होंने माँ से कहा—
“आप मेरे मंगल के लिए यज्ञों में देवताओं की पूजा करती रहें, ब्राह्मणों का सम्मान करें और नियमपूर्वक जीवन बिताएँ। मेरे लौटने की प्रतीक्षा करें।”
अंत में उन्होंने कहा—
“यदि पिताजी जीवित रहे, तो जब मैं लौटूँगा तब आपकी सारी इच्छाएँ पूर्ण होंगी।”
अब कौसल्या समझ चुकी थीं कि राम का निर्णय अटल है। उन्होंने आँसू पोंछे और भारी मन से कहा—
“बेटा! मैं तुम्हें रोक नहीं सकती। काल की इच्छा के विरुद्ध जाना अत्यन्त कठिन है।”
फिर उन्होंने काँपते हुए हाथों से राम के सिर को स्पर्श किया और आशीर्वाद देते हुए बोलीं—
“तुम निश्चिन्त होकर वन जाओ। तुम्हारा सदा कल्याण हो। जब तुम लौट आओगे, तब मेरे सारे दुःख समाप्त हो जाएँगे।”
उनकी आँखों में एक माँ की आशा चमक रही थी। वे बोलीं—
“जब तुम वनवास का व्रत पूर्ण करके लौटोगे और पिता के ऋण से उऋण हो जाओगे, तभी मैं चैन की नींद सो सकूँगी।”
फिर वे भाग्य की विचित्र लीला को याद करके बोलीं—
“दैव की गति को समझना बहुत कठिन है। वही तुम्हें मुझसे दूर वन की ओर ले जा रहा है।”
अंत में कौसल्या ने अपने प्रिय पुत्र को आशीर्वाद देते हुए कहा—
“जाओ बेटा, कुशल से लौटना। फिर अपने मधुर वचनों से मुझे प्रसन्न करना। क्या वह दिन फिर आएगा जब मैं तुम्हें जटा और वल्कल धारण किए हुए वन से लौटते देखूँगी?”
यह कहते-कहते उनका गला भर आया।
अब वे समझ चुकी थीं कि राम को रोकना असंभव है। इसलिए उन्होंने अपने आँसुओं को रोककर मन ही मन संकल्प किया कि वे अपने पुत्र को शुभ आशीर्वाद देंगी और उनके मंगल के लिए स्वस्तिवाचन कराएँगी।
उस क्षण राजमहल में केवल एक माँ का दुःख नहीं था—वहाँ धर्म, त्याग, कर्तव्य और प्रेम की महान परीक्षा चल रही थी। श्रीराम अपने धर्म के लिए वन जा रहे थे, और माता कौसल्या अपने मातृहृदय को पत्थर बनाकर उन्हें विदा करने की तैयारी कर रही थीं।