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मिथिला में मिलन — हर्ष, विनय और मंगलमय विवाह की प्रतीक्षा
रात्रि बीत चुकी थी। प्रभात की सुनहरी किरणें जैसे अयोध्या-नरेश के हृदय में उमड़ते उत्साह को जगाने आई थीं। राजा दशरथ उस दिन अत्यंत प्रसन्न थे। उनके चेहरे पर पिता का गर्व, राजा का वैभव और स्नेह से भरा हृदय एक साथ झलक रहा था। अपने उपाध्यायों और बन्धु-बान्धवों के बीच बैठे हुए वे सुमन्त्र को बुलाकर उत्साहपूर्ण स्वर में बोले कि आज का दिन साधारण नहीं है। उनके प्रिय पुत्रों के विवाह की दिशा में आगे बढ़ने का समय आ गया है। उन्होंने आदेश दिया कि राज्य के सभी धनाध्यक्ष बहुमूल्य रत्नों, स्वर्ण, रेशमी वस्त्रों और विविध उपहारों से भरे पात्र लेकर सबसे आगे चलें। उनकी रक्षा के लिए विशेष व्यवस्था हो, क्योंकि यह केवल यात्रा नहीं, बल्कि सम्मान और प्रेम का भव्य प्रदर्शन है।
राजा का उत्साह यहीं नहीं रुका। उन्होंने कहा कि पूरी चतुरंगिणी सेना भी शीघ्र प्रस्थान करे। हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की टापें, रथों की सजावट और पैदल सैनिकों की अनुशासित पंक्तियाँ—सब कुछ ऐसा हो कि अयोध्या का वैभव मिथिला तक पहुँचे। सुंदर पालकियाँ तैयार हों, श्रेष्ठ घोड़े सजाए जाएँ, रथों पर ध्वजाएँ लहराएँ। ऐसा प्रतीत हो मानो एक राजसी उत्सव यात्रा निकल रही हो। राजा के मन में केवल एक ही भाव था—अपने पुत्रों के विवाह के लिए वे किसी भी प्रकार की कमी नहीं रखना चाहते थे।
इसके बाद उन्होंने ऋषियों का स्मरण किया। वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, दीर्घायु मार्कण्डेय और कात्यायन जैसे महान ब्रह्मर्षियों का नाम लेते हुए उन्होंने कहा कि ये सभी आगे-आगे चलें। उनके चरणों से यात्रा पवित्र हो जाएगी। राजा ने अपने रथ को भी तुरंत तैयार करने का आदेश दिया और कहा कि देर नहीं होनी चाहिए, क्योंकि जनक के दूत उन्हें शीघ्र आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनके स्वर में उत्सुकता और आतुरता स्पष्ट झलक रही थी—जैसे कोई पिता अपने पुत्र के मंगल कार्य में विलम्ब सहन नहीं कर सकता।
राजा की आज्ञा मिलते ही पूरा राजकुल जीवंत हो उठा। सेना सज गई, रथ तैयार हो गए, पालकियाँ चमक उठीं, और ऋषियों की पवित्र उपस्थिति से यात्रा का वातावरण आध्यात्मिक बन गया। महाराज दशरथ आगे-आगे बढ़े और उनके पीछे पूरी अयोध्या जैसे चल पड़ी। यह यात्रा केवल दूरी तय करने के लिए नहीं थी, बल्कि दो महान कुलों के मिलन का शुभ संकेत थी।
चार दिन की यात्रा के बाद वे विदेह देश पहुँचे। उनके आगमन का समाचार मिलते ही मिथिला में आनंद की लहर दौड़ गई। राजा जनक ने बड़े प्रेम से स्वागत की तैयारी करवाई। मार्गों को सजाया गया, पुष्पों की वर्षा की व्यवस्था हुई, और नगरवासी उत्सुकता से इस दिव्य मिलन को देखने को तैयार हो गए।
आनंद में डूबे राजा जनक स्वयं वृद्ध महाराज दशरथ से मिलने पहुँचे। दोनों राजाओं का मिलन अत्यंत भावपूर्ण था। जनक के हृदय में आदर और प्रसन्नता थी, जबकि दशरथ के मन में आत्मीयता और संतोष। जनक ने विनम्र स्वर में कहा कि आज उनका भाग्य जाग उठा है, जो रघुकुल के श्रेष्ठ राजा स्वयं मिथिला पधारे हैं। उनके शब्दों में सच्चा सम्मान और हर्ष झलक रहा था।
उन्होंने आगे कहा कि आपके दोनों पुत्रों ने अपने पराक्रम से जो प्रेम और सम्मान पाया है, वह आपको यहाँ प्राप्त होगा। महातेजस्वी वसिष्ठ मुनि भी यहाँ उपस्थित हैं, और उनका आगमन मिथिला के लिए महान सौभाग्य है। वे सभी ब्राह्मणों के साथ वैसे ही शोभित हो रहे हैं जैसे देवताओं के बीच इन्द्र। जनक के शब्दों में श्रद्धा और आनंद का अद्भुत मिश्रण था।
जनक ने भावुक होकर कहा कि आज उनकी सारी विघ्न-बाधाएँ दूर हो गईं। रघुकुल से संबंध जुड़ना उनके लिए अत्यंत गौरव की बात है। उनके स्वर में विनम्रता थी, पर साथ ही गर्व भी कि उनका कुल अब रघुकुल से जुड़ने जा रहा है। उन्होंने निवेदन किया कि यज्ञ की समाप्ति के बाद अगले दिन प्रातः श्रीराम का विवाह संपन्न किया जाए। यह प्रस्ताव सुनते ही वातावरण मंगलमय हो उठा।
ऋषियों के बीच यह बात सुनकर महाराज दशरथ ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि वे जानते हैं कि प्रतिग्रह दाता के अधीन होता है, इसलिए जैसा जनक उचित समझें, वे वैसा ही करेंगे। दशरथ के इस विनम्र और धर्मसम्मत उत्तर ने जनक को आश्चर्यचकित कर दिया। एक महान सम्राट का इतना विनम्र होना जनक के हृदय को छू गया।
इसके बाद सभी महर्षि एक-दूसरे से मिलकर प्रसन्न हुए। वातावरण में शांति, आनंद और मंगल की भावना भर गई। सभी ने सुखपूर्वक रात्रि व्यतीत की, मानो अगले दिन होने वाले शुभ कार्य की प्रतीक्षा में समय भी ठहर गया हो।
उधर श्रीराम, लक्ष्मण के साथ और विश्वामित्र को आगे करके अपने पिता के पास पहुँचे। दोनों भाइयों ने झुककर पिता के चरण स्पर्श किए। दशरथ ने अपने पुत्रों को देखकर हृदय से लगा लिया। उनके मन में अपार आनंद उमड़ पड़ा—लंबे समय बाद पुत्रों को सुरक्षित देखकर उनका हृदय संतोष से भर गया।
जनक के आदर-सत्कार से प्रसन्न दशरथ उस रात अत्यंत सुख से रहे। उनके हृदय में संतोष था कि सब कुछ मंगलमय हो रहा है। वे अपने दोनों रघुकुल-रत्न पुत्रों को देखकर गर्व और स्नेह से भर उठे।
इधर राजा जनक ने भी यज्ञ का कार्य धर्मानुसार पूरा किया। उन्होंने अपनी दोनों कन्याओं के विवाह के लिए मंगलाचार संपन्न कराए। उनके मन में पिता का स्नेह, कर्तव्य का भाव और आने वाले शुभ मिलन की मधुर प्रतीक्षा थी। मिथिला में उस रात जैसे हर दीपक अधिक उजाला दे रहा था, हर हृदय में आनंद था, और सभी अगले दिन होने वाले दिव्य विवाह की प्रतीक्षा में सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे।