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यज्ञरक्षा की अमर वीरगाथा

 

सिद्धाश्रम की पवित्र भूमि पर गहन शांति छाई हुई थी, किंतु उस शांति के भीतर एक आने वाले तूफ़ान की आहट छिपी थी। देश और काल के ज्ञाता, शत्रुओं का दमन करने वाले राजकुमार राम और उनके पराक्रमी अनुज लक्ष्मण सावधान खड़े थे। वे केवल धनुर्धर ही नहीं, समय की नाड़ी पहचानने वाले वीर भी थे। विनम्र होकर उन्होंने महर्षि विश्वामित्र से पूछा—“भगवन्! वे राक्षस किस समय आक्रमण करते हैं? हमें उस घड़ी का ज्ञान हो, ताकि असावधानी से धर्म की रक्षा में कोई कमी न रह जाए।”

 

उनके शब्दों में उत्साह था, पर उससे अधिक गुरु-सेवा का संकल्प। उपस्थित मुनि उनकी सजगता देखकर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने बताया कि विश्वामित्र यज्ञदीक्षा ले चुके हैं, इसलिए मौन रहेंगे। अब छः रातों तक यज्ञ की रक्षा का भार इन दोनों रघुवंशी वीरों पर है।

 

राम और लक्ष्मण ने बिना विश्राम के, बिना नींद के, निरंतर छह दिन और छह रातें उस तपोवन की रक्षा की। उनकी आँखों में थकान नहीं, केवल धर्म की ज्योति थी। वे धनुष पर हाथ रखे, सदा सजग, गुरु और यज्ञ की रक्षा में अटल खड़े रहे।

 

छठे दिन का सूर्योदय कुछ अलग था। वातावरण में एक विचित्र कंपन था। राम ने लक्ष्मण से कहा, “सुमित्रानन्दन! मन को एकाग्र करो, समय आ पहुँचा है।” उनके शब्दों में गंभीरता थी—जैसे वीर हृदय आने वाले संग्राम को पहचान चुका हो।

 

अचानक यज्ञवेदी प्रज्वलित हो उठी। यह केवल अग्नि का प्रकाश नहीं था—यह राक्षसों के आगमन का संकेत था। वेदी पर विधिपूर्वक मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ प्रारम्भ हुआ ही था कि आकाश में भयानक गर्जना गूँज उठी। वातावरण काँप गया।

 

काले मेघों की भाँति मारीच और सुबाहु अपने अनुचरों सहित आकाश में प्रकट हुए। उनकी माया से आकाश ढक गया। उन्होंने यज्ञमंडप पर रक्त की वर्षा आरम्भ कर दी। पवित्र वेदी के चारों ओर भूमि लाल हो उठी। यह दृश्य अत्यंत विकराल था।

 

यह देखकर राम का हृदय तेज से प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने ऊपर दृष्टि डाली और आकाश में स्थित उन दुष्टों को देखा। शांत, किंतु दृढ़ स्वर में उन्होंने लक्ष्मण से कहा, “देखो, ये दुराचारी आ पहुँचे हैं। मैं इन्हें मानवास्त्र से उसी प्रकार दूर करूँगा जैसे प्रचंड वायु बादलों को तितर-बितर कर देती है।”

 

राम ने अपने धनुष पर दिव्य मानवास्त्र चढ़ाया। उनकी भुजाएँ दृढ़ हो उठीं। अग्नि के समान तेजस्वी बाण बिजली की तरह निकला और मारीच की छाती पर लगा। उस प्रहार की शक्ति ऐसी थी कि मारीच सौ योजन दूर समुद्र में जा गिरा। वह मूर्छित होकर दूर चला गया, प्राण शेष थे पर अहंकार चूर हो चुका था।

 

राम ने लक्ष्मण से कहा, “यह अस्त्र उसे दूर ले जा रहा है, उसके प्राण नहीं ले रहा। पर शेष दुरात्माओं को अब जीवित नहीं छोड़ूँगा।”

 

इतना कहकर उन्होंने अग्नि के समान प्रज्वलित आग्नेयास्त्र का संधान किया और उसे सुबाहु की ओर छोड़ दिया। वह बाण सीधा उसकी छाती में लगा और वह धरती पर गिर पड़ा। इसके पश्चात राम ने वायव्यास्त्र का प्रयोग कर शेष राक्षसों का भी संहार कर दिया। यज्ञभूमि पुनः शांत हो गई—मानो धर्म ने अधर्म पर विजय का उद्घोष कर दिया हो।

 

ऋषियों के हृदय आनंद से भर उठे। वे राम की ओर ऐसे देख रहे थे जैसे पूर्वकाल में देवताओं ने असुरों पर विजय पाकर देवराज इन्द्र का स्वागत किया हो। सिद्धाश्रम का वातावरण पुनः पवित्र और निश्चिंत हो गया।

 

यज्ञ पूर्ण हुआ। चारों दिशाएँ अब विघ्नों से मुक्त थीं। महर्षि विश्वामित्र के नेत्रों में संतोष और कृतज्ञता थी। उन्होंने राम से कहा, “महाबाहो! तुम्हें पाकर मैं कृतार्थ हुआ। तुमने गुरु की आज्ञा का पूर्ण पालन किया और इस आश्रम का नाम सार्थक कर दिया।”

 

उनके शब्द केवल प्रशंसा नहीं थे—वह आशीर्वाद था, एक ऋषि के हृदय से निकली कृतज्ञता थी। इसके पश्चात वे दोनों भाइयों के साथ संध्या-वंदन में लीन हो गए। उस क्षण सिद्धाश्रम की वायु में केवल एक ही भाव था—धर्म की विजय, गुरु-भक्ति की महिमा और एक दिव्य वीर के तेज की उज्ज्वल आभा।